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वैश्विक संकट रातोंरात खत्म नहीं होते: हर रसोई तक पहुंचता पश्चिम एशिया युद्ध, अर्थव्यवस्था को झुलसा रही आंच
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भारत में एलपीजी संकट
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध का भारत के मिड-डे मील से क्या लेना-देना है? इसका संक्षिप्त उत्तर है-बहुत गहरा। 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने एक ऐसी चिंगारी भड़का दी है, जिसकी लपटें अब तेजी से फैल रही हैं। तीन हफ्तों के भीतर ही युद्ध दूर-दराज की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर रहा है और करोड़ों बच्चों व परिवारों के जीवन पर असर डाल रहा है। दुनिया भर में ऊर्जा संकट मंडरा रहा है, जिससे ऐसी असमानता बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है, जो पहले कभी नहीं देखी गई।रसोई गैस (एलपीजी) वह ईंधन है, जिससे भारत में लाखों घरों के चूल्हे जलते हैं। यही गैस प्रधानमंत्री पोषण (पीएम पोषण) मिड-डे मील योजना के तहत लगभग 11 करोड़ बच्चों के लिए भोजन बनाने में उपयोग होती है, और आंगनवाड़ी केंद्रों (जहां छह साल से कम उम्र के लाखों बच्चों को पूरक पोषण मिलता है) की रीढ़ है।
फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाले संकीर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। इसी से होकर दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और गैस गुजरती है। ऐसे में, युद्ध के कारण होर्मुज से होने वाली आपूर्ति पर पड़े दबाव ने गैस सिलिंडरों की उपलब्धता को प्रभावित किया है। नतीजतन, कई आंगनवाड़ी केंद्रों और स्कूलों की रसोइयों में या तो गैस की अनियमित आपूर्ति हो रही है या उन्हें मजबूरन लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है।
भारत में मिड-डे मील योजना से जुड़े लगभग 27 लाख रसोइए और सहायक कर्मियों में से 90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। इनमें से कई महिलाएं तो हालिया संकट से पहले भी लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर थीं। अब एलपीजी संकट गहराने के साथ और अधिक महिलाएं पारंपरिक चूल्हों की ओर लौट रही हैं।
दिल्ली समेत देश के कई शहरों की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोग भी एक बार फिर चूल्हों की ओर लौटने को मजबूर हैं। सूरत के टेक्सटाइल उद्योगों में कामकाज धीमा पड़ रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और ओडिशा से आए प्रवासी मजदूर गैस सिलिंडर की किल्लत और महंगाई के कारण अपने घरों को लौट रहे हैं। आम परिवारों पर भी महंगाई की मार स्पष्ट दिख रही है, क्योंकि घरेलू (गैर-सब्सिडी) एलपीजी सिलिंडर की कीमत में 60 रुपये की वृद्धि हो चुकी है, जबकि काले बाजार में इसकी कीमतें आसमान छू रही हैं। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से बाइक से सामान पहुंचाने वालों का मुनाफा खत्म हो रहा है, और एफएमसीजी कंपनियां डिटर्जेंट, बिस्कुट, टूथपेस्ट और पैकेजिंग जैसे उत्पादों की लागत बढ़ाने की चेतावनी दे रही हैं।
उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को भले ही सब्सिडी वाला गैस सिलिंडर मिल रहा हो, पर लंबी देरी के कारण उन्हें भी लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है। हालांकि, जिन लोगों के पास पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी), महंगे दामों पर गैस खरीदने की क्षमता, या फिर इंडक्शन चूल्हे के साथ भरोसेमंद बिजली है, वे इस संकट से कुछ हद तक सुरक्षित हैं। पर अधिकांश लोगों के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं।
गौरतलब है कि भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इनका करीब 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज मार्ग से होकर ही गुजरता है। इस मार्ग में आई बाधाएं, भारत में मौजूदा एलपीजी संकट की एक बड़ी वजह बन गई हैं। पिछले हफ्ते, दो भारतीय एलपीजी टैंकर होर्मुज पार कर गुजरात के बंदरगाहों तक पहुंचने में सफल रहे। इनके जरिये करीब 92,712 टन एलपीजी भारत पहुंची, जो देश की एक दिन की जरूरत के बराबर है। खबरें हैं कि कुछ और टैंकर भारत आ सकते हैं। यह भारत की सक्रिय कूटनीति और तेहरान के साथ सीधे तालमेल का नतीजा है। इन सबके बावजूद यह संकट रातोंरात खत्म होने वाला नहीं है।
भारत हर साल लगभग 3.1 से 3.3 करोड़ टन एलपीजी की खपत करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन इसकी केवल लगभग 40 फीसदी जरूरत ही पूरी कर पाता है। बाकी की आपूर्ति खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ताओं द्वारा होर्मुज के रास्ते ही की जाती है। हालांकि, भारत ने आपातकालीन स्थिति के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडारण तैयार कर रखा है, जो आयात बंद होने की स्थिति में दो से तीन महीने तक काम आ सकता है। पर रसोई गैस के मामले में अतिरिक्त भंडार मौजूद नहीं है। यही वजह है कि मौजूदा बाधाएं पेट्रोल पंपों की तुलना में रसोई घरों को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं। इसलिए, रसोई ईंधन के लिए कोई भरोसेमंद ‘प्लान बी’ (वैकल्पिक योजना) एक ही समाधान पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि इसमें विविधता, भंडारण और मांग में लचीलापन, इन तीनों का संतुलित मेल जरूरी है। आपूर्ति के स्रोत बढ़ाना-जैसे अमेरिका और खाड़ी देशों के अलावा अन्य देशों से भी दीर्घकालिक समझौते करना-एक ऐसा कदम है, जिस पर पहले से काम चल रहा है। इसका असर अमेरिका से बढ़ते आयात में साफ दिख रहा है।
ऐसे में, भारत को घरेलू स्तर पर एलपीजी उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं का गंभीरता से आकलन करना होगा और भंडारण क्षमता का विस्तार भी जरूरी होगा, क्योंकि मंगलूरू और विशाखापत्तनम में मौजूद सुविधाएं मांग के मुकाबले सीमित हैं। पाइपलाइन से गैस (पीएनजी) वितरण का विस्तार, बिजली से खाना पकाने के विकल्प और वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग-ये सभी मिलकर दबाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। लेकिन एक ऐसे देश में, जहां असमानताएं बेहद गहरी हैं, रसोई ईंधन के लिए कोई एक सार्वभौमिक 'प्लान बी' संभव नहीं है। कम आय वाले परिवारों और छोटे दुकानदारों के लिए तुरंत कोई वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढना और भी कठिन है। ऐसे में कोयला और लकड़ी जैसे पारंपरिक ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ता है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव सामने आते हैं।
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने ऊर्जा संकट को एक कड़वी सच्चाई बना दिया है। यह उस धुएं में साफ दिखती है, जो स्कूल के बच्चों के लिए खाना बनाती महिलाओं की आंखों में चुभता है; यह उस कर्ज में झलकती है, जो रसोई गैस खरीदने के लिए लिया जा रहा है; और यह उस महंगाई में महसूस होती है, जो धीरे-धीरे हर घर के बजट को खा रही है।
जाहिर है, भारत को अब नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में अपनी रफ्तार तेज करनी होगी और देश के भीतर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना होगा, ताकि भविष्य में ऐसे संकटों का सामना मजबूती से किया जा सके।