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सहयोग का नया मॉडल: वैश्विक दक्षिण के लिए एक व्यावहारिक राह, भारत-ब्राजील के लिए परस्पर लाभ
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भारत-ब्राजील संबंध
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की हालिया भारत यात्रा ने भारत-ब्राजील संबंधों को एक नए चरण में प्रवेश करा दिया है। वर्ष 2006 में स्थापित सामरिक साझेदारी को अब दोनों देशों ने व्यापक, बहुस्तरीय और दीर्घकालिक सहयोग में बदलने का निर्णय लिया है। यह केवल एक औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं थी, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में दो प्रमुख उभरती शक्तियों द्वारा अपने हितों की रक्षा और विस्तार के लिए उठाया गया रणनीतिक कदम था। नई दिल्ली में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की भागीदारी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी विस्तृत वार्ता ने स्पष्ट कर दिया कि दोनों देश अपने संबंधों को केवल प्रतीकात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत आधार पर आगे बढ़ाना चाहते हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की संरक्षणवादी और अस्थिर टैरिफ नीतियों ने कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को झटका दिया है। भारत व ब्राजील, दोनों अमेरिकी बाजार से जुड़े हैं और अचानक बढ़ाए गए शुल्कों ने उनके निर्यात को प्रभावित किया है। ऐसे में, यदि वैश्विक दक्षिण के देश अपने आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा करना चाहते हैं, तो उन्हें पारंपरिक पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता कम करके परस्पर सहयोग को सुदृढ़ करना होगा। राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की यह यात्रा इसी रणनीतिक पुनर्संतुलन का हिस्सा प्रतीत होती है।
दोनों देशों ने वर्ष 2025 में लगभग 15 अरब डॉलर को पार कर चुके द्विपक्षीय व्यापार को अब 2030 तक 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। यह केवल संख्यात्मक वृद्धि का संकेत नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन की इच्छा को दर्शाता है। गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने, एंटी-डंपिंग मुद्दों पर संवाद बढ़ाने और भारत-मर्कोसुर वरीयता प्राप्त व्यापार समझौते का विस्तार करने पर सहमति इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। लैटिन अमेरिका में ब्राजील भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों अर्थव्यवस्थाओं की पूरक प्रकृति इस लक्ष्य को यथार्थवादी बनाती है। खनिज और इस्पात क्षेत्र में सहयोग इस यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक है। भारत अपनी अवसंरचना, औद्योगिकीकरण और विनिर्माण क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है, जिसके लिए लौह अयस्क और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की निरंतर आपूर्ति आवश्यक है।
ब्राजील विश्व के प्रमुख लौह अयस्क उत्पादकों में से एक है और उसके पास दुर्लभ मृदा तत्वों सहित कई महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार हैं। चीन पर निर्भरता कम करना भारत की रणनीतिक प्राथमिकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आपूर्ति शृंखला का नियंत्रण कुछ सीमित देशों के पास है। ऐसे में, खनन और खनिज सहयोग समझौता भारत को संसाधन सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि यह ब्राजील को स्थायी और विस्तारित बाजार उपलब्ध कराएगा। यह सहयोग केवल कच्चे माल के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्वेषण, तकनीकी निवेश और इस्पात अवसंरचना के विकास को भी शामिल करता है। डिजिटल और तकनीकी सहयोग भी इस रिश्ते का उभरता हुआ स्तंभ है।
एआई इम्पैक्ट समिट में राष्ट्रपति लूला ने एआई के अंतरराष्ट्रीय नियमन और संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत विकासोन्मुख वैश्विक शासन की आवश्यकता पर बल दिया। भारत, जो डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरा है, इस दृष्टिकोण के साथ सामंजस्य रखता है। डिजिटल साझेदारी की संयुक्त घोषणा के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डाटा संरक्षण, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह पहल दर्शाती है कि दोनों देश वैश्विक तकनीकी मानकों के निर्माण में सक्रिय भागीदारी चाहते हैं।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ हुआ है। स्कॉर्पियन श्रेणी की पनडुब्बियों के रखरखाव में सहयोग, रक्षा औद्योगिक सह-निर्माण और संभावित एयरोस्पेस निवेश इस बढ़ते विश्वास के प्रमाण हैं। आतंकवाद, आतंकी वित्तपोषण तथा अंतरराष्ट्रीय अपराध के खिलाफ सहयोग ने इस साझेदारी को मजबूती प्रदान की है। ऐसे वक्त में, जब साइबर खतरे और समुद्री चुनौतियां बढ़ रही हैं, इस प्रकार का सहयोग दोनों देशों की सामरिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है। भारत की सस्ती जेनेरिक दवाओं की वैश्विक प्रतिष्ठा और ब्राजील की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की आवश्यकताएं एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों देशों के नियामक निकायों के बीच समझौते से दवाओं और टीकों के स्थानीय उत्पादन, अनुसंधान सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन में समान दवा पहुंच के समर्थन का संयुक्त रुख इस साझेदारी को वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति से भी जोड़ता है।
ऊर्जा संक्रमण और जलवायु सहयोग के क्षेत्र में भी व्यापक सहमति बनी है। हरित हाइड्रोजन, सतत विमानन ईंधन और स्वच्छ ऊर्जा निवेश में सहयोग से दोनों देशों को जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ आर्थिक अवसर भी मिल सकते हैं। दोनों देश जलवायु कार्रवाई को केवल पर्यावरणीय प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि हरित औद्योगिक विकास के अवसर के रूप में देख रहे हैं।
बहुपक्षीय मंचों पर समन्वय इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के लिए पारस्परिक समर्थन लंबे समय से दोनों देशों की प्राथमिकता रहा है। ब्रिक्स और अन्य मंचों पर समन्वय से भारत और ब्राजील वैश्विक दक्षिण की आवाज को अधिक सशक्त बनाने के इच्छुक हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की संभावना पर विचार इस दिशा में एक सावधानीपूर्ण कदम है, जो वित्तीय विविधीकरण की ओर संकेत करता है। दीर्घकालिक वीजा सुविधा, छात्र आदान-प्रदान और सांस्कृतिक सहयोग से पारस्परिक समझ और विश्वास को बढ़ावा मिलेगा। किसी भी सामरिक साझेदारी की सफलता अंततः सामाजिक और मानवीय जुड़ाव पर निर्भर करती है।
समग्रता में देखें तो, भारत-ब्राजील संबंध सकारात्मक दिशा में अग्रसर है, परंतु इस गति को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा। घोषित लक्ष्यों और हस्ताक्षरित समझौतों को ठोस परिणामों में बदलना ही वास्तविक परीक्षा होगी। यदि दोनों देश अपने संकल्प को व्यावहारिक रूप दें, तो यह ‘विन-विन’ साझेदारी न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देगी, बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए सहयोग का एक सशक्त और व्यावहारिक मॉडल भी प्रस्तुत करेगी। edit@amarujala.com