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Iran: ईरान संघर्ष और नैतिकता की बहस, क्या तेहरान में नई सुबह आने को है

SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Thu, 12 Mar 2026 07:15 AM IST
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सार

एक राष्ट्रपति, जो अपने अहं के हिसाब से चीजें तय करता है, जो मर्यादाओं की फिक्र नहीं करता, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों की खातिर न्याय युद्ध छेड़ा है। पर इस विचार को वैसा समर्थन नहीं मिलेगा, जिसका वह हकदार है। इससे उसका महत्व कम नहीं होता, जो इस राष्ट्रपति ने तेहरान की आजादी के लिए किया है।

Iran west asia conflict and moral debate Is a new dawn at hand for Tehran
पश्चिम एशिया संकट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

न्यायपूर्ण युद्ध एक ऐसा विचार है, जो कभी-कभी नैतिकता को संकट में डाल देता है। शांतिवादी इसे सत्ता की सबसे बुरी प्रवृत्ति द्वारा बाहरी हिंसा को वैध ठहराने के रूप में देखते हैं और इसे नैतिकता में लपेटना आदर्शवाद के उलटाव को संस्थागत बनाने जैसा हो सकता है। इसके समर्थकों के अनुसार, यह न्याय के लिए एक आवश्यक कार्य है, और आक्रमण की शर्तें अंतरात्मा द्वारा निर्धारित की जाती हैं। नव रूढ़िवादी, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप ने कभी तवज्जो नहीं दी, वही लोग थे, जिन्होंने इसका समर्थन किया। उन्होंने इस सदी की शुरुआत में इराक पर गिरने वाली हर मिसाइल को नैतिक बताया। उनकी नजर में इराक के खिलाफ युद्ध न्यायपूर्ण था। यह केवल इसलिए नहीं कि सद्दाम हुसैन के शासन में छिपे कथित विनाशकारी हथियारों (जो कभी नहीं मिले) को नष्ट करना था, बल्कि उनके लिए यह ‘बुराई’ के खिलाफ युद्ध था। और नव-रूढ़िवादी शब्दावली में ‘बुराई’ कोई अमूर्त अवधारणा नहीं थी।
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जॉर्ज डब्ल्यू बुश के दौर में सक्रिय आदर्शवादी समूहों के लिए बगदाद का बाथवादी तानाशाह स्वयं बुराई का प्रतीक था। इसलिए, उसे हटाने के उनके पास पर्याप्त कारण थे। पर जिस युद्ध को ‘न्यायसंगत’ कहा गया था, वह अंततः मेसोपोटामिया (इराक) की धरती पर एक गहरी नैतिक तबाही में कैसे बदल गया-यह सवाल आज भी सबसे आदर्शवादी रूढ़िवादियों को परेशान करता है। दरअसल, किसी भी ‘न्यायसंगत युद्ध’ की नैतिकता शुरुआत में बहुत स्पष्ट दिखाई देती है, पर बहुत कम योद्धा शासक ऐसे हुए हैं, जो युद्ध के अंत तक उसी नैतिक ऊर्जा और स्पष्टता को बनाए रख पाते हैं। तो सवाल उठता है कि क्या इस समय ईरान में भी कोई ‘न्यायसंगत युद्ध’ चल रहा है?
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इस युद्ध की जरूरत ईरान की परमाणु चालाकी की वजह से नहीं पड़ी। ट्रंप ने खुद माना है कि बंकर बस्टर्स ने अमेरिका और इस्राइल के लिए यह चिंता पहले ही दूर कर दी है। ऐसा भी नहीं था कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत नहीं हो रही थी। युद्ध से एक दिन पहले तक बातचीत चल रही थी, और आगे बातचीत के लिए दरवाजे भी बंद नहीं हुए थे। फिर भी यह युद्ध एक बड़े मकसद से शुरू किया गया था, हालांकि, उदारवादी टिप्पणीकार ट्रंप के लिए ‘बड़ा मकसद’ शब्द नहीं इस्तेमाल करेंगे। इसका एक वाजिब कारण था-धार्मिक शासन के अत्याचार का अंत, जिसका जाल पूरे इलाके में फैला हुआ था।

