अंतहीन बारूदी जंग और भारत का भविष्य-पथ
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विस्तार
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वर इस बार केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं था। उनके शब्दों में स्पष्टता और चेतावनी थी। यह स्वर केवल युद्ध की विभीषिका नहीं, बल्कि आने वाले वैश्विक संकट की गहरी पदचाप सुना रहा था। जब देश का शीर्ष नेतृत्व वर्तमान स्थिति की तुलना कोविड जैसे अभूतपूर्व दौर से करे तो समझ लेना चाहिए कि मामला केवल दो देशों की सरहदी जंग का नहीं है। यह भारत के ऊर्जा गलियारों,साइबर दीवारों और करोड़ों भारतीयों की आजीविका पर सीधा प्रहार है। प्रधानमंत्री ने देश को तैयार रहने का आह्वान किया है। यह एक ऐसी रणनीतिक युद्ध की रणभेरी है जिसमें जीत केवल हथियारों से नहीं बल्कि संयम, दूरदर्शिता और आंतरिक मजबूती से तय होगी। पश्चिम एशिया की यह आग अब केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहने वाली। यह भारत की उस वैश्विक महत्वाकांक्षा की भी परीक्षा है जिसे हमने पिछले दशक में बड़ी मेहनत से संवारा है।
प्रधानमंत्री ने सदन में सबसे बड़े खतरे के रूप में इस संकट के लंबा खिंचने की ओर इशारा किया। यह कोई तात्कालिक टकराव नहीं, बल्कि एक अंतहीन लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है। यह संघर्ष पूरी विश्व व्यवस्था को बदलकर रख देगा। भारत के लिए चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि हमारी विकास की रफ्तार ऊर्जा की अटूट आपूर्ति पर टिकी है। हमने अपनी तैयारियों को विस्तार देते हुए अब 27 के बजाय इकतालीस 41 देशों से कच्चे तेल का आयात शुरू कर दिया है। इसके बावजूद भूगोल की कड़वी हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता। दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा जिस संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है, वहां युद्ध के बादलों ने अनिश्चितता पैदा कर दी है। भारत साढ़े पांच दशक के सबसे बड़े तेल भंडारण और रिफाइनिंग क्षमता के विस्तार पर काम कर रहा है। इसके बावजूद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील मुहाने पर पैदा हुई कोई भी बाधा हमारी ऊर्जा सुरक्षा को संकट में डाल सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने हमें पहले ही उर्वरक और यूरिया का बड़ा घाटा दिया था। अब यह मौजूदा संघर्ष हमारी आर्थिक धमनियों को ही काटने की क्षमता रखता है।
इस युद्ध ने भारत के उस महत्वाकांक्षी गलियारे पर भी संकट के साये डाल दिए हैं, जिसे हम एक नए विश्व व्यापार मार्ग के रूप में देख रहे थे। भारत से यूरोप तक जाने वाला वह रास्ता अब मिसाइलों की जद में है। इजरायल के बंदरगाहों पर मंडराता खतरा और समुद्री परिवहन की दरों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने पूरे मार्ग को फिलहाल जोखिमों से भर दिया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा फायदा उन शक्तियों को मिल सकता है जो अपनी विस्तारवादी आर्थिक नीतियों के लिए कुख्यात हैं। ऐसे में भारत को अपने उन समझौतों पर नए सिरे से गौर करना होगा जो मध्य पूर्व की शांति की बुनियाद पर टिके थे। अब समय उन द्विपक्षीय समुद्री रास्तों और विकल्पों को तेजी से जमीन पर उतारने का है जो हमें किसी एक क्षेत्र की अस्थिरता के प्रति कम संवेदनशील बना सकें।
प्रधानमंत्री ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रहने का निर्देश दिया है। यह एक और अदृश्य लेकिन अत्यंत घातक मोर्चे की ओर इशारा है जिसे हम साइबर युद्ध कहेंगे। भारत अपनी सूचना प्रणाली और डिजिटल बैंकिंग की सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहा है। युद्ध के इस दौर में जब उन देशों की कंपनियां खुद संकट में हों, तब भारत के बिजली ग्रिड और परमाणु संयंत्रों जैसे संवेदनशील ठिकानों के लिए सुरक्षा संबंधी सूचनाएं समय पर मिलना कठिन हो सकता है। विदेशी सॉफ्टवेयरों के जरिए भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने की धमकियां आज डार्क वेब और गुप्त नेटवर्क में तैर रही हैं। ये धमकियां हमें स्वदेशी साइबर कवच की अनिवार्यता समझा रही हैं। प्रधानमंत्री का बाहरी शक्तियों की सक्रियता के प्रति आगाह करना यह संकेत देता है कि भारत अब किसी के भरोसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम में नहीं डाल सकता।
आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चिंता उन करोड़ों भारतीयों को लेकर है जो खाड़ी देशों में रहकर देश का विदेशी मुद्रा भंडार भरते रहे हैं। अब तक करीब पौने चार लाख भारतीय वापस लौट चुके हैं। यह पलायन केवल एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव है। विदेशों से आने वाले धन में भारी गिरावट की आशंका हमारे रियल एस्टेट और बैंकिंग क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है। केरल और पंजाब जैसे राज्यों के गांवों में जो आर्थिक रौनक खाड़ी के निवेश से आती थी, वहां अब एक अनजाना डर और सन्नाटा पसरने लगा है। लौट रहे इन कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए सरकार को युद्ध स्तर पर एक राष्ट्रीय योजना बनानी होगी। इनका कौशल बोझ बनने के बजाय हमारी औद्योगिक शक्ति का हिस्सा बनना चाहिए।
प्रधानमंत्री का सबसे तीखा और समयोचित प्रहार उन तत्वों पर था जो राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देकर क्षुद्र स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए आपदा में अवसर तलाशने की फिराक में रहते हैं। जब देश एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा हो, तब कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले गिरोह सक्रिय हो जाते हैं। यूरिया, गैस और तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का फायदा उठाकर आम आदमी की जेब काटने वालों को सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है। ऐसी शक्तियों को किसी भी सूरत में सफल नहीं होने दिया जाएगा। आपदा के समय घरेलू बाजार में कीमतों पर नियंत्रण रखना और कड़ी निगरानी सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री ने शांत मन से हर चुनौती को स्वीकार करने और हालात का फायदा उठाने वालों को नाकाम करने की बात कही है। यह देशवासियों के लिए एक नैतिक बल की तरह है।
यह संघर्ष कितना लंबा और वीभत्स होगा, इसका अंदाजा फिलहाल किसी को नहीं है। प्रधानमंत्री का सदन में दिया गया बयान साफ करता है कि भारत अब केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक सजग प्रहरी के रूप में तैयार है। उन्होंने लंबी समस्या चलने की बात कहकर पूरे तंत्र और समाज को मानसिक रूप से सुदृढ़ किया है। मतलब साफ है कि यह समय केवल सरकार के तैयार होने का नहीं, बल्कि पूरे देश की एकजुटता का है। सबको तैयार रहने की बात कहकर यह भी इशारा कर दिया गया है कि लड़ाई लंबी है और हर स्थिति के लिए देशवासियों को तैयार रहना होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विश्व की इस महाजंग के बीच भारत की विकास यात्रा की गति धीमी न पड़े। अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखते हुए हमें इस चक्रव्यूह से सुरक्षित बाहर निकलना होगा।
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