{"_id":"69f40e75e06737a8040b0f3b","slug":"labour-day-india-unorganised-workers-rights-trust-social-security-issues-wages-security-challenges-policy-2026-05-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"मजदूरों का दिन: कानून से बढ़कर भरोसे की जरूरत, मजदूरों के हक में अभी लंबा सफर बाकी","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
मजदूरों का दिन: कानून से बढ़कर भरोसे की जरूरत, मजदूरों के हक में अभी लंबा सफर बाकी
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
मजदूर दिवस
- फोटो :
अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
विस्तार
श्रमिक दिवस के मूल में मजदूरों की आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा निहित है। 1884 में अमेरिका व कनाडा की ट्रेड यूनियनों के संगठन फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियन के आह्वान पर सुनिश्चित हुआ कि एक मई, 1886 के बाद कोई भी श्रमिक आठ घंटे से ज्यादा काम नहीं करेगा। 1889 के जुलाई महीने में यूरोप में ‘इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ सोशलिस्ट पार्टीज’ ने एक मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (मई दिवस) के रूप में मनाने की घोषणा की। एक मई, 1890 को पहली बार मनाए गए मई दिवस कोे अब 80 से ज्यादा देशों में सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाता है।भारत में इस दिन को मनाने की शुरुआत चेन्नई में एक मई, 1923 को हुई। श्रमिक हितों को लेकर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की स्थापना भी वर्ष 1919 में हुई, जो कि संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट एजेंसी है। भारत में श्रमिकों की बेहतरी के लिए काफी काम किए गए, फिर भी अपेक्षित उपलब्धि नहीं मिल सकी है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल श्रमिकों में से 93 फीसदी अब भी असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। इसके मायने कि अब भी उनके लिए न्यूनतम वेतन व सामाजिक सुरक्षा के हक के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। भारत में करोड़ों शहरी असंगठित श्रमिक और खेतिहर कामगार हैं, जो किसी भी कानून के दायरे में नहीं आते। इनके लिए भी एक केंद्रीय कानून की जरूरत है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसे कानून के बावजूद, कई क्षेत्रों में अब भी शोषणकारी और दमनकारी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। कमोबेश महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर, यानी एफएलएफपीआर 37 प्रतिशत तो है, पर चिंताजनक यह है कि इसका बड़ा हिस्सा अवैतनिक सहायक के रूप में है। सरकार ने ‘अटल बीमा योजना’ और सामाजिक सुरक्षा कोड के जरिये सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के प्रयास किए हैं। इसके बावजूद, अब भी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना शेष है। कार्यदशा संहिता 2020 में 13 श्रम कानूनों को एकीकृत किया गया। इससे कार्यस्थल पर अच्छा माहौल बना। हालांकि, महिला कामगारों की सुरक्षा, गरिमा, समानता और आर्थिक सशक्तीकरण के मौलिक अधिकारों के लिए प्रेरणा और जागरूकता की दरकार है। संविधान के अनुच्छेद 14-15 में अधिकार भी मिला है, फिर भी एक सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल की आवश्यकता व भरोसा जरूरी है। शी-बॉक्स पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत प्रणाली व्यवस्था को और सुरक्षित करती है। श्रमिकों को सशक्त बनाने के लिए, यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) शुरू हुआ, ताकि भविष्य निधि को एक नौकरी से दूसरी नौकरी में ले जाया जा सके। श्रम निरीक्षकों की भूमिका बदली गई और उन्हें सलाहकार व सुविधादाता बनाया गया, जिससे शोषणकारी निरीक्षक राज खत्म हुआ। उद्योग रिटर्न को पारदर्शी व आसान तरीके से जमा करने के लिए श्रम सुविधा पोर्टल शुरू हुआ।
एम्स्टर्डम स्थित परामर्श फर्म आर्केडिस के अनुसार, भारतीय कर्मचारी औसतन प्रतिवर्ष 2,195 घंटे काम करते हैं, जबकि जर्मनी के हैम्बर्ग जैसे शहरों में यह औसत 1,473 घंटे है। एक भारतीय कर्मचारी 700 से अधिक घंटे काम करता है। स्पष्ट है कि श्रमिकों के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है, जिसके मूल में उत्पादकता से अधिक मानवता को प्राथमिकता देनी होगी। श्रमिक दिवस की मूल भावना के लिए ऐसे भागीरथ प्रयास जरूरी हैं।
