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मलयालम को लेकर क्यों उठ रहे सवाल: भाषा, पहचान और चुनावी समीकरण, केरल-कर्नाटक के बीच विवाद के मायने

Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 25 Mar 2026 06:30 AM IST
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सार
केरल के विधानसभा चुनाव में मलयालम को आधिकारिक दर्जा मिलना बड़ा मुद्दा होगा, पर कर्नाटक की आपत्तियों से उठे सवाल भी गौर करने लायक हैं। 
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मलयालम पर सियासी उबाल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

केरल का नाम ‘केरलम’ किया जाना और मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा की मंजूरी मिलने को कुछ लोग संयोग बता सकते हैं। हालांकि, यह महज संयोग नहीं है। केरल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा इन कदमों का श्रेय लेने की होड़ मचना स्वाभाविक है। पर भाषा विधेयक को लेकर केरल की सीमा के बाहर सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं।


मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा बनाने का पहला प्रयास करीब दस साल पहले कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा, यानी यूडीएफ की सरकार ने किया था। पर तब कर्नाटक सरकार ने एतराज जताया था। राष्ट्रपति ने इसे 1963 के ऑफिशियल भाषा एक्ट के नियमों को हटाकर जमा करने के सुझाव के साथ वापस भेज दिया था। फिर दस साल बाद मौजूदा वाममोर्चा की सरकार ने इसे नए रूप में पारित किया। कर्नाटक इस बार भी इसका विरोध कर रहा है।


नए कानून के तहत सरकारी और सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कक्षा 10 तक मलयालम को पहली भाषा के तौर पर अनिवार्य रूप से पढ़ाना जरूरी होगा। इसके साथ ही, अदालती फैसले और कार्यवाही भी अनिवार्य तौर पर मलयालम भाषा में अनूदित की जाएगी। अब से राज्य विधानसभा में सभी बिल और अध्यादेश मलयालम में पेश किए जाएंगे। राज्य सचिवालय में मौजूदा पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स (ऑफिशियल लैंग्वेज) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग किया जा रहा है। साथ ही, राज्य में मलयालम भाषा विकास निदेशालय भी गठित किया जाएगा। केरल का यह कदम क्रांतिकारी और भारतीय भाषाओं के हित में है, पर कर्नाटक की आपत्तियों को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। कर्नाटक सरकार का तर्क है कि यह कानून केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों की भाषाई अस्मिता के लिए खतरा है।

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण का मानना है कि कासरगोड और केरल के दूसरे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों में भाषाई अल्पसंख्यक छात्र अभी स्कूलों में कन्नड़ को पहली भाषा के तौर पर पढ़ते हैं। केरल में स्कूलों में हिंदी भी पढ़ाई जाती रही है। इसलिए, माना जाता है कि केरल में हिंदी विरोधी माहौल नहीं है। पर केरल के विद्वान इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे। ऐसा ही आरोप कर्नाटक की ओर से लगाया जा रहा है, बस वहां हिंदी की जगह मलयालम को थोपे जाने की बात हो रही है।

हालांकि, केरल सरकार ने सफाई दी है कि जिनकी मातृभाषा तमिल, कन्नड़, तुलु या कोंकणी है, उनके लिए भी कानून में प्रावधान हैं। कानून में इस बात की चर्चा है कि राज्य के भाषायी अल्पसंख्यक अपनी भाषा में राज्य सचिवालय, विभागों और स्थानीय सरकारी कार्यालयों से पत्राचार कर सकेंगे। दूसरी मातृभाषा वाले छात्र नेशनल एजुकेशन प्रोग्राम में शामिल भाषाओं में पढ़ाई कर सकेंगे। इसी तरह, दूसरे राज्यों या विदेश से आने वाले छात्रों को नौवीं, दसवीं और हायर सेकेंडरी स्तर पर मलयालम की परीक्षा देने से छूट मिलेगी।

मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाने का स्थानीय नागरिक स्वागत तो कर रहे हैं, किंतु कुछ लोगों का मानना है कि इस कानून के नाम से ही अलगाववादी और वर्चस्ववादी झलक मिलती है। केरल के एक बौद्धिक वर्ग का कहना है कि बेहतर होता कानून का नाम ‘मलयालम भाषा एक्ट 2025’ की जगह ‘केरल स्टेट लैंग्वेज एक्ट 2025’ होता। इससे समावेशी संदेश जाता। साथ ही, विधेयक में मलयालम की जगह राज्य में प्रयोग में लाई जाने वाली तमिल, कन्नड़, कोंकणी, तुलु व गुजराती का भी जिक्र होता। एक वर्ग का तर्क है कि केरल में जंगलों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की भाषाओं की अस्मिता की रक्षा का बोध भी इसमें होना चाहिए था।

केरल के विधानसभा चुनाव में मलयालम को आधिकारिक दर्जा मिलना बड़ा मुद्दा होगा। राज्य की राजनीति में प्रभावी दखल देने की ताक में बैठी भाजपा, कांग्रेस और वाममोर्चा, सभी इसका श्रेय लेने की कोशिश करेंगे। केरल में मांग उठ रही है कि वहां के सिविल सर्विस सुधार विभाग को मलयालम भाषा विकास विभाग के रूप में बदल दिया जाना चाहिए। कानून में इस विभाग के पुनर्गठन और मलयालम भाषा व विकास निदेशालय बनाने का प्रावधान है। यहां के भाषाशास्त्री इसे स्वागतयोग्य कदम बता तो रहे हैं, पर मलयालम के साथ अन्य भाषाओं के प्रतिनिधित्व का सुझाव भी दे रहे हैं।  

मातृभाषा से इतर समूहों से आने वाले लोग किसी भी भाषा को अवसरों और जरूरत के लिहाज से सीखते हैं। सीखने की इस प्रक्रिया में मजबूरी के बजाय उत्साह जुड़ जाता है, तो भाषाएं समृद्ध होती हैं और वे सौहार्द का प्रतीक बनती हैं। आधिकारिक भाषा बनने के बाद मलयालम भी उसी तरह उम्मीद की भाषा बने, शायद यही केरल के बौद्धिक चाहते हैं। मलयालमभाषियों की इस सोच से हिंदीभाषी विद्वानों, राजनेताओं और प्रशासनिक तंत्र को प्रेरित होना चाहिए।
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