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चुनावी तपिश के बीच लू की लहर: गर्मी का बढ़ता कहर, अर्थव्यवस्था और रोजगार पर खतरा

patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 27 Apr 2026 06:50 AM IST
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सार
चुनावी शोर के बीच देश भीषण गर्मी से जूझ रहा है। दिल्ली में पारा 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है। यह गर्मी उन करोड़ों मजदूरों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है, जिनकी आजीविका खुले आसमान के नीचे निर्भर है। ऐसे में, यह संकट नीति और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने को मजबूर करता है।
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india heatwave impact on workers extreme heat during elections climate change action plan economic loss
हीटवेव का मजदूरों पर बड़ा असर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव शुरू होते ही देश में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। लेकिन टीवी पर चुनावी चर्चाओं से अलग, खतरनाक गर्मी पूरे देश, खासकर उत्तर भारत में लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले रही है। राजधानी दिल्ली में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है, जबकि उत्तर प्रदेश के 35 जिलों में लू (हीटवेव) की चेतावनी जारी की गई है। इस भीषण गर्मी के चलते राज्य के कई हिस्सों में आग लगने की घटनाएं भी सामने आई हैं। मौसम विभाग ने लोगों को गर्मी के प्रति सावधानी बरतने का आग्रह किया गया है।


जैसे—धूप में लंबे समय तक न रहें, दिन के समय केवल तभी बाहर निकलें, जब बहुत जरूरी हो; बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें; खूब पानी पिएं; हल्के और ढीले कपड़े पहनें; घर से बाहर निकलते समय सिर ढककर रखें; और यदि चक्कर आना, सिरदर्द, तेज बुखार, उल्टी या कमजोरी महसूस हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें। ये सभी अच्छी सलाहें हैं, लेकिन भीषण गर्मी और लू की प्रचंडता को देखते हुए हमें इससे कहीं आगे बढ़कर सोचने की जरूरत है।


एक अनुमान के मुताबिक, देश के कार्यबल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा यानी करीब 38 करोड़ मजदूर ऐसे काम करते हैं, जिनमें उन्हें सीधे धूप और गर्मी का सामना करना पड़ता है। इनमें खेती, निर्माण कार्य और अन्य असंगठित क्षेत्र के काम शामिल हैं, जिन पर देश की करीब आधी अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। आने वाले वर्षों में गर्मी का संकट और गहरा सकता है। 2030 तक करीब 20 करोड़ लोगों को जानलेवा गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, बढ़ती गर्मी के कारण दुनिया भर में लाखों नौकरियां खत्म होने की आशंका है। स्पष्ट है कि भारत में बढ़ी लू की समस्या अब सिर्फ मौसमी नहीं रह गई है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक संकट बन चुकी है, जो हर दिन गंभीर होती जा रही है। ग्रीनहाउस गैसों के कारण जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, लू की घटनाएं पहले से ज्यादा बार हो रही हैं, ज्यादा समय तक चल रही हैं, और काफी असर डाल रही हैं। पिछले चालीस वर्षों में, लू वाले दिनों की संख्या और उनकी अवधि—दोनों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जबकि 'हीट हॉटस्पॉट' (लू के केंद्र) का दायरा भी लगभग डेढ़ गुना बढ़ गया है।

उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के इलाके, तटीय क्षेत्र, और खासतौर पर विशाल इंडो-गंगेटिक मैदान, जहां 60 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं और जो देश का सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है, आज इस संकट से सबसे ज्यादा जूझ रहा है। इन मैदानी इलाकों में दिन की तेज गर्मी और हवा में बढ़ती नमी (पिछले दस वर्षों में करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी) मिलकर बेहद खतरनाक 'नम-गर्मी की लहरें' पैदा कर रही हैं। यह स्थिति ‘वेट-बल्ब तापमान’ को बढ़ा देती है, यानी ऐसा स्तर, जहां गर्मी और नमी मिलकर इन्सान के शरीर की प्राकृतिक ठंडक प्रणाली (पसीने) को बेअसर कर देती है। नतीजतन, एक सामान्य गर्म दिन भी लाखों किसानों और खुले में काम करने वाले मजदूरों के लिए जानलेवा बन जाता है, क्योंकि उनके पास इनसे बचने का कोई ठोस साधन नहीं होता। जो चीज पहले कभी-कभार हुआ करती थी, वह अब भारत की जलवायु का हिस्सा बन गई है।

