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बर्फ में सुराख: दुनिया में पिघलते ग्लेशियर, और 'जमती' आशंकाएं
Sun, 28 Jun 2026 07:47 AM IST
Pavan
रेमंड झोंग, द न्यूयॉर्क टाइम्स
रेमंड झोंग, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Pavan
Updated Sun, 28 Jun 2026 07:47 AM IST
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विस्तार
ग्लेशियर का लहरदार हिस्सा अंटार्कटिका के अंदरूनी इलाकों की पहाड़ियों और ज्वालामुखियों से निकलकर दक्षिणी महासागर तक फैला हुआ था, जिसने लगभग ब्रिटेन के आकार के बराबर इलाके को ढका हुआ था। वॉन सांग ली उसकी बर्फ पर खड़े थे। उन्होंने लाल रंग का पोलर सूट पहना हुआ था और अपनी टीम को काम करते हुए देख रहे थे। टीम में नौ वैज्ञानिक, इंजीनियर और गाइड शामिल थे, जिनमें से कुछ उनके साथ आधे दशक से भी अधिक समय से इस मिशन की योजना बना रहे थे। अब वे इसके आखिरी चरण में थे।वे थके हुए और भूखे थे। चाय, क्रैकर्स और प्रोटीन बार खा-पीकर काम चला रहे थे। उन्होंने दुनिया के सबसे खतरनाक महासागर को पार किया था, तेज हवाओं के बीच कई दिनों तक कड़ी मेहनत की थी। और, यह सब सिर्फ एक कोशिश के लिए था, एक कोशिश-धरती के सबसे निचले हिस्से में बर्फ को भेदने की। बीच-बीच में, जब ग्लेशियर अपनी जगह से हिलता था और उनके पैरों के नीचे दरारें पड़ जाती थीं, तब उन्हें जोरदार आवाजें सुनाई देतीं।
टीम को पता था कि गर्म धाराएं थ्वाइट्स ग्लेशियर को नीचे से धीरे-धीरे खत्म कर रही थीं। उन्हें यह भी मालूम था कि आने वाले दशकों में यह ग्लेशियर पूरी तरह से टूट सकता है, जिससे कई सदियों तक इतनी अधिक बर्फ समुद्र में गिर सकती है कि दुनियाभर में समुद्र का जलस्तर 15 फीट से अधिक बढ़ सकता है। अंटार्कटिका के दूसरे ग्लेशियरों में बर्फ का पिघलना इतना धीरे-धीरे होता है कि पता ही नहीं चलता। डॉ. ली बताते हैं, ‘थ्वाइट्स ग्लेशियर के मामले में ऐसा नहीं है। इसे खत्म होने में सदियों या हजारों वर्ष नहीं लगेंगे। शायद यह हमारी जिंदगी में ही खत्म हो जाए।’ अगर ऐसा हुआ, तो दुनिया के तटीय शहर पानी में डूब जाएंगे। यह कब होगा, यह तो ग्लेशियर के नीचे बर्फ से ढकी गुफा से मिलने वाले डाटा से ही पता लग सकेगा। डॉ. ली और उनकी टीम ने सबसे पहले गर्म पानी की बौछारों का इस्तेमाल करके आधा मील मोटी बर्फ में एक फुट चौड़ा सुराख किया। फिर, उन्होंने उसमें उपकरण लगे एक केबल को नीचे उतारना शुरू किया।
डॉ. ली को बचपन में ही प्रकृति को देखने-समझने का शौक हो गया था। पहाड़ों में घूमते हुए, वह अक्सर जमीन में बने सुराखों में हाथ डालकर न जाने क्या-क्या ढूंढते रहते थे। अगर कोई सुराख उथला लगता, तो वह उसे और गहरा करते। इससे उनके माता-पिता को चिंता होती थी कि कहीं उन्हें सांप न काट ले। लेकिन, चट्टानों और धरती के अंदर की चीजों में उनकी इसी दिलचस्पी ने उन्हें जियोफिजिक्स (भू-भौतिकी) की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया।
अंटार्कटिका की खोज में उन्हें वही आकर्षण महसूस हुआ, जो अंतरिक्ष की खोज में होता है, क्योंकि यह काम मुश्किल था। वहां पहुंचना और काम करना भी कठिन था। वहां मिली हर जानकारी बहुत मेहनत से हासिल होती थी। इस जमे हुए महाद्वीप को पहली बार देखे जाने के दो सदियों बाद भी, वहां कई ऐसी जगहें थीं, जहां कोई इन्सान नहीं पहुंचा था। थ्वाइट्स ग्लेशियर भी उन्हीं में से एक था। डॉ. ली नौ साल से थ्वाइट्स में सुराख करके शोध करने का सपना देख रहे थे। यह उनके पोलर साइंटिस्ट के कॅरिअर का लगभग आधा समय था। 2022 की शुरुआत में, उन्होंने और ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे की एक टीम ने पहली कोशिश की, पर वे ग्लेशियर तक नहीं पहुंच पाए। समुद्र की मोटी बर्फ ने उनके जहाज का रास्ता रोक दिया। डॉ. ली ने दूसरे अभियान भी किए और दूसरे ग्लेशियरों की यात्रा की। पर, थ्वाइट्स उन्हें अपनी ओर खींचता रहा।
