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चलो बात करके देखते हैं: शब्दों में संवेदना और जिम्मेदारी का समय

नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 02 May 2026 06:37 AM IST
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सार
चुनावी मौसम में हम देखते हैं कि हमारे नेता कुछ ऐसा बोल जाते हैं, जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए। सबसे खतरनाक है कि वे माफी भी नहीं मांगते और उनके समर्थक उनकी बात को सही ठहराने लगते हैं। तो क्यों न अपनी बोलचाल की मर्यादा को बनाए रखा जाए और उस भावनात्मक स्वच्छता को महसूस किया जाए, जिससे संवाद में सादगी बनी रहे।
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भाषायी मर्यादा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

आज चर्चा बोलने की। बात उनकी, जिनसे यह दुनिया आशा करती है कि वे जब बोलेंगे, तो संवेदना और संयम से बोलेंगे, उनके कथन में कोई तंज नहीं होगा, कोई भड़काऊ प्रतिक्रिया नहीं होगी, न ही कोई तू-तड़ाक होगा, और न ही प्रजातंत्र के गलियारे में किसी के कद को कमतर करने की कोशिश होगी। बोलना एक जीवंत सामाजिक प्रक्रिया है, जो सामूहिकता के मूल्यों से सुसज्जित होती है और ध्वनि व प्रतिध्वनि के मेल-मिलाप को बखूबी समझती है।


यह व्याकरण में क्रिया है, जो किसी पक्ष-विपक्ष की सीमाओं से नहीं बंधी होती, बल्कि सिर्फ और सिर्फ उस अर्थ के प्रति जवाबदेह होती है, जो संप्रेषण की प्रक्रिया को संभाले स्पीकर से फीडबैक तक एक लूप में चलती रहती है। लेकिन यह न भूलिए कि किसी आमजन और खास व्यक्ति के बोलने के प्रभाव में खासा फर्क होता है। सफलता और शक्ति से लैस किसी भी क्षेत्र के नेतृत्व से यह आशा की जाती है कि वह बात करते वक्त यह जेहन में रखेगा कि उसके स्वतंत्र शब्दों को आमजन अपने संप्रेषण में उतारना चाहेगा। इसलिए, बोलना एक सामाजिक और सांस्कृतिक जवाबदेही भी है। हमारे जो नेता होते हैं या जिन्हें हम अपना हीरो बनाते हैं, उनसे यह आशा स्वाभाविक होती है कि जब भी वह कुछ बोलेंगे, तो उनकी बात में वजन होगा, एक गहराई होगी, और वह समझ भी होगी कि सुनने वाले लोग बोलने वाले से कम नहीं होते।

आप कहेंगे कि मैं यह लेख बोलने जैसे विषय पर क्यों लिख रहा हूं? वह इसलिए कि हमारे नेता किसी चुनावी मौसम में या किसी अन्य समय जब ऐसा कुछ बोल जाते हैं, जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए, तो फिर सुनने वाले भी तरह-तरह से प्रतिक्रिया देते हैं। सबसे खतरनाक है कि जिसकी जुबान फिसल जाती है या जो अपनी मर्यादाएं लांघ जाते हैं, वे सामने आकर माफी भी नहीं मांगते और उधर उनके समर्थक उनकी बात को सही ठहराने लगते हैं। फिर बोलना क्या और सुनना क्या! सब बेमानी हो जाता है। भाषाई मर्यादाएं मानो किसी और ग्रह पर चली जाती हैं। और जो बचता है, वह समाज के लिए बहुत नुकसानदेह होता है, क्योंकि न चाहकर भी ‘कुछ भी बोलने’ को न्यू नॉर्मल मान लिया जाता है। फिर ‘कुछ भी सुनना’ भी न्यू नॉर्मल होने लगता है।

तो फिर क्या किया जाए? बोलना और सुनना तो प्रकृति की प्रवृत्ति है और मानव बोध उसको श्रेष्ठतर करने की क्षमता। क्या हमें संप्रेषण की शुद्धता और सादगी को बनाए रखने के लिए किसी तरह के स्पीकिंग हाइजीन (शब्दों की स्वच्छता) की भी आवश्यकता है? शायद हां, क्योंकि प्रजातंत्र की प्रकृति हमेशा स्व-सुधार की होती है और हमारे बोलने का मौलिक अधिकार यह भी तय करता है कि उस स्व-सुधार को सही ढंग से अमल में लाया जाए। शब्दों की स्वच्छता भावनात्मक स्वच्छता या इमोशनल हाइजीन (भावनात्मक स्वच्छता) पर भी निर्भर होती है। दलाई लामा भी मानते हैं कि भावनात्मक स्वच्छता शारीरिक स्वच्छता जितनी ही जरूरी है, क्योंकि कम उम्र में सीखा गया करुणा और अहिंसा का भाव एक शांत व्यक्तित्व को गढ़ता है। और जब इस इमोशनल हाइजीन को संवाद से जोड़ा जाता है, तब शोर और तंज से ज्यादा सौहार्द और प्रेम की अभिव्यक्ति की जगह बनती है।

