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तकनीक और शुचिता: परीक्षा सुरक्षा के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी रोक सही, लेकिन स्थायी सुधार भी जरूरी
अमर उजाला
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 20 Jun 2026 06:43 AM IST
केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69(ए) के तहत टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध की वजह यह बताई है कि कुछ संगठित गिरोह टेलीग्राम की तकनीकी संरचना का दुरुपयोग करते हुए फर्जी प्रश्नपत्र और भ्रामक सूचनाओं के नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं और इस तरह से यह एक डार्क वेब बन गया है।
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नीट-यूजी पुनर्परीक्षा से पहले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाने के केंद्र सरकार के निर्णय को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सही ठहराया जाना वर्तमान परिस्थितियों में परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है। यह देखते हुए कि पिछले कुछ वर्षों में देश की अनेक भर्ती तथा प्रवेश परीक्षाएं प्रश्नपत्र लीक और तकनीकी धोखाधड़ी की भेंट चढ़ चुकी हैं, सरकार व परीक्षा एजेंसियों पर यह दबाव स्वाभाविक ही है कि वे किसी भी कीमत पर परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित बनाएं। ऐसे में, अगर कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म अपराधियों के लिए माध्यम बन रहा है, तो उस पर कार्रवाई की जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69(ए) के तहत टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध की वजह यह बताई है कि कुछ संगठित गिरोह टेलीग्राम की तकनीकी संरचना का दुरुपयोग करते हुए फर्जी प्रश्नपत्र और भ्रामक सूचनाओं के नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं और इस तरह से यह एक डार्क वेब बन गया है। टेलीग्राम पर अदालत की रोक के तुरंत बाद जिस तरह से राजस्थान में नीट का फर्जी पेपर बेचने की खबरें सामने आई हैं, उससे सरकार के पक्ष की ही पुष्टि होती है। दरअसल, देश में सोशल मीडिया के अनियंत्रित प्रसार का फायदा उठाते हुए कई बार अपराधी किस्म के तत्व सिस्टम में ही सेंध लगाने की कोशिश करने लगते हैं। विडंबना यह है कि इन पर नियंत्रण की कोशिशों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कमजोर किया जाने लगता है। लेकिन, जब यही स्वतंत्रता समाज को भीतर से कमजोर करने लगे, तो हाथ पर हाथ रखकर तो नहीं बैठा जा सकता। उच्च न्यायालय ने भी माना है कि टेलीग्राम पर जो प्रतिबंध लगे हैं, वे सीमित अवधि के लिए हैं, और जिन्हें वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लगाया गया है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकार, दोनों ही अहम हैं, पर दोनों के साथ जिम्मेदारी का भाव भी उतना ही जरूरी है। जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल गलत ढंग से होने लगे, तब समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। ऐसे में, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बनती है कि वे संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करें। टेलीग्राम पर लगाया गया अस्थायी प्रतिबंध इसी दिशा में उठाया गया एक तात्कालिक कदम है। हालांकि, जरूरी है कि इसे परीक्षा प्रक्रिया में व्यापक और स्थायी सुधारों का विकल्प न बनने दिया जाए।
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