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भेद बढ़ाता शिक्षा का अधिकार: आरटीई अधिनियम के डेढ़ दशक बाद उठते सवाल

डॉ. सुरजीत सिंह Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 02 May 2026 06:56 AM IST
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सार
2009 में पारित हुआ आरटीई अधिनियम डेढ़ दशक बाद भी सही क्रियान्वयन के अभाव में सरकारी स्कूलों की गरिमा को कम करने के साथ योग्य शिक्षकों के आत्मविश्वास पर कुठाराघात भी कर रहा है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वर्ष 2009 में पारित शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में मील का पत्थर माना गया। विशेष रूप से धारा 12(1)(ब), जो निजी स्कूलों में वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटों के आरक्षण की वकालत करती है, को सामाजिक समावेश के एक बड़े औजार के रूप में देखा गया। डेढ़ दशक बाद भी यह कानून न केवल सरकारी स्कूलों की गरिमा को कम कर रहा है, बल्कि भारत के योग्य शिक्षकों के आत्मविश्वास पर कुठाराघात भी कर रहा है। आरटीई की नीतियों ने अनजाने में ही निजी स्कूलों को उत्कृष्टता और सरकारी स्कूलों को विकल्पहीनता का प्रतीक बना दिया है।


  वर्ष 2024-25 के भारत सरकार के केंद्रीय बजट में समग्र शिक्षा के लिए आवंटित लगभग 37,500 करोड़ रुपये में से लगभग पांच से सात प्रतिशत हिस्सा निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों की फीस भरने में जाता है। एक तरफ आरटीई ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि सरकारी स्कूल केवल उन बच्चों के लिए हैं, जिनके पास निजी स्कूल में जाने का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ, शिक्षा विभाग का अधिकांश समय निजी स्कूलों से संबंधित विवादों व दावों को निपटाने में बीतता है। इससे सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक सुधार अब उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक रहा है। सरकारी शिक्षकों से पढ़ाने के बजाय जनगणना, चुनाव ड्यूटी, सर्वे और डाटा एंट्री जैसे गैर-शैक्षणिक काम ज्यादा कराए जाते हैं। नतीजतन, सरकारी स्कूलों का रिजल्ट निजी स्कूलों की तुलना में घट रहा है और वहां केवल मिड-डे मील के लिए ही बच्चे रह गए हैं, शिक्षा के लिए नहीं। शिक्षा का अधिकार गलत नहीं है, परंतु इसका बेहतर क्रियान्वयन जरूरी है। भारत को अब अधिक स्कूलों की नहीं, बल्कि बेहतर स्कूलों की आवश्यकता है। इसके लिए जरूरी है कि छोटे और कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद करके स्कूल ऑफ एक्सीलेंस (केंद्रीय या नवोदय विद्यालय) की तर्ज पर बड़े व संसाधन संपन्न स्कूल बनाए जाएं। शिक्षकों की योग्यता का लाभ उठाने के लिए उन्हें प्रशासनिक कामों से हटाकर पूरी तरह केवल शिक्षण के लिए समर्पित किया जाए। उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन छात्रों के लर्निंग आउटकम के आधार पर हो, न कि केवल कागजी उपस्थिति पर। निजी संस्थानों को बाध्य करने के बजाय उन्हें सहयोगी बनाया जाए।


आरटीई का ढांचा सरकारी स्कूलों को गरीबों के और निजी स्कूलों को गुणवत्ता के स्कूल के रूप में प्रचारित कर रहा है। इसमें नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है। सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की तरह स्वायत्तता मिलनी चाहिए, जहां शिक्षक स्वयं नवाचार कर सकें। सरकार को प्राइवेट स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रचार करने के बजाय अपने मॉडल स्कूलों व शिक्षकों की उपलब्धियों का प्रचार करना चाहिए। निजी स्कूलों को दी जाने वाली प्रतिपूर्ति राशि को सरकारी स्कूलों की स्मार्ट लैब्स या स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाया जाए। नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों की तरह सरकारी स्कूलों में भी छात्रों के चयन से लेकर उनके सीखने के परिणामों तक की जवाबदेही तय होनी चाहिए। निजी संस्थान विकल्प हो सकते हैं, पर सरकारी स्कूल राष्ट्र का संकल्प होने चाहिए।
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