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विडंबना: डाटा का लोकतंत्र; डिजिटल आजादी का गलत इस्तेमाल खुद आजादी के खिलाफ सबसे मजबूत तर्क

अमित दुबे, लेखक एवं राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ Published by: पवन पांडेय Updated Mon, 26 Jan 2026 07:31 AM IST
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सार
तकनीक अपने आप में न तो लोकतांत्रिक है और न ही अधिनायकवादी। यह इस बात पर निर्भर है कि इसे कौन नियंत्रित करता है व इसे कैसे विनियमित किया जाता है। लोकतंत्र पर खतरा सिर्फ तकनीक की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए आ सकता है कि लोगों में जागरूकता का विकास उसी रफ्तार से नहीं हुआ है।
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The irony: data democracy; the misuse of digital freedom is the strongest argument against freedom itself
डाटा का लोकतंत्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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लोकतंत्र का विकास हमेशा तकनीकी विकास के साथ हुआ है। प्रिंटिंग प्रेस ने राजनीतिक जागरूकता का विस्तार किया, रेडियो ने जनमत को आकार दिया और टेलीविजन ने चुनावी अभियानों का स्वरूप बदल दिया। आज कहीं ज्यादा ताकतवर तकनीकी काम कर रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), साइबरस्पेस और सोशल मीडिया मिलकर यह तय कर रहे हैं कि लोकतंत्र कैसे काम करते हैं, मुकाबला करते हैं और टूटते हैं। जो व्यवस्था कभी सार्वजनिक बहस और सामूहिक फैसले पर आधारित थी, वह अब तेजी से एल्गोरिदम, डाटा प्रवाह और अनदेखे डिजिटल हस्तक्षेप से प्रभावित हो रही है।

 
आधुनिक लोकतंत्र अब डाटा नामक एक नई नींव पर काम करता है। हर सर्च क्वेरी, सोशल मीडिया इंटरैक्शन, लोकेशन पिंग और एप परमिशन से उपयोगकर्ताओं के व्यवहार से जुड़ी जानकारी मिलती है। एआई के साथ मिलकर, यह डाटा लोगों की राय को समझने और प्रभावित करने में अभूतपूर्व सटीकता प्रदान करता है। वैश्विक अनुमानों के अनुसार, आज इस्तेमाल होने वाली 70 प्रतिशत से अधिक राजनीतिक सामग्री को एल्गोरिदम द्वारा क्यूरेट किया जाता है, न कि जानबूझकर चुना जाता है। मतदाता एक ही शहर या घर में होने पर भी एक जैसी जानकारी नहीं देख पाते हैं। इसके बजाय, उन्हें वही दिखाया जाता है, जो एल्गोरिदम को लगता है कि जुड़ाव, भावना या विश्वास को मजबूत करेगा। नतीजतन एक खंडित सार्वजनिक वातावरण तैयार होता है, जहां नागरिक साझा सूचना आधार साझा नहीं करते, जो लोकतांत्रिक विमर्श के लिए जरूरी शर्त है। पारंपरिक राजनीतिक संदेश सार्वजनिक और बहस योग्य होता था। डिजिटल मनुहार निजी, व्यक्तिगत और अक्सर अदृश्य होती है।


एआई सिस्टम व्यक्तित्व की खूबियों, डर, आर्थिक तनाव, पहचान के संकेतों और भावनात्मक प्रतिक्रिया का विश्लेषण करके आदत के अनुसार राजनीतिक आख्यान तैयार करते हैं। ये संदेश सोशल मीडिया फीड, मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और छोटे वीडियो के जरिये चुनिंदा लोगों तक पहुंचाए जाते हैं। सामूहिक प्रचार के विपरीत, इन संदेशों का पता लगाना मुश्किल होता है, इन्हें सार्वजनिक रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती और ये अक्सर कानूनी एवं नैतिक निगरानी से बच निकलते हैं। असल में, चुनाव अब सिर्फ सार्वजनिक रैलियों या टेलीविजन बहसों में नहीं लड़े जाते, बल्कि व्यक्तिगत डिजिटल पारिस्थितिकी के अंदर लड़े जाते हैं। एआई से निर्मित सामग्रियों ने एक बड़ा खतरा पैदा कर दिया है: भरोसे का खत्म होना। डीपफेक वीडियो, सिंथेटिक ऑडियो और छेड़छाड़ की गई तस्वीरें अब सार्वजनिक हस्तियों को ऐसी बातें कहते या ऐसे काम करते हुए दिखा सकती हैं, जो कभी हुई ही नहीं थीं। हालांकि तत्काल चिंता गलत जानकारी फैलाने को लेकर है, लेकिन इसका दीर्घकालीन खतरा ज्यादा गंभीर है। जब नागरिक यह फर्क नहीं कर पाते कि क्या असली है और क्या मनगढ़ंत, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही खत्म हो जाती है।