अयातुल्ला खामनेई, जो खुद पवित्र युद्धों के प्रचारक थे, ने एक और न्यायपूर्ण युद्ध को अवश्यंभावी बना दिया। दरअसल, ईरान में राजशाही के खिलाफ विरोध की पवित्र किताबों से पैदा हुई इमामत (नेतृत्व), अपने कुत्सित इरादों में कामयाब रही। ईरान एक पतनशील संस्कृति का प्रतीक बन गया था। ईरान का हर युद्ध पश्चिम और उसके मूल्यों के खिलाफ एक तरह का सांस्कृतिक युद्ध था। यह वही रास्ता था, जो पहले से तय था और जिसे सर्वोच्च नेता ने चुना था। क्रांतियों के इतिहास में अक्सर ऐसा होता है कि वे एक ऐसे वादे से शुरू होती हैं, जो लोगों की बेचैनी और जल्दी बदलाव चाहने की भावना के साथ जुड़ जाती हैं। शाह शासन के आखिरी दिनों में, अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने ईश्वर की तानाशाही का नहीं, बल्कि आस्था पर आधारित आजादी का वादा किया था और धार्मिक सोच वाले लोकतंत्र में यह गलत नहीं था। पश्चिम में यह सदियों तक चलता रहा। एक बार जब क्रांतिकारी उपदेशक इस्लामी गणराज्य के संरक्षक संत बन गए, तो बातचीत की शर्तें बदल गईं। वैचारिक क्रांति की तरह ही धर्म या आस्था के नाम पर हुई क्रांति ने भी, जनता की इच्छाओं को दबाने और नेता का दबदबा बनाए रखने की जल्दी में धरती पर नरक बनाने का सहारा लिया।

ईरान जैसे समृद्ध सभ्यता व आजाद सोच वाले मुल्क को किताबी जंगलीपन की शिक्षा से ढककर, इस्लामी क्रांति ऊपर वाले को खुश करने के बजाय इमाम पंथ को ज्यादा अहमियत दे रही थी। धार्मिक-फासीवादी मुल्क पश्चिम एशिया के सबसे बड़े गुलैग (कुख्यात जेल प्रणाली) को असंतुष्टों से भरने से संतुष्ट नहीं था। अकेले ईरान में पिछले प्रदर्शनों में 6,000 से ज्यादा ईरानी मारे गए। जब भी विरोध हुआ, मॉस्को ने टैंकों की आपूर्ति की। इस्लामी गणराज्य के लिए विस्तारवाद का मतलब था गाजा से लेकर यमन, सीरिया से लेकर लेबनान तक लगातार छद्म युद्ध। इसके आसपास के देशों में क्रांति लाने का मुकाबला, उस समाज के साथ क्रूरता से किया जा रहा है, जो कभी एक बहुलवादी समाज था और जिसमें यहूदी-विरोध के कोई निशान नहीं थे।

संस्थापक इमाम के उत्तराधिकारी, अयातुल्ला खामनेई को इस क्रांतिकारी तंत्र को एक हत्या की मशीन में बदलना पड़ा, जिसने देश में आज्ञाकारिता सुनिश्चित करते हुए भी विदेश में (यहूदी राज्य के) विनाश का समर्थन किया। प्रतिरोध की धुरी पूरे पश्चिम एशिया में शहादत और तबाही फैलाकर एक थकी हुई क्रांति को अधिकतम करने के बारे में थी। ईरान के कुछ समर्थक लोग यह दलील देंगे कि यह काम अमेरिकी राष्ट्रपति का नहीं है, खासकर उस राष्ट्रपति का, जो यह मानता था कि विदेशों में दखल देने से अमेरिका फिर से महान नहीं बन सकता। इसलिए बंद और कठोर समाजों में उदार मूल्यों और नैतिकता को स्थापित करना उसकी जिम्मेदारी नहीं है। ट्रंप की छवि खराब है। यह दुनिया के साथ उनके व्यवहार के स्वतंत्र विश्लेषण में बाधक है। एक राष्ट्रपति, जो आम तौर पर अपने अहं के हिसाब से चीजें तय करता है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कोई परवाह नहीं करता, वह उदार लोकतंत्र के लिए जंग में जाएगा, यह एक ऐसा विचार है, जिसे वैसा समर्थन नहीं मिलेगा, जिसका वह हकदार है। सच तो यह है कि बुरी छवि के शिकार ट्रंप ईरान व इस्राइल, दोनों की स्वतंत्रता के लिए युद्ध में उतरे हैं। ट्रंप ने चिर-परिचित रास्ते पर चलने से इन्कार कर दिया। वह तेहरान की सड़कों पर उतर आए, और इस बार, उनकी समझ सही थी।

युद्ध शायद अपने देश में बदनाम योद्धा को मुक्ति न दिला पाए, पर यह एक देश को क्रांति के पापों से मुक्ति दिलाएगा और एक ऐसे मौलवी के दबदबे से भी, जिसने खुद को सर्वशक्तिमान सत्ता के आखिरी राज का शिल्पकार चुना था। युद्ध ने अपने मिशन का एक बड़ा हिस्सा पहले ही पूरा कर लिया है। बाकी काम ईरानियों को करना होगा। मलबे से उठकर उस देश को वापस पाना होगा, जो 47 साल पहले उनसे एक ऐसे विचार की वजह से छीन लिया गया था, जिसे शुरू में सराहा गया था। आखिर में, इतिहास रास्ता साफ कर देगा, जिससे भगवान या इन्सानों की किताब से निर्बाध क्रांति के लिए मंच तैयार हो जाएगा। एक न्यायपूर्ण युद्ध की वजह से ईरान लगभग वहां पहुंच ही गया है।   
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