इन सबके बावजूद, सरकार की प्रतिक्रिया अब भी सीमित और संकीर्ण नजर आती है। मौजूदा ‘हीट एक्शन प्लान’ मुख्य रूप से छोटे और अस्थायी उपायों तक ही सिमटे हुए हैं। ये योजनाएं उस बड़ी और जटिल तस्वीर को नजरअंदाज करती हैं, जिसमें गर्मी के बदलते स्वरूप शामिल हैं-जैसे रात के तापमान में तेजी से बढ़ोतरी, शहरों में ‘हीट आइलैंड प्रभाव’ का बढ़ना, और बढ़ती नमी से पैदा हो रही असहनीय परिस्थितियां, जो अब इंडो-गंगेटिक मैदान के बड़े हिस्से को प्रभावित कर रही हैं। सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटबिलिटी के अनुसार, 'भारत की नीतियां अभी तक ऐसे व्यापक ढांचे विकसित नहीं कर पाई हैं, जो जलवायु अनुकूलन को आवास, श्रमिक सुरक्षा और शहरी योजना से जोड़ सकें। हकीकत यह है कि भारत अब भी लू को दीर्घकालिक विकास चुनौती के बजाय अल्पकालिक आपदा मानता है। जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे (जैसे छायादार बाजार क्षेत्र, आराम करने की जगहें, ठंडक वाले केंद्र और साफ-सफाई की सुविधाएं) की कमी का सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है, जो पहले से ही कमजोर हैं। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, महिला विक्रेताओं की आय घटती है, स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं और कर्ज का बोझ भी बढ़ता जाता है।'

अच्छी खबर यह है कि भारत में राज्य और शहर के नेता अपनी खुद की गर्मी से निपटने की रणनीतियां लेकर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु ने लू को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित कर दिया है, जिससे राहत, मुआवजे और तैयारियों के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के संसाधनों का उपयोग किया जा सकेगा। केरल, तेलंगाना और कई अन्य राज्यों ने भी ऐसा ही किया है।

लेकिन खराब शहरी योजना, खत्म होते हरे-भरे इलाके और निर्बाध बनती इमारतें—ये सभी शहरी इलाकों में गर्मी की समस्या को बढ़ा रहे हैं। हमें ऐसी व्यापक रणनीतियों की जरूरत है, जो जलवायु अनुकूलन को बेहतर आवास, मजदूरों की सुरक्षा और समझदारी भरी शहरी योजना से जोड़ें। अभी भी, भारत में लू को देश के विकास के लिए लंबे समय तक बने रहने वाले खतरे के बजाय, बस छोटी-मोटी आपात स्थिति की तरह ही देखा जा रहा है।

गर्मी से आर्थिक नुकसान बहुत ज्यादा है और कुछ समूहों पर इसका असर दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा पड़ता है। झुलसा देने वाली गर्मी काम के घंटे को कम कर देती है, उत्पादन घटा देती है और चिकित्सा खर्च बढ़ा देती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि 2030 तक भारत गर्मी के तनाव की वजह से अपने कुल काम के घंटों का लगभग 5.8 प्रतिशत हिस्सा खो सकता है (जो 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियां खोने के बराबर है) और इसमें खेती और निर्माण क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। अब हमें गर्मी-रोधी बुनियादी ढांचे, मजदूरों के लिए ठोस सुरक्षा उपायों, और ऐसी सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर पैसा खर्च करने की जरूरत है, जो सचमुच लिंग-भेद का ध्यान रखें।      
edit@amarujala.com
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