फिर, पिछले दिसंबर में, जब वह और उनकी टीम अंटार्कटिका के लिए दोबारा निकलने ही वाले थे, तभी उन्हें एक गहरा सदमा लगा। उनके पिता का निधन हो गया। उनके पिता पेशे से नाई थे और अपने बेटे के काम के बहुत बड़े समर्थक थे। इन हालात में दुनिया के आखिरी छोर पर आठ हफ्ते बिताने का विचार उन्हें कुछ गैर-जिम्मेदाराना लगा। लेकिन, उनकी मां और पत्नी ने उनसे कहा कि शायद उनके पिता भी यही चाहते होंगे कि वह जाएं। आठ जनवरी की सुबह जब जहाज थ्वाइट्स पहुंचा, तो वहां का नजारा किसी दूसरी दुनिया की खूबसूरती जैसा था। बर्फ की ऊंची-ऊंची चट्टानें सुनहरी धूप में नहा रही थीं और उनके जहाज को तीन तरफ से घेरे हुए थीं, जैसे कोई गले लगा रहा हो। पानी में समुद्री बर्फ बिल्कुल नहीं थी, और जहाज ग्लेशियर के बिल्कुल सामने आकर रुका। लेकिन, एक समस्या थी। जिद्दी बादलों ने थ्वाइट्स की सतह को ढक रखा था, जिससे हेलिकॉप्टरों का बर्फ पर उतरना बहुत खतरनाक हो गया था। ड्रिलिंग टीम कई दिनों तक जहाज पर ही फंसी रही।
दिक्कत यह थी कि जहाज को फरवरी की शुरुआत में अंटार्कटिका से निकलना ही था, चाहे ड्रिलर्स का काम पूरा हुआ हो या नहीं। डॉ. ली बस मौसम देखते रहते और प्रार्थना करते कि समुद्री बर्फ अपनी जगह से न हिले और जहाज को दोबारा थ्वाइट्स के पास जाने से न रोके। ओशनोग्राफर पीटर डेविस ने ठान लिया था कि वह देरी से घबराएंगे नहीं। सिर्फ 38 साल की उम्र में, वह थ्वाइट्स पर इंस्ट्रूमेंट तैयार करने और उन्हें लगाने के इंचार्ज थे। उन्होंने कहा कि पोलर मिशन में चुनौतियां होती हैं। जरूरी बात थी कि हिम्मत न हारी जाए।
18 जनवरी को मौसम ने साथ दिया। 24 घंटों में लगभग 40 उड़ानों के जरिये हेलिकॉप्टर पायलटों ने 17 टन से ज्यादा सामान, ईंधन और खाना ग्लेशियर पर पहुंचाया। ड्रिलिंग शुरू हुई, आंकड़े एकत्र किए जाने लगे। पता चला कि ग्लेशियर के निचले हिस्से को छूने वाला पानी असामान्य रूप से उथल-पुथल वाला और गर्म था। लेकिन, असल बाधा अभी आनी बाकी थी। ग्लेशियर में सुराख करके डोरी के सहारे जो सेंसर उन्होंने भीतर भेजा था, वह कहीं फंस गया था। अब तक अपने किसी मिशन में ली नाकामयाब नहीं रहे थे। अब इतनी दूर आकर जीत के इतने करीब पहुंचकर यह हार उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उन्होंने कहा, ‘इसका अंत ऐसे नहीं हो सकता।’ उन्हें अपने पिता की याद आ रही थी। उनकी आंखों में आंसू थे। फिर भी, जो डाटा उन्होंने इकट्ठा किया, वह अमूल्य था।
पहली बार वैज्ञानिकों की किसी टीम ने विशालकाय बर्फ के टुकड़ों के नीचे का विस्तृत डाटा एकत्र किया था। किसी ग्लेशियर में इतनी गहराई तक अब तक कोई नहीं पहुंचा था। ली सोच रहे थे कि काश उन्हें दो दिन और मिल जाते! डॉ. ली ने पोलर साइंस के बारे में बहुत पहले ही एक बात सीख ली थी: असफलता इस प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। उनके दिमाग में बचपन का वह दिन था, जब सियोल के आसपास के पहाड़ों में उन्होंने एक सुराख किया, उसमें झांक कर देखा और फिर उसमें घुस गए। ग्लेशियर में हुए सुराख के अंत तक न पहुंच सकने का उन्हें दुख था, लेकिन उन्हें पता था कि मुश्किल लक्ष्यों को पाने के लिए कभी-कभी दूसरी कोशिश करनी पड़ती है।