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कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं: इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मत बनाइए, असफलता भी देती है नए रास्ते
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कोई परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
हाल ही में सिविल सेवा यानी कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का रिजल्ट आया। हर साल ही आता है। जो सफल होते हैं, उन्हें हर ओर से बधाइयां मिलती हैं। बहुत से कोचिंग सेंटर रातोंरात उनके पास पहुंच जाते हैं और उनसे कहते हैं कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि उन्होंने उनके ही कोचिंग सेंटर से पढ़ाई की है। फिर ये सेंटर्स इन बच्चों की सफलता का सेहरा अपने सिर बांधते हैं। मेट्रो शहरों, कस्बों, गांवों, सब जगह आईएएस, आईपीएस, आईआरएस आदि बनने के लिए न केवल बच्चों, बल्कि उनके माता-पिताओं में भी भारी क्रेज देखा जाता है।सोचा जाता है कि एक बार बच्चा बड़ा अफसर बन गया, तो न केवल उसकी, बल्कि पूरे परिवार और आसपास वालों की पौ-बारह हो जाएगी। ऐसा होता भी है। खबरें आती हैं कि जो लड़के इस परीक्षा में सफल होते हैं, उनकी सूची देखकर लड़की वाले सूटकेसों में रकम भरकर रिश्ते का प्रस्ताव लेकर पहुंच जाते हैं। इस परीक्षा में किसी की सफलता के लिए उसके घर वाले अपनी जमीन तक बेच देते हैं। पढ़ाई के लिए भारी-भरकम कर्ज भी लेते हैं। हाल ही में कई विफल रहे लड़के-लड़कियों के वीडियो देख रही थी, जिनमें बहुत से युवा रो-रोकर बता रहे हैं कि उन्होंने इस परीक्षा को पास करने के लिए अपने जीवन के कितने वर्ष खपा दिए। फिर भी सफलता नहीं मिली।
जिन्हें सफलता मिली है, वे बधाई के पात्र हैं। लेकिन जिन्हें सफलता नहीं मिली, वे पृष्ठभूमि में छूट जाते हैं। वैसे भी हम विफलता की नहीं, सफलता की कहानियां ही कहना जानते हैं, क्योंकि सफलता की कहानियों से दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं। कहावत भी है कि नथिंग सक्सीड लाइक सक्सेस।
दिल्ली के राजेंद्र नगर और मुखर्जी नगर में ऐसे युवाओं की भीड़ देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि कितने युवा मेहनत करने, बड़ी रकम खर्च करने और सालों-साल लगाने के बावजूद विफल रहते हैं। हाल ही में पूर्व आईआरएस एवं कांग्रेस नेता उदित राज ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यूपीएससी में एक हजार पद होते हैं। आवेदन करने वालों की संख्या दस लाख के आसपास होती है। 2024 के प्रिलिम्स में 13.4 लाख विद्यार्थी परीक्षा में शामिल हुए थे। उहोंने यह भी कहा कि जो इस परीक्षा में पास नहीं होते, उनका जीना मुश्किल हो जाता है।
एक बार उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा था कि उन्होंने कांशीराम जी से कहा कि वह आईएएस बनना चाहती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि कलेक्टर तुम्हारे सामने खड़ा रहेगा। बात भी सही है। जिस सिविल सेवा को अपने देश में बहुत प्रभावशाली और ताकतवर पद के रूप में देखा जाता है, उनकी हैसियत नेताओं के सामने कुछ नहीं होती। समय-समय पर ऐसे किस्से सुनाई भी देते रहते हैं।
अक्सर सफल होने वाले युवा, दूसरे युवाओं को सलाह देते दिखते हैं कि उन्हें परिश्रम और धैर्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यह बात कितनी बेमानी लगती है, जब लाखों विफल युवा आंसू भरी आंखों से इन बातों को देखते-सुनते हैं। इस पर बारहवीं फेल नामक फिल्म बन चुकी है। हालांकि यह एक हैप्पी एंडिंग वाली (सुखांत) फिल्म थी, लेकिन वास्तविक जीवन में अक्सर हैप्पी एंडिग होती नहीं है। कैलाश मंजू बिश्नोई ने कलेक्टर साहिबा नामक उपन्यास भी दो खंडों में लिखा है।
यह लेखिका ऐसे कई युवाओं से मिली है, जिन्होंने कहा था कि उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी गलती यही की कि इस परीक्षा को पास करना अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बना लिया। अंततः कामयाबी नहीं मिली, तो पाया कि जो लोग उनसे छह साल जूनियर थे, वे भी अपने कॅरिअर में उनसे बहुत आगे निकल चुके थे। उनके लिए बहुत से रोजगारों के अवसर भी खत्म हो चुके थे, क्योंकि उम्र निकल गई थी। घर वालों के जो संसाधन खर्च हुए, उनकी तो बात ही क्या की जाए!
सफलता अच्छी बात है, लेकिन सफल होने का जुनून इतनी अच्छी बात भी नहीं कि बड़ी संख्या में युवा अवसाद (डिप्रेशन) के शिकार हो जाएं और जीवन से उनका भरोसा उठ जाए, कोई सहानुभूति तक उन्हें न मिले। बहुत से युवाओं का कहना है कि वे यूपीएससी इसलिए करना चाहते हैं, ताकि देश की सेवा कर सकें। यह जो देश सेवा की बात है, वह क्या किसी और क्षेत्र में रहकर नहीं की जा सकती। क्या वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, मीडियाकर्मी, मजदूर, किसान, सैनिक, व्यापारी आदि देश की सेवा नहीं करते। बिल्कुल करते हैं। हां, उन्हें इतना सेलिब्रेट नहीं किया जाता, जबकि अगर ये लोग न हों, तो देश एक पल भी न चले। इसलिए चाहे जो भी परीक्षा दीजिए, उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मत बनाइए। जीवन में उससे इतर भी हर दिन बहुत कुछ अच्छा किया जा सकता है। जीवन में विकल्पों की कमी नहीं होती है, बस आपको उसे अपनाने और सजग रहने की जरूरत होती है।