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चिकित्सा क्षेत्र में सुधार की दरकार: यूपी में मेडिकल कॉलेज बढ़े, लेकिन डॉक्टर और संसाधनों की भारी कमी

विजय त्रिपाठी Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 28 Apr 2026 07:17 AM IST
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सार
उत्तर प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों में फैकल्टी से लेकर जरूरी संसाधनों तक का घोर अभाव है। उम्मीद है अदालती दखल से यहां की व्यवस्था में जरूरी सुधार होगा।
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uttar pradesh healthcare system crisis medical colleges faculty shortage court intervention
यूपी में स्वास्थ्य तंत्र संकट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

कुछ दिनों पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के चिकित्सा तंत्र और स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खोल दी। स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती जरूरतों के बीच प्रदेश में सरकारी और गैर-सरकारी मेडिकल कॉलेज तो धड़ाधड़ खुल रहे हैं, पर उनमें फैकल्टी से लेकर संसाधनों तक का घनघोर अभाव है। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सभी जिलों की चिकित्सा सुविधाओं का ब्योरा तलब किया है, विशेष रूप से हाल ही में खुले सभी जिलों के मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का। अदालत ने यह भी पूछा है कि मौजूदा सुविधाएं मरीजों की जरूरतों को किस हद तक पूरा करती हैं।


वास्तविकता यह है कि जिला एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में जांच की सुविधाएं तो लगातार बढ़ाई जा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों की कमी से एक्सरे या अल्ट्रासाउंड मशीनों का लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में, विभाग ने एक-एक रेडियोलॉजिस्ट को दो से तीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) का प्रभार थमा दिया है। विभाग भरपूर दवाएं होने का दावा करता है, पर सरकारी अस्पताल के चिकित्सक दबी जुबान मानते हैं कि वे चंद दवाओं के सहारे ही हैं।


प्रदेश में आगरा, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, मेरठ व झांसी जैसे बड़े शहरों के मेडिकल कॉलेजों में करीब 300 करोड़ की लागत से सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक बनाए गए। उद्देश्य था कि यहां हार्ट, किडनी, लिवर, न्यूरो आदि से जुड़ी बीमारियों के इलाज की सुविधा दी जाएगी, पर विशेषज्ञों की कमी के चलते ये पूरी क्षमता से नहीं चल रहे हैं। कहीं एक विभाग काम कर रहा है, तो कहीं दो। यदि सभी विशेषज्ञ इन ब्लॉक में एक साथ सेवाएं दें, तो मरीजों को लखनऊ आने की जरूरत ही न पड़े।

हाईकोर्ट की एक और बड़ी चिंता सरकारी डॉक्टरों के वेतन की है। कोर्ट ने कहा है कि कम वेतन के कारण कई सरकारी डॉक्टर निजी अस्पतालों में चले जाते हैं, जिससे आमजन उनकी विशेषज्ञता और सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों की सेवाएं नौकरशाहों की सेवाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह नागरिकों के जीवन के अधिकार से संबंधित है। सरकार को वेतन तय करते समय इस पर विचार करना चाहिए। सच तो यह है कि चिकित्सा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में पे स्केल लागू है। नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के तहत पांच लाख रुपये वेतन तक के विशेषज्ञ रखे जा रहे हैं। पर डॉक्टरों के वेतन को लेकर राज्य सरकार के पास अलग से कोई नीति नहीं है। सरकारी संस्थानों में निजी प्रैक्टिस पर रोक के बदले निजी क्षेत्र के समान सुविधाएं बढ़ानी होंगी। लेकिन, नौकरशाह इस दिशा में सोचने की जरूरत ही नहीं समझते हैं।

गौरतलब है कि कोर्ट की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले लखनऊ के सुपर स्पेशियलिटी कैंसर अस्पताल के न्यूक्लियर मेडिकल विभाग की इकलौती डॉक्टर सोनम सुमन ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उन्हें स्पेशियलिटी संस्थान में तैनाती के बावजूद मेडिकल कॉलेज वाला वेतन दिया जा रहा था। ऐसी वजहों से पिछले पांच वर्षों में 28 विशेषज्ञ डॉक्टर संस्थान छोड़कर जा चुके हैं। यहां चार बेहद महत्वपूर्ण विभागों में कोई डॉक्टर ही नहीं बचा है, जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। पीजीआई, केजीएमयू जैसे अन्य सरकारी संस्थानों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। चिकित्सा संस्थानों में वेंटिलेटरों की उपलब्धता के लिए अभी तक कोई मजबूत तंत्र नहीं बना है। कुछ जगहों पर डिस्प्ले बोर्ड भी लगाए गए, पर पुख्ता तंत्र विकसित नहीं किया जा सका। इसलिए प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों को मिलाकर एकीकृत व्यवस्था बनाने की जरूरत है। जानकार इसकी वजह डॉक्टरों की अनदेखी और अफसरशाही को बताते हैं। चिकित्सा शिक्षा संचालन की कमान आईएएस के हाथ में होने की वजह से कोई भी विशेषज्ञ उनके सामने मुंह नहीं खोलता।

प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट लगातार बढ़ रहा है, पर इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस वर्ष स्वास्थ्य सेवाओं को कुल बजट का करीब छह फीसदी हिस्सा मिला है, जो पिछले साल से 15 फीसदी ज्यादा है।

केंद्र का क्लीनिकल स्टैबलिसमेंट एक्ट प्रदेश में 2016 से लागू है। इसमें अस्पताल खोलने से लेकर क्लीनिक चलाने तक के नियम हैं। इसका पालन कराने की जिम्मेदारी चिकित्सा व स्वास्थ्य विभाग की है, पर ज्यादातर अस्पतालों में इसका खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत के हस्तक्षेप से प्रदेश के चिकित्सा तंत्र में कुछ सुधार अवश्य होगा।
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