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दिल्ली में कैग रिपोर्ट बनाम सियासत: अनियमितताओं पर उठे सवाल, क्या पारदर्शिता की होगी परीक्षा?
अमर उजाला
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 25 Mar 2026 06:13 AM IST
दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र के पहले दिन पेश कैग की रिपोर्ट पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई गंभीर अनियमितताओं पर सवाल खड़े करती है। यह दुखद ही है कि ऐसी रिपोर्टें राजनीतिक विवादों के दलदल में फंस जाती हैं, जबकि इन्हीं मामलों में तो लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा होती है।
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दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र के पहले ही दिन मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार के कार्यकाल पर गंभीर सवाल तो खड़े करती ही है, इससे जवाबदेही व पारदर्शिता के मुद्दे एक बार फिर राजधानी की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। रिपोर्ट कहती है कि पूर्व मुख्यमंत्री के आधिकारिक निवास के नवीनीकरण पर अनुमानित लागत से 342 फीसदी अधिक खर्च हुआ और इसमें भी आधे से अधिक खर्च महंगी सजावटी वस्तुओं पर किया गया। इसके अतिरिक्त, काम शुरू होने के बाद मंजूरी लेने और टेंडर प्रक्रियाओं में अनियमितताओं का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। इसी रिपोर्ट में 2016-22 के बीच दिल्ली के अस्पतालों में स्टाफ की भारी कमी, औषधियों व उपकरणों की भारी अनुपलब्धता, अधूरी परियोजनाओं व फंड के दुरुपयोग का भी जिक्र है। इस रिपोर्ट के साथ ही पेश की गई लोक लेखा समिति की रिपोर्ट भी ‘आप’ सरकार की आबकारी नीति से 2021-22 में हुए भारी वित्तीय नुकसान की ओर इशारा करती है। आम आदमी पार्टी शुद्ध व नैतिक किस्म की राजनीति के वादे के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन शासन की प्राथमिकताओं, वित्तीय अनुशासन और जनहित को लेकर प्रतिबद्धता को ताक पर रखते ये मुद्दे, जिनकी ओर कैग व संसदीय समिति की रिपोर्टें इशारा कर रही हैं, कुछ और ही कहानी कहते दिख रहे हैं। अब इसे विडंबना ही कहेंगे कि विपक्ष (आप) ने सत्र के पहले ही दिन बहिष्कार का रास्ता चुनकर आरोपों का सामना करने के बजाय टकराव का रास्ता चुना है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि जवाब देना और तथ्यों के आधार पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना भी है। कोरे बहिष्कार से न तो सवालों के जवाब मिलते हैं, और न ही जनता का भरोसा मजबूत होता है। ध्यान देने वाली बात है कि कैग एक सांविधानिक संस्था है, जिसकी रिपोर्ट सरकारों के वित्तीय कामकाज का निष्पक्ष आकलन करती है। इसलिए, इन रिपोर्टों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय गंभीरता से लेने की जरूरत है। सिर्फ तभी वे आत्मसुधार की प्रेरणा बन सकती हैं। अगर विपक्ष रिपोर्ट के निष्कर्षों से सहमत नहीं है, तब भी सदन से पलायन के बजाय उसे तथ्यों व साक्ष्यों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। कैग की रिपोर्ट कल अपना दूसरा बजट पेश कर चुकी दिल्ली की वर्तमान सरकार समेत सभी राज्य सरकारों को सरकारी खर्च में अनुशासन बरतने की सीख देती है। यह दुखद ही है कि ऐसी रिपोर्टें राजनीतिक विवादों के दलदल में फंस जाती हैं, जबकि इन्हीं मामलों में तो लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा होती है।
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