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आधुनिक युद्ध और भविष्य का खाका: ड्रोन, एआई और इलेक्ट्रॉनिक जंग का दौर, भारत के लिए संकेत

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Sat, 14 Mar 2026 06:31 AM IST
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सार

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की शैली को देखते हुए, भारत को युद्ध खत्म होने का इंतजार किए बिना भविष्य को ध्यान में रखकर अपनी सैन्य रणनीति बनानी चाहिए।

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इस्राइली और अमेरिकी हमलों के बाद पश्चिम एशिया में गहराया तनाव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/पीटीआई
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विस्तार

पश्चिम एशिया में अमेरिका-इस्राइल-ईरान के बीच चल रहा त्रिकोणीय संघर्ष किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान लगाना बेहद कठिन है। फिर भी, तेजी से बदलती दुनिया और पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की शैली को देखते हुए, भारत को युद्ध खत्म होने का इंतजार किए बिना अपनी रणनीति व सैन्य व्यवस्था पर विचार करते रहना चाहिए। इस दूरदृष्टि की महत्ता को ध्यान में रखकर ही अभी दो दिन पहले ही भारत सरकार ने रक्षा बल विजन-2047 का दस्तावेज जारी किया है। रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में पूर्ण आत्मनिर्भरता इस परिकल्पना के महत्वपूर्ण बिंदुओं में शामिल है। नए भारत की रक्षा नीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां पारंपरिक सैन्य शक्ति और नई तकनीकों के बीच तालमेल बनाना जरूरी हो गया है। ऐसे में, भविष्य की सैन्य रणनीति का संतुलन आज की अपरिहार्य जरूरत है। ईरान-अमेरिका युद्ध में अमेरिका द्वारा ईरान के रणपोत को डुबाने के लिए पनडुब्बी से टॉरपीडो का इस्तेमाल किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह पहला ऐसा कदम है, जो दिखाता है कि अमेरिका अपने बेहद महंगे व प्रसिद्ध एफ-35 जैसे लड़ाकू विमान के इस्तेमाल में कंजूसी दिखा रहा है। वहीं, ईरान हवाई हमलों के लिए पूरी तरह ड्रोन व मिसाइलों पर निर्भर है, जो अपेक्षाकृत बहुत सस्ते हैं।    
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फ्रांस निर्मित राफेल लड़ाकू विमानों के भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने से भारत की वायु शक्ति को मजबूती मिली है। यह विमान अपनी बहुउद्देश्यीय क्षमता, आधुनिक तकनीक और तेज मारक शक्ति के कारण आधुनिक युद्ध के लिए उपयुक्त माना जाता है। यदि भारत में राफेल के निर्माण, रखरखाव और उन्नयन से संबंधित दीर्घकालिक औद्योगिक साझेदारी स्थापित होती है, तो उससे भारतीय रक्षा उद्योग को भी लाभ मिल सकता है। आधुनिक युद्ध का एक बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक तौर पर भी लड़ा जाता है, जिसमें रडार प्रणाली को भ्रमित करना, संचार नेटवर्क को बाधित करना, डाटा लिंक को जाम करना और उपग्रह आधारित प्रणालियों को प्रभावित करना शामिल है। इसलिए, बड़ी सैन्य शक्तियां इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली पर तेजी से निवेश कर रही हैं। इसके अलावा, पहले ड्रोन का उपयोग मुख्यतः निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए किया जाता था, पर अब वे आक्रामक भूमिका में दिखाई देने लगे हैं। कम संसाधनों में भी ड्रोन तकनीक से सैन्य ताकत बढ़ाई जा रही है, जिससे साफ है कि भविष्य के युद्ध सिर्फ महंगे हथियारों पर निर्भर नहीं रहेंगे। भविष्य में मानव चालित विमान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां और स्वायत्त ड्रोन एक संयुक्त तंत्र के रूप में काम करेंगे। भारत के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अपनी तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों को पूरा करना है, तो दूसरी ओर स्वदेशी अनुसंधान और उत्पादन क्षमता को भी विकसित करना है। यदि भारतीय रक्षा उद्योग वैश्विक तकनीकी प्रवृत्तियों को समझते हुए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, ड्रोन तकनीक और एआई आधारित सैन्य प्रणालियों के विकास में निवेश करता है, तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। इस दिशा में फिलीपींस और इंडोनेशिया को भारत द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात बहुत उत्साहवर्धक संकेत है।
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संभव है कि भविष्य में युद्ध का स्वरूप आज की तुलना में बिल्कुल अलग होगा। भारत तेजस मार्क-2, सुखोई-57 और एफ-35 जैसे विमानों को खरीदने पर भी विचार कर रहा है। पर पश्चिम एशिया का युद्ध दिखा रहा है कि आने वाले समय में लड़ाकू विमानों के साथ सस्ते ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक हमले और एआई आधारित तकनीक भी युद्ध की दिशा तय करेगी। इसलिए, भारत को सिर्फ वर्तमान ही नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के युद्ध से सीख लेकर भविष्य के युद्धों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी चाहिए।
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