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गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार: हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का संवेदनशील फैसला

Harvansh Dixit हरवंश दीक्षित
Updated Fri, 13 Mar 2026 07:05 AM IST
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सार

हरीश राणा मामले में शीर्ष न्यायालय का निर्णय यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि संविधान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदनशीलता में निहित है। जब न्यायपालिका मानवीय गरिमा व करुणा को केंद्र में रखकर जीवन के अधिकार की व्याख्या करती है, तब वह समाज को अधिक संवेदनशील और मानवीय दिशा भी प्रदान करती है।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार

बुधवार, 11 मार्च, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सांविधनिक विमर्श में एक नया पृष्ठ जोड़ा। सर्वोच्च न्यायालय ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को पैसिव यूथेनेसिया, अर्थात इच्छामृत्यु की अनुमति देकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह निर्णय संविधान की न्यायिक व्याख्या के साथ ही उस संवेदनशील क्षण का प्रतीक है, जहां संविधान, मानवीय करुणा और चिकित्सकीय यथार्थ एक-दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं।
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हरीश राणा का जीवन पिछले तेरह वर्षों से एक लंबी और पीड़ादायक स्थिरता में अटका हुआ था। वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान वह एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी। इस दुर्घटना के बाद से वह लगातार कोमा की अवस्था में हैं। चिकित्सकों के अनुसार, उनके स्वस्थ होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है और वह जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे ही जीवित हैं। लगातार बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर घाव भी हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में उनके माता-पिता ने ही अदालत से अनुरोध किया कि उनके बेटे को इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए, क्योंकि अब उसके जीवन में पुनर्वास की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है।
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इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की  जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया कि हरीश राणा को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए और चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में जीवनरक्षक उपकरणों को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। पैलिएटिव केयर ऐसी चिकित्सा व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों को आराम और गरिमा प्रदान करना होता है, जब उपचार की संभावना समाप्त हो चुकी हो।

अदालत के लिए इस निर्णय तक पहुंचना आसान नहीं था। जस्टिस पारदीवाला ने इसे अत्यंत दुखद स्थिति बताते हुए कहा कि यह न्यायालय के लिए भी एक कठिन निर्णय है, किंतु किसी व्यक्ति को अनंत पीड़ा में बनाए रखना भी न्यायोचित नहीं हो सकता। शीर्ष न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि जिस तरह प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, उसी क्रम में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को भी देखा जाना चाहिए।

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सांविधानिक आधार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अनुच्छेद की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए इसे गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार से जोड़ा है। इसी सांविधानिक दृष्टिकोण ने इच्छामृत्यु के प्रश्न को न्यायिक विमर्श का विषय बनाया। इच्छामृत्यु से संबंधित न्यायिक विचार का विकास भारत में धीरे-धीरे हुआ है। वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। इसके बाद 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक निर्णय में अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को  सांविधानिक मान्यता प्रदान की और ‘लिविंग विल’ की अवधारणा को स्वीकार किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत कोई व्यक्ति पहले से यह लिखित रूप में घोषित कर सकता है कि असाध्य बीमारी या ऐसी स्थिति में, जहां सामान्य जीवन की संभावना समाप्त हो जाए, उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे जीवित न रखा जाए।

हरीश राणा का मामला इसी विकसित सांविधानिक ढांचे का एक संवेदनशील उदाहरण है। यहां अदालत के सामने केवल कानूनी प्रश्न नहीं था, बल्कि एक परिवार की पीड़ा, एक युवा जीवन की असहाय अवस्था और चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं भी थीं। न्यायालय ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय दिया। इस मामले ने पैसिव और एक्टिव यूथेनेसिया के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया है। पैसिव यूथेनेसिया का अर्थ है कि रोगी को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम जीवनरक्षक साधनों को हटा लिया जाए, जिससे उसकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके। इसके विपरीत एक्टिव यूथेनेसिया में दवा या किसी अन्य उपाय के माध्यम से मृत्यु दी जाती है। भारत में एक्टिव यूथेनेसिया अब भी अवैध है, जबकि पैसिव यूथेनेसिया को न्यायिक दिशा-निर्देशों के अंतर्गत अनुमति दी गई है। इस संवेदनशील सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने संस्कृत का एक प्रसिद्ध श्लोक भी उद्धृत किया-

चिन्तायाश्च चितायाश्च बिन्दुमात्रं विशिष्यते,
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवनम्। 

अर्थात चिंता और चिता में केवल एक बिंदु का अंतर है; चिता मृत शरीर को जलाती है, जबकि चिंता जीवित व्यक्ति को भीतर से। यह श्लोक केवल एक साहित्यिक उद्धरण नहीं था, बल्कि उस पीड़ा की ओर संकेत था, जिसे हरीश राणा का परिवार पिछले तेरह वर्षों से सह रहा था।

इस निर्णय ने भारतीय समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी रखा है कि क्या जीवन का अधिकार केवल सांसों की निरंतरता तक सीमित है, या उसमें मानवीय गरिमा और पीड़ा से मुक्ति का भी स्थान है। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि संविधान मानव गरिमा को अत्यंत महत्व देता है और जब जीवन केवल असहनीय कष्ट का पर्याय बन जाए, तब सांविधानिक व्यवस्था को मानवीय संवेदना के साथ उस पर भी विचार करना चाहिए। साथ ही, यह निर्णय स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी कई चुनौतियां प्रस्तुत करता है। भारत में अब भी पैलिएटिव केयर की व्यवस्था सीमित है। असाध्य रोगों से पीड़ित अनेक मरीजों को पर्याप्त दर्द निवारण और मानसिक सहयोग उपलब्ध नहीं हो पाता। यदि इस दिशा में स्वास्थ्य नीति अधिक संवेदनशील और सुदृढ़ हो सके, तो अनेक रोगियों और उनके परिवारों को अत्यधिक पीड़ा से राहत मिल सकती है।

हरीश राणा का मामला अंततः केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि एक मानवीय कहानी भी है-एक ऐसे युवा की कहानी, जिसका जीवन एक दुर्घटना के बाद तेरह वर्षों तक एक मौन संघर्ष में बदल गया। यह निर्णय हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि संविधान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदनशीलता में निहित है। जब न्यायपालिका जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए मानवीय गरिमा और करुणा को केंद्र में रखती है, तब वह केवल कानून का पालन नहीं करती, बल्कि समाज को अधिक संवेदनशील और मानवीय दिशा भी प्रदान करती है। हरीश राणा के मामले में दिया गया निर्णय इसी सांविधानिक करुणा का उदाहरण है, जहां न्याय, संवेदना और मानवीय गरिमा एक साथ दिखाई देते हैं।

(लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में विधि संकाय के प्रोफेसर व डीन हैं।)
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