उतना ही खतरनाक इसका उल्टा मामला है: असली सबूतों को भी नकली बताकर खारिज किया जा सकता है, जिससे हमेशा के लिए अनिश्चितता पैदा हो जाती है। जब सच्चाई पर मोलभाव होने लगता है, तो लोकतंत्र काम नहीं कर सकता। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब सबसे प्रभावशाली राजनीतिक बिचौलियों के तौर पर काम करते हैं, लेकिन उन जिम्मेदारियों के बगैर, जो पारंपरिक रूप से मीडिया संस्थानों से जुड़ी होती हैं। उनके एल्गोरिदम सटीकता से ज्यादा भावना, संदर्भ से ज्यादा टकराव और सत्यापन (वेरिफिकेशन) से ज्यादा वायरल होने को प्राथमिकता देते हैं। अध्ययनों से लगातार यह स्पष्ट होता है कि गलत या गुमराह करने वाली जानकारी, सत्यापित तथ्य की तुलना में काफी तेजी से फैलती है, खासकर जब यह डर, गुस्सा या पहचान पर आधारित प्रतिक्रिया पैदा करती है। इसके प्रलोभन की संरचना स्पष्ट है-जितने ज्यादा लोग इससे जुड़ेंगे, उतनी कमाई होगी और आक्रोश जुड़ाव को बढ़ाता है।

लोकतांत्रिक स्थिरता अक्सर इसका शिकार होती है। बड़े पैमाने पर डाटा लीक अब सिर्फ वित्तीय नुकसान तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। चोरी किए गए पर्सनल डाटा का इस्तेमाल मतदाताओं की प्रोफाइल बनाने, मतदान कम करने, खास समुदायों पर निशाना साधने एवं जानी-मानी हस्तियों को ब्लैकमेल करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा सकता है। कई मामलों में, नागरिकों को पता ही नहीं चलता कि उनके डाटा का इस्तेमाल राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यह अदृश्य हेरफेर सहमति को कमजोर करता है, जो लोकतंत्र की नैतिक नींव है। अगर इसे निर्बाध छोड़ दिया जाए, तो एआई, डाटा के गलत इस्तेमाल और सोशल मीडिया हेरफेर से नागरिक एक ही तरह के वैचारिक भंवर में फंस जाएंगे, जहां कोई साझा सच्चाई नहीं होगी। इससे चुनावों की वैधता का संकट उत्पन्न होगा और व्यापक अविश्वास के कारण निष्पक्ष चुनावी नतीजों पर भी सवाल उठाए जाएंगे। इसके अलावा, इससे डिजिटल तानाशाही शुरू होगी, जहां निगरानी, सेंसरशिप और नियंत्रण को सही ठहराने के लिए अराजकता का इस्तेमाल किया जाता है।

विडंबना यह है कि डिजिटल आजादी का गलत इस्तेमाल खुद आजादी के खिलाफ सबसे मजबूत तर्क बन सकता है। इसका समाधान सेंसरशिप या टेक्नोलॉजिकल रोलबैक में नहीं है। यह लोकतांत्रिक अनुकूलन में है। इसके लिए ये कदम उठाए जा सकते हैं- मजबूत डाटा सुरक्षा और पारदर्शी कानून, एआई निर्मित राजनीतिक सामग्रियों का अनिवार्य खुलासा, एल्गोरिदमिक सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट, बड़े पैमाने पर डिजिटल और मीडिया साक्षरता कार्यक्रम और लोकतांत्रिक बुनियादी ढांचे के रूप में एआई तथा साइबरस्पेस का नैतिक शासन स्थापित करना। सबसे जरूरी बात यह है कि नागरिकों को सिर्फ उपयोगकर्ता या उपभोक्ताओं के तौर पर नहीं, बल्कि डिजिटल क्षेत्र में हितधारकों के तौर पर माना जाना चाहिए। प्रौद्योगिकी अपने आप में न तो लोकतांत्रिक है और न ही अधिनायकवादी। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कौन नियंत्रित करता है, इसे कैसे विनियमित किया जाता है, और समाज इसकी ताकत को कितनी अच्छी तरह समझता है।

लोकतंत्र सिर्फ एआई या सोशल मीडिया की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए खतरे में है, क्योंकि प्रौद्योगिकी की तरह संस्थान, कानून और लोगों में जागरूकता का विकास उसी रफ्तार से नहीं हुआ है। लोकतंत्र का