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तप, पतन और पितृपूजा: अमावस्या पर क्यों करते हैं श्राद्ध, पौराणिक कथा में छिपा उत्तर

Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 22 Mar 2026 07:09 AM IST
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सार
अमावसु नामक एक पितर को देखकर अच्छोदा का मन विचलित हो उठा। वह अमावसु के साथ रहने की अभिलाषा करने लगी। यह कामना केवल मन में उत्पन्न हुई थी, परंतु यही मानसिक कदाचार उसके पतन का कारण बन गया।
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श्राद्ध की पौराणिक कथा - फोटो : ANI

विस्तार

मरीचि के वंशज देवताओं के पितृगण जिस लोक में निवास करते हैं, वह सोमपथ नाम से प्रसिद्ध है। देवता भी श्रद्धा और भक्ति से उन्हीं पितरों का ध्यान करते हैं। वे पितृगण यज्ञपरायण हैं और ‘अग्निष्वात्ता’ कहलाते हैं। जिस लोक में उनका निवास है, वहीं अच्छोदा नाम की एक पुण्यसलिला नदी प्रवाहित होती है। यह नदी उन्हीं पितरों की मानसी कन्या मानी जाती है। प्राचीन काल में पितरों ने उसी स्थान पर अच्छोद नाम का एक दिव्य सरोवर भी निर्मित किया था, जो अत्यंत पवित्र माना जाता है।


पूर्वकाल में अच्छोदा ने एक सहस्र दिव्य वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस कारण संपूर्ण लोकों में उसकी चर्चा होने लगी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर पितृगण स्वयं उसे वर प्रदान करने के लिए उसके समीप आए। वे सभी पितर दिव्य रूपधारी थे। उनके शरीर पर दिव्य सुगंध का लेप लगा था, गले में सुंदर पुष्पमालाएं शोभित थीं। वे सभी नवयुवक, बलसंपन्न और कामदेव के समान सौंदर्यशाली प्रतीत होते थे।


उन पितरों में अमावसु नामक एक पितर को देखकर अच्छोदा का मन विचलित हो उठा। वह अमावसु के साथ रहने की अभिलाषा करने लगी। यह कामना केवल मन में उत्पन्न हुई थी, परंतु यही मानसिक कदाचार उसके पतन का कारण बन गया। उस क्षण उसके योगबल का नाश हो गया और वह स्वर्गलोक से च्युत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसने पहले कभी पृथ्वी का स्पर्श नहीं किया था, अतः यह पतन उसके लिए अत्यंत पीड़ादायक और लज्जाजनक था।
इसी कारण अमावस्या के दिन किया गया श्राद्ध, तर्पण और पितृपूजन अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया।  

अपनी सहस्र वर्षों की तपस्या नष्ट हो जाने से अच्छोदा अत्यंत लज्जित हुई। वह रोती हुई पितरों से पुनः अपनी प्रतिष्ठा और तपोबल लौटाने की प्रार्थना करने लगी। पितृगण द्रवित हो उठे। उन्होंने उसे सांत्वना दी और मधुर, मंगलमयी वाणी में भविष्य का रहस्य बताया। पितरों ने कहा, ‘वरवर्णिनी! स्वर्गलोक में दिव्य शरीर से किए गए कर्मों का फल तुरंत भोगना पड़ता है। इसके विपरीत मनुष्य योनि में कर्मों का फल मृत्यु के पश्चात जन्मांतर में भोगना पड़ता है। इसलिए पुत्री, तुम अपने तप का पूर्ण फल आगे के जन्मों में प्राप्त करोगी। पितृकुल के नियम का उल्लंघन करने के कारण द्वापर युग में तुम मत्स्य-योनि में जन्म लोगी। इसके बाद मुक्त होकर तुम राजा उपरिचर वसु की कन्या बनोगी। कन्या रूप में तुम्हें दुर्लभ लोकों की प्राप्ति होगी। बदरी वृक्षों से युक्त एक द्वीप में तुम्हें महर्षि पराशर से एक महान पुत्र की प्राप्ति होगी, जो बादरायण नाम से प्रसिद्ध होगा। वही नारायण का अंशावतार होगा और एक वेद को चार भागों में विभक्त करेगा। वही वेदव्यास कहलाएगा। पुरुवंशी राजा शांतनु के संयोग से तुम्हें चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र होंगे। बुद्धिमान विचित्रवीर्य के वंश से क्षेत्रज पुत्रों के रूप में धृतराष्ट्र और पाण्डु उत्पन्न होंगे, जिनसे महाभारत की महान कथा की रचना होगी। इसके पश्चात तुम प्रौष्ठपदी तिथि में अष्टका रूप से पितृलोक में जन्म लोगी। वहां तुम आयु, आरोग्य और संपूर्ण मनोवांछित फलों की प्रदात्री बनोगी। मनुष्यलोक में तुम सत्यवती के नाम से विख्यात होगी और आगे चलकर नदियों में श्रेष्ठ पुण्यसलिला अच्छोदा नाम से पुनः नदी रूप में प्रकट होगी।’

इतना कहकर पितरों का वह दिव्य समुदाय अंतर्धान हो गया। समय के प्रवाह में अच्छोदा ने अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वे सभी जन्म और फल प्राप्त किए। उसका पतन भी वास्तव में एक महान उद्देश्य का कारण बना, क्योंकि उसी से वेदव्यास, महाभारत और पितृपूजा की महान परंपरा का उद्भव हुआ। इस प्रकार अच्छोदा की कथा तप, पतन, करुणा और दिव्य विधान का अद्भुत उदाहरण बन गई।
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