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संस्कृति के पन्नों से: इंद्र का पद और बृहस्पति की चाल; राजा रजि के पुत्रों का स्वर्ग से कैसे हुआ मोहभंग?
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विस्तार
पुरूरवा और उर्वशी के सात पुत्र हुए-आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, दृढ़ायु, वनायु और शतायु। इनमें से आयु की पत्नी स्वर्भानुकुमारी के गर्भ से पांच पुत्र हुए-नहुष, वृद्धशर्मा, रंभ, रजि और अनेना। इन पांचों में रजि सबसे प्रतापी थे। वह इतने शक्तिशाली थे कि देवता और दानव, दोनों उनका सम्मान करते थे। कुछ समय बाद देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ। वे सब मिलकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और बोले, ‘भगवन! कृपा करके बताइए कि इस युद्ध में विजय किसकी होगी?’ ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया, ‘जहां रजि होंगे, वहीं धैर्य होगा; जहां धैर्य होगा, वहीं लक्ष्मी होगी; और जहां लक्ष्मी होगी, वहीं धर्म और विजय का निवास होगा।’ यह सुनते ही देवता और असुर, दोनों रजि के पास पहुंचे। दोनों पक्षों ने रजि से अनुरोध किया कि वह उनकी ओर से युद्ध करें और उन्हें विजय दिलाएं।राजा रजि बुद्धिमान थे। उन्होंने देवताओं से कहा, ‘यदि मैं तुम्हारे लिए युद्ध करूं और विजय प्राप्त करूं, तो क्या मुझे इंद्र का पद मिलेगा?’ देवताओं ने तुरंत उत्तर दिया, ‘राजन! आपकी इच्छा अवश्य पूरी की जाएगी।’ इसके बाद रजि ने असुरों से भी यही प्रश्न किया। परंतु, उन्होंने अभिमानपूर्वक उत्तर दिया, ‘हमारे इंद्र तो प्रह्लाद हैं। हम किसी और को इंद्र-पद नहीं दे सकते।’ यह सुनकर रजि ने देवताओं के पक्ष में युद्ध करने का निश्चय कर लिया। उनका पराक्रम देखकर दानवों की सेनाएं कांप उठीं। उन्होंने अकेले ही असंख्य असुरों का संहार कर दिया। जो असुर वर्षों से देवताओं को पराजित करते आ रहे थे, वह भी रजि के सामने टिक न सके। अंततः देवताओं को विजय मिली और उनका खोया हुआ वैभव उन्हें पुन: प्राप्त हो गया।
युद्ध समाप्त होने पर देवराज इंद्र स्वयं राजा रजि के पास आए। वह अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने विनम्र होकर कहा, ‘तात! वास्तव में आज आप ही इंद्र हैं। आपकी कृपा से मुझे पुनः स्वर्ग का राज्य प्राप्त हुआ है। मैं आज से स्वयं को आपका पुत्र मानता हूं।’
इंद्र की मधुर बातों से रजि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुस्कुराकर देवराज का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद, रजि देह त्यागकर ब्रह्मलोक चले गए।
उनके जाने के बाद उनके पुत्रों ने विचार किया कि जब उनके पिता ने देवताओं को विजय दिलाई थी, तब स्वर्ग पर उनका भी अधिकार बनता है। वे इंद्र के पास पहुंचे और उनसे अपना भाग मांग लिया। इंद्र ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, परंतु रजि के पुत्र अत्यंत बलशाली थे। उन्होंने बार-बार स्वर्ग पर आक्रमण किया। और, अंततः इंद्र का राज्य छीन लिया। इंद्र यज्ञभाग और राजसत्ता, दोनों से वंचित हो गए। उनका तेज क्षीण होने लगा और वह अत्यंत दुखी हो गए। अंत में इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक बृहस्पति से कहा, ‘गुरुदेव! रजि के पुत्रों ने मेरा राज्य और अधिकार छीन लिया है। कृपया मेरी सहायता कीजिए।’ बृहस्पति ने कहा, ‘देवराज! चिंता मत करो। मैं ऐसा उपाय करूंगा, जिससे तुम्हें शीघ्र ही अपना राज्य वापस मिल जाएगा।’
फिर, गुरु बृहस्पति ने एक योजना बनाई। उन्होंने ऐसा दर्शन और शास्त्र प्रचारित किया, जो धर्म से विमुख करने वाला था। रजि के पुत्र उस तर्कप्रधान मत से प्रभावित हो गए। धीरे-धीरे उन्होंने वेदों, यज्ञों और धर्मशास्त्रों का अनादर करना शुरू कर दिया। समय के साथ उनका तेज, पराक्रम और विवेक नष्ट होने लगा। जब इंद्र ने देखा कि रजि के पुत्र धर्म से पूरी तरह विमुख हो चुके हैं, तब उन्होंने अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी शक्ति संगठित की और रजि के पुत्रों पर आक्रमण कर दिया। इस बार देवताओं की विजय हुई। इंद्र ने रजि के पुत्रों को पराजित करके स्वर्ग का राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। तथा धर्म से विचलित होकर रजि के पुत्र अपना ऐश्वर्य खो बैठे।
यह कथा सिखाती है कि विवेक, धर्म और विनय का साथ छूट जाने पर शक्तिशाली वंश का भी पतन हो जाता है।