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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Kanishka Tragedy: India's concerns vindicated after 41 years; an opportunity to step up the campaign.

कनिष्क हादसा: 41 साल बाद भारत की चिंताओं की पुष्टि, अपना अभियान बढ़ाने का अवसर

Sat, 27 Jun 2026 08:02 AM IST
Pavan अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Pavan Updated Sat, 27 Jun 2026 08:02 AM IST
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सार
23 जून, 1985 को अटलांटिक महासागर के ऊपर एअर इंडिया फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ में हुए विस्फोट को विमानन इतिहास के सबसे भीषण आतंकी हमलों में गिना जाता है। हमले में चालक दल सहित 329 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। जांच में इस विस्फोट के तार प्रतिबंधित संगठन बब्बर खालसा से जुड़े पाए गए थे।
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Kanishka Tragedy: India's concerns vindicated after 41 years; an opportunity to step up the campaign.
कनिष्क : 41 साल बाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चार दशकों से भी अधिक समय में पहली बार कनाडाई खुफिया एजेंसी का 1985 में एअर इंडिया के विमान में हुए बम धमाके के लिए आधिकारिक तौर पर कनाडा में मौजूद खालिस्तानी चरमपंथियों को जिम्मेदार ठहराना ओटावा की भाषा में एक बड़े बदलाव को तो दर्शाता ही है, उसकी जमीन से चल रहे चरमपंथी नेटवर्क को लेकर भारत की दशकों पुरानी चिंताओं की भी पुष्टि करता है।


उल्लेखनीय है कि 23 जून, 1985 को अटलांटिक महासागर के ऊपर एअर इंडिया फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ में हुए विस्फोट को विमानन इतिहास के सबसे भीषण आतंकी हमलों में गिना जाता है। हमले में चालक दल सहित 329 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। जांच में इस विस्फोट के तार प्रतिबंधित संगठन बब्बर खालसा से जुड़े पाए गए थे। दरअसल, यह तथ्य कभी पूरी तरह छिपा ही नहीं था कि इस हमले के पीछे कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी उग्रवादी संगठनों का हाथ था। जांच आयोग और खुफिया रिपोर्टें वर्षों पहले ही इसकी ओर संकेत कर चुकी थीं।


अब 41 वर्ष बाद कनाडा का इसे खालिस्तानी आतंकवादियों की सुनियोजित साजिश के रूप में स्वीकारना सिर्फ एक औपचारिक बयान नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक भूल की देर से की गई स्वीकारोक्ति ही है, जो आतंकवाद के प्रति पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये को भी उजागर करती है। यह कबूलनामा ऐसे समय में आया है, जब भारत और कनाडा के रिश्ते वर्तमान कार्नी सरकार से पहले के कुछ वर्षों में गंभीर तनाव से गुजरे हैं। भारत लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि कनाडा की धरती पर खालिस्तानी तत्व खुलेआम भारत विरोधी गतिविधियां संचालित करते रहे हैं, पर तत्कालीन त्रूदो सरकार इन्हें राजनीतिक संरक्षण देती रही।

दुनिया ने 11 सितंबर, 2001 के बाद इस सच्चाई को स्वीकार किया कि आतंकवाद के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी अंतत: उसी समाज को भारी पड़ती है, जो उसे नजरअंदाज करता है। लेकिन, एअर इंडिया त्रासदी बताती है कि यह सबक दुनिया को उससे भी डेढ़ दशक पहले मिल जाना चाहिए था। आज जब खुद कनाडा यह मान रहा है कि उसके इतिहास का सबसे बड़ा आतंकी हमला खालिस्तानी आतंकवाद का नतीजा था, तब यह भी जरूरी हो जाता है कि कार्नी सरकार वर्तमान में सक्रिय ऐसे नेटवर्कों के प्रति भी गंभीर कार्रवाई करे।

भारत के लिए भी यह अवसर आत्मसंतोष का नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद विरोधी सहयोग को अधिक मजबूत बनाने के अपने प्रयासों को आगे बढ़ाने का होना चाहिए। खोई हुई जिंदगियां तो वापस नहीं आ सकतीं, फिर भी अतीत की ईमानदार स्वीकारोक्ति भविष्य की सुरक्षा का आधार तो बन ही सकती है।
 
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