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युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं: ईरान संघर्ष पर अमेरिका-इस्राइल की रणनीति पर उठते प्रश्न
थॉमस एल फ्रीडमैन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 25 Mar 2026 06:22 AM IST
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पश्चिम एशिया संघर्ष
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
ईरान के खिलाफ इस युद्ध को लेकर मेरे मन में मिली-जुली भावनाएं रही हैं। हालांकि, तेहरान में एक अच्छी सरकार के सत्ता में आने से ज्यादा पश्चिम एशिया के हालात को सुधारने वाली कोई और चीज नहीं हो सकती, लेकिन मुझे संदेह है कि सिर्फ हवाई हमलों से ईरान को तबाह करके यह बदलाव लाया जा सकता है। काश! राष्ट्रपति ट्रंप ने कोई भी कदम उठाने से पहले, सिर्फ अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने के बजाय किसी और से भी सलाह-मशविरा किया होता। मैं उन कुछ नियमों को साझा करके अपनी बात ठीक से समझा सकता हूं, जिन्होंने लंबे समय से इस क्षेत्र को कवर करने में मेरा मार्गदर्शन किया है।दुश्मन यों हमेशा के लिए खत्म नहीं होते
किसी भी सैन्य खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने का एकमात्र तरीका है-बल और राजनीति का मेल, यानी दूसरी तरफ एक बेहतर और आत्मनिर्भर नेतृत्व तैयार करना। यह काम बेहद पेचीदा है और इसमें हमेशा राजनीतिक समझौते करने की जरूरत पड़ती है। किसी को मार कर हमेशा के लिए समस्या खत्म की जा सकती है, लेकिन इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। मैंने देखा है कि इस्राइल ने अपने ठीक पड़ोस, गाजा में हमास के पूरे नेतृत्व को एक नहीं, बल्कि तीन बार मार गिराया है; इसके बावजूद वह वहां से हमास के नियंत्रण को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर पाया है।
जरा सोचिए कि ईरान में मौजूद नेतृत्व के साथ ऐसा करना, और वह भी लगभग एक हजार मील दूर से हवाई हमले के जरिये कितना मुश्किल होगा। ईरान की कहानी भी कुछ इसी तरह के पैटर्न पर चलती दिख रही है। नेतन्याहू और ट्रंप लगातार ईरान के नेताओं को मारते जा रहे हैं, और ईरान उन्हें फिर से पैदा करता जा रहा है। अब तक, ईरानी विपक्षी आंदोलन के बहादुर सदस्य (जिनके पास सत्ता संभालने के लिए अब भी न तो कोई नेता है और न ही कोई साझा एजेंडा) अपने घरों में ही दुबके हुए हैं और वे तेहरान में सरकारी गुंडों और तेल अवीव से बरसते हुए बमों से खौफजदा हैं।
दुश्मन का पूरा मिल्कशेक न पिएं
मैंने बहुत पहले ही सीख लिया था कि दुनिया के किसी भी देश के लिए यह कभी भी अच्छा विचार नहीं होता कि वह अपने दुश्मन की गरिमा को इस हद तक छीन ले कि उसे लगने लगे कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। अक्सर यही बात बाद में आपको ही भारी पड़ जाती है। वर्षों से मैं देखता आ रहा हूं कि वेस्ट बैंक में इस्राइली बाशिंदे धीरे-धीरे फलस्तीनियों का ‘मिल्कशेक’ पीते जा रहे हैं, और उनके लिए वहां फलस्तीनी राज्य बनने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ रहे हैं। यह नीति इस्राइल को ही भारी पड़ेगी, और लंबे समय में उसके सामने केवल दो ही रास्ते बचेंगे-या तो वह एक ‘द्वि-राष्ट्रीय राज्य’ बने, न कि एक ‘यहूदी राज्य’ या फिर एक ‘रंगभेद वाला राज्य’ बने, न कि एक ‘लोकतांत्रिक राज्य’।
इस्राइल लेबनान में हिजबुल्ला के नेतृत्व और ईरान में इस्लामी शासन को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अगर इस प्रक्रिया में, जिसमें इस्राइल हर बड़े नेता को हमेशा के लिए खत्म करने की कोशिश कर रहा है, वह लेबनान के बड़े इलाकों को तबाह करके उन पर कब्जा भी कर लेता है और ईरान की तेल अर्थव्यवस्था को भी बर्बाद कर देता है, ठीक वैसे ही, जैसे उसने गाजा को तबाह किया था, तो वह दो काम कर चुका होगा। पहला, वह उन्हीं स्थानीय लोगों को अपने खिलाफ कर देगा, जिन्हें वह हिजबुल्ला और इस्लामिक गणराज्य के खिलाफ खड़ा करना चाहता था।
दूसरा, वह उनके देशों को ऐसी आर्थिक बदहाली में छोड़ देगा कि कोई भी उन पर शासन नहीं कर पाएगा। इसलिए, इस्राइल को लेबनान में हमेशा के लिए रहना पड़ेगा।
वाशिंगटन का लक्ष्य इस शासन को चुनिंदा तरीके से कमजोर करना है। इसके लिए वह अहम मुद्दों (जैसे परमाणु संवर्धन, बैलिस्टिक मिसाइल का विकास और प्रॉक्सी गतिविधियां) पर अपनी बात मनवाने के लिए उतना ही दबाव डालता है, जिससे शासन पूरी तरह से ढह न जाए, क्योंकि ऐसा होने से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है। इसके लिए वाशिंगटन को अपने हमलों की गति और तीव्रता के बीच संतुलन बिठाना पड़ता है, ताकि एक तरफ तो शासन कमजोर हो, पर दूसरी तरफ उसकी संस्थागत एकजुटता भी इतनी बनी रहे कि वह बातचीत करने या कूटनीतिक दबाव में आकर झुकने की स्थिति में बना रहे।
ताकतवर और कमजोर की ताकत, आपकी सोच से कहीं ज्यादा बराबर होती हैं
रक्षा सचिव पीट हेगसेथ अपनी छाती फुलाकर ताकत का बखान करते हैं कि उन्होंने ईरान में कितने ठिकानों को उड़ा दिया। पर, अगर अमेरिका इतना ही ताकतवर है, तो ट्रंप प्रशासन तेल की कीमतों में आए उस भारी उछाल से इतना हैरान क्यों था, जो ईरान द्वारा फारस की खाड़ी में जहाजों पर और पड़ोसी अरब देशों के तेल ठिकानों पर हमले के कारण पैदा हुआ था? कीमतों में इस उछाल से ट्रंप पर भारी दबाव पड़ रहा है, क्योंकि जिस हाइपर-कनेक्टेड दुनिया में हम रहते हैं, वहां एक कमजोर ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल की आपूर्ति रोकने के लिए किसी सब्जी के ट्रक के पीछे से दिन में बस एक ड्रोन लॉन्च करने की जरूरत होती है और ऐसा होते ही दुनिया भर में तेल, गैस और खाद की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
इस युद्ध में अब तक कई अप्रिय आश्चर्य देखने को मिले हैं। क्या कोई सुखद आश्चर्य भी हो सकता है? यदि इस वैश्विक नाटक का कोई स्थायी और सुखद अंत होना है, तो वह इसलिए नहीं होगा कि ट्रंप और नेतन्याहू ने हमास, हिजबुल्ला और ईरान के हर नेता को मार गिराया है, या उनसे उनकी हर गोली, मिसाइल और ड्रोन छीन लिया है। असल में, इसकी वजह यह हो सकती है कि उन्होंने बंदूकों वाले इन सख्त लोगों को इतना कमजोर कर दिया कि गाजा, लेबनान और ईरान में असली राजनीति की गुंजाइश पैदा हो सकती है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे ये झगड़े हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं। पर यहां से वहां तक पहुंचने में अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। यदि अमेरिका व इस्राइल को ईरान के निपटाने की जल्दी है, तो इसका अर्थ यही है कि उन्होंने गलत लड़ाई शुरू की है।
©The New York Times 2026