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पैक्स सिलिका और भारत: चुनौती है चीन और वही कामयाबी का पैमाना

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: लव गौर Updated Tue, 24 Feb 2026 06:48 AM IST
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सार
अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका समूह में शामिल होना भारत के लिए रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम है। हालांकि, चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने में इसकी कामयाबी कई पहलुओं पर निर्भर करेगी।
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Joining US-led Pax Silica group is strategically important for India
भारत ने पैक्स-सिलिका पर किए हस्ताक्षर - फोटो : X @USAmbIndia

विस्तार

हाल ही में भारत द्वारा पैक्स सिलिका घोषणा पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद अमेरिका के नेतृत्व वाली इस पहल में उसका औपचारिक तौर पर शामिल होना रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम है, जिसका उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और तकनीक आपूर्ति शृंखला में चीन के बढ़ते प्रभुत्व का मुकाबला करना है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप प्रशासन ने पिछले वर्ष दिसंबर में इस समूह की शुरुआत की थी, पर प्रारंभिक सूची में भारत को शामिल नहीं किया गया था।


हालांकि, एआई शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का यह कहना वैश्विक परिदृश्य में भारत के बढ़ते कद को ही दर्शाता है कि भारत प्रतिभा का भंडार है और इसकी इंजीनियरिंग क्षमताएं इस गठबंधन को मजबूत ही बनाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि पैक्स सिलिका में भारत का प्रवेश महज प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और आवश्यक भी है। नहीं भूलना चाहिए कि दुर्लभ खनिजों के वैश्विक उत्पादन में 90 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला चीन पिछले कुछ वर्षों में एआई और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला के मामले में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है, जिसे अमेरिका अपने लिए एक बड़ी चुनौती मान रहा है।


गौरतलब है कि आज ये दुर्लभ खनिज कंप्यूटर चिप से लेकर कार व मिसाइल बनाने तक काम आते हैं और यही वजह है कि इस मामले में चीन पर निर्भरता को भारत समेत कई देश अपनी सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंता का विषय मान रहे हैं। खासकर, भारत के लिए यह भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे देश के तकनीकी और आर्थिक भविष्य से जुड़ी कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों व अवसरों का सीधा समाधान हो सकेगा।

उल्लेखनीय है कि भारत ने चिप डिजाइन, निर्माण तथा एआई शोध को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वाकांक्षी मिशन शुरू किए हैं और इससे जुड़ी परियोजनाओं के लिए काफी निवेश भी आकर्षित किया है। एक अंतरराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा होने से भारत को अधिक निवेश, तकनीक सहयोग और संयुक्त अनुसंधान साझेदारी को आकर्षित करने में तो मदद मिलेगी ही, उसके तकनीक बुनियादी ढांचे में पूंजी लगाने पर विचार कर रही वैश्विक कंपनियों का भी भरोसा बढ़ेगा।

कुल मिलाकर, यह भारत को अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय साझेदारों जैसी प्रमुख तकनीक शक्तियों से घनिष्ठता से जोड़ेगा। लिहाजा, यह कदम वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को दर्शाता है। देखने वाली बात होगी कि चीन इस पर क्या रुख अपनाता है, जिसके साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। हालांकि, ट्रंप जिस तेजी से अपनी योजनाएं बदलते रहते हैं, उसे देखते हुए पैक्स सिलिका की कामयाबी उनके रुख के साथ इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इसके साझेदार केवल बातचीत पर निर्भर न रहकर एक ठोस व सुरक्षित तकनीकी नेटवर्क के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।
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