बोलते वक्त यदि हमेशा कोई पूर्वाग्रह घेरे रहे, तो फिर इमोशनल हाइजीन कहीं खो जाती है और बोलने का सुर एवं ताप कुछ और सख्त हो जाता है। यहां तक कि जीवन के संबंधों का संप्रेषण भी किसी संसद का पक्ष-विपक्ष बन जाता है। अपनी बातों को किसी भी कीमत पर सही ठहराने का भाव पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति है, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपने पूर्व-स्थापित विश्वासों की पुष्टि करने वाली सूचनाओं को बोलने या सुनने में प्राथमिकता देता है, और बाकी अन्य साक्ष्यों को कमतर आंकता है। पर, बोलने में ऐसे पूर्वाग्रह उस जवाबदेही को तय नहीं कर पाते, जिसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता उस वक्ता को होती है, जो समाज की नजर में नेता है। उसके एक-एक शब्द का प्रभाव जनता के आचरण पर पड़ता है। क्या यह संभव नहीं कि प्रजातंत्र में उनके प्रति भी सम्मान रखा जाए, जो या तो पक्ष में बैठे हैं या विपक्ष में या जो श्रोता हैं, या मंच पर? क्या बोलना यह तय नहीं कर सकता कि बिना किसी के कद को छोटा किए कोई नेता अपनी बात कहने का हौसला रखे? सम्मान के साथ संबोधन इस युग में संभव नहीं रहा, क्या?

आखिर क्यों नहीं! बोलना, एक कला है और कोई कला मूल्यों के बिना अधूरी रह जाती है। इसीलिए जब मार्टिन लूथर किंग ने ‘आई हैव अ ड्रीम’ कहा, तो मानो सुनने वालों की दुनिया में भी सपनों का झरोखा खुल गया। ‘अमेरिका के बहनो और भाइयो’ के संबोधन ने शिकागो में उस दो मिनट की तालियों की ऐसी जबर्दस्त गूंज प्रतिध्वनित की, जिसे अमेरिका भी नहीं भूला है। हमें यह प्रश्न बार-बार खुद से पूछना चाहिए कि औपनिवेशिक भारत के स्वामी विवेकानंद का स्वागत और सम्मान शक्तिशाली पश्चिमी दुनिया ने क्यों किया? इसकी एकमात्र वजह यह थी कि उनका संवाद न तो पश्चिमी मूल्यों या विचारों को नीचा दिखाने वाला था, और न ही वह अनावश्यक रूप से पूर्वी मूल्यों या विचारों की अतिशयोक्तिपूर्ण तारीफ कर रहा था। विवेकानंद ने अपने संवाद के माध्यम से हमारी संस्कृति के उन समग्र और सार्वभौमिक तत्वों को उजागर किया, जिनकी पश्चिमी दुनिया में कमी थी। उनका वह संबोधन न तो किसी के पक्ष में था और न ही किसी के विरोध में, बल्कि वह एक ऐसा नया मार्ग प्रशस्त कर रहा था, जो विभिन्न विषयों और प्रस्तावों को बेहतर ढंग से समझने और संभालने का सुझाव दे रहा था।
तो क्यों न मौखिक संस्कृति की गरिमा को अपने बोलचाल की मर्यादा से बनाए रखा जाए? उस भावनात्मक स्वच्छता को महसूस किया जाए, जिससे संवाद में स्वच्छता बनी रहे। जब हम किसी के घर, किसी स्कूल, अस्पताल या संस्था में जाते हैं, तो कम से कम इतना तो चाहते ही हैं कि सामने वाला व्यक्ति अपने शब्दों में वह सम्मान रखे, जिस पर हर व्यक्ति का अधिकार होता है। यह बहुत दुखद होता है, जब परिवार के लोग आपस में ही बात करना बंद कर देते हैं और भावी पीढ़ी को भी परिवार से दूर कर देते हैं और बोलना सिर्फ फोन के माध्यम से होने लगता है। यह न भूलिए कोई समाज पक्ष-विपक्ष नहीं होता और आदर व सम्मान से बोलना किसी घर, समाज के राब्ता को महफूज रखता है और उस किरदार को भी लोग सुनना चाहते हैं। यह बात अहमद फराज साहब से बेहतर भला कौन कह सकता है, ‘सुना है, बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं, यह बात है, तो चलो बात करके देखते हैं!’  
edit@amarujala.com
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