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मंदी मांगे दबंग कदम: वास्तविकता के दोराहे पर आशा और निराशा के बीच फंसा भारत
Mon, 02 Sep 2019 03:40 AM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर
Published by: शंकर अय्यर
Updated Mon, 02 Sep 2019 03:40 AM IST
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मंदी
- फोटो : a
पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के दावे और मंदी की वास्तविकता के दोराहे पर भारत आशा और निराशा के बीच फंसा हुआ है। सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी किए गए आंकड़े अर्थव्यवस्था की स्थिति का एक निर्मम सुबूत है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर साल भर पहले आठ फीसदी थी, जो घटकर पांच फीसदी रह गई है, जो छह साल में सबसे कम तो है ही, सबसे निराशावादी अर्थशास्त्रियों के अनुमान से भी कम है। स्पष्ट है कि मंदी को झुठलाने की अब कोई गुंजाइश नहीं है।
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इस पर बहस हो रही है कि यह मंदी चक्रीय है या ढांचागत। जब अर्थव्यवस्था ब्याज दर में कटौतियों और सरकार द्वारा किए गए निवेश पर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती, तब मंदी चक्रीय लगती है, लेकिन है वह ढांचागत। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में वृद्धि दर 12.1 फीसदी से घटकर 0.6 फीसदी, कृषि क्षेत्र में 5.1 फीसदी से 2.0 फीसदी, निर्माण क्षेत्र में 9.6 फीसदी से 5.7 फीसदी पर आ गई है। सकल मूल्य वृद्धि 7.7 फीसदी से 4.9 फीसदी पर आ गई है। विकास बहुत हद तक निजी खपत पर निर्भर करता है। यथास्थितिवादियों को खपत में कमी की बात नहीं पची और उन्होंने ऑटोमोबाइल बिक्री में मंदी का ठीकरा निर्माताओं पर फोड़ दिया। जबकि तथ्य साफ-साफ बताते हैं कि निजी खपत व्यय में मात्र 3.1 फीसदी की वृद्धि हुई है! खपत में कमी विभिन्न कारणों से आई है-नोटबंदी से लेकर जीएसटी में प्रणालीगत दोष, कृषि क्षेत्र के संकट से लेकर बैलेंस शीट के तनाव तक। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के डिफॉल्ट संकट ने कर्ज की सहायक शाखाओं के पतन को बढ़ाया। खपत में भारी गिरावट ने अर्थव्यवस्था में कार्यप्रणाली और संरचनात्मक खामियों को बढ़ा दिया।
मेरी पुस्तक एक्सीडेंटल इंडिया में यह साबित किया गया है कि बदलाव केवल संकटों के मद्देनजर ही आता है। सरकार ने अब बाजार की भावनाओं को ऊपर उठाने के लिए कुछ नीतियां फिर से लागू की हैं और कुछ नई नीतियां बनाई हैं। एफडीआई की सीमा खत्म करना, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर बढ़ाए कर को वापस लेना और रेपो रेट से कर्ज को जोड़ना लीक से हटकर किए गए काम हैं। बैंकों का विलय अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए एक अच्छी योजना है।
अर्थव्यवस्था को आईसीयू से निकालने के लिए आमूलचूल परिवर्तन जरूरी है। खपत को पुनर्जीवित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। जीएसटी दरों में कटौती, कम ब्याज दर, एक बार का लांग टर्म कैपिटल गेन (एलटीसीजी) टैक्स ब्रेक और यहां तक कि नकद हस्तांतरण आदि पर विचार किया गया है। निराशावादी लोग नैतिक खतरे के बारे में चिंता करते हैं और तर्क देते हैं कि नकद हस्तांतरण का असर रैखिक नहीं है, फिर इसकी वित्तीय लागत भी है। जवाबी तर्क यह है कि एलटीसीजी से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई जीएसटी से हो सकती है। सफलता रणनीति के चयन और उसकी प्रभावकारिता पर निर्भर करती है। जबकि उपभोग को इच्छा और खर्च करने की क्षमता से परिभाषित किया जाता है। सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता आज खर्च करके आने वाले कल के बारे में आश्वस्त हो सकता है। इस भरोसे का संकेत सरकार से मिलने की जरूरत है। इसके लिए उसे रिजर्व बैंक से मिली भारी राशि से अलग अपनी बैलेंस शीट को व्यवस्थित रखना होगा, जिसका बड़ा हिस्सा पहले से ही बंटा हुआ है।
विकास के खर्च के लिए सरकार को संसाधन जुटाने होंगे। अगर सरकार मंदी से बाहर निकलने का मन बनाती है, तो ऐसा संभव है। उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति आज जीवन बीमा निगम (एलआईसी) है। संभवतः दुनिया के सबसे बड़े बीमाकर्ताओं में से एक एलआईसी अगर शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो, तो इतना पैसा उगाह सकती है, जिससे राजनीतिक लड़ाई जीती जा सकती है। दुनिया की शीर्ष बीमा कंपनियां 50 अरब डॉलर और उससे अधिक के बाजार मूल्यों का दावा करती हैं। इस पर अमल करने के लिए पब्लिक इश्यू को घरेलू निवेशकों, फंडों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों तक सीमित रखा जा सकता है। शुरुआत में सरकार इसकी 51 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास रख सकती है, जिसे कम करके अंततः 26 फीसदी तक लाया जा सकता है।
दूसरी बात, नीति आयोग ने विनिवेश के लिए 23 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की सूची बनाई है। उन्हें एक संप्रभु ट्रस्ट में रखा जा सकता है और फिर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को दिया जा सकता है। विनिवेश के लिए कोई सही समय नहीं होता, केवल सही कारण होता है। हां, विलय अच्छी बात है, पर मूल्यों के क्षरण के बारे में क्या कहा जाए? एचडीएफसी बैंक का बाजार मूल्य सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों के कुल बाजार मूल्य से अधिक है। तीसरी बात, सभी बेकार और अधिशेष भूमि को अपने कब्जे में लेकर राष्ट्रीय भूमि बैंक बनाना चाहिए। इस भूमि को किफायती आवास की परियोजनाओं और लघु, कुटीर और मध्यम उद्यमों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इस तरह से अर्जित धन नागरिकों पर से कर के बोझ को कम कर सकता है, विभिन्न क्षेत्रों में लघु, कुटीर और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण के पुनर्वितरण का पुनर्गठन कर सकता है और लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं-पानी के प्रावधान से लेकर शहरीकरण तक-के खर्च को वहन कर सकता है। इन सबसे रोजगार पैदा होंगे।
लंबे समय से अर्थव्यवस्था एक संरचनात्मक ढर्रे में फंसी हुई है। एक के बाद एक आने वाली सरकार ने 'पैसा फेंको, समस्या खत्म हो जाएगी' वाला फॉर्मूला अपनाया- वर्ष 2010 से 2019 के बीच केंद्र का खर्च दोगुना हो गया है। और राज्यों ने भी अपना खर्च तिगुना बढ़ाया। यूपीए ने बैलेंस शीट को गतिमान रखने के लिए भारी उधार और बैंक फंड का उपयोग किया। मौजूदा शासन ने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और उस पर टैक्स का इस्तेमाल किया। राजस्व पैदा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का उपयोग किया गया-ओएनजीसी ने एचपीसीएल को खरीदा-कंपनियों ने लाभांश जारी किए और बायबैक चेक दिए। सरकार पर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएचएआई) का बकाया था, लेकिन उसे चुकाने के बजाय सरकार ने उल्टे उन्हें कर्ज लेने के लिए कहा। शुक्रवार को जारी आंकड़े बताते हैं कि यह अनदेखी करने के अर्थशास्त्र का नतीजा है।
-लेखक आईडीएफसी इंस्टी. के विजिटिंग फेलो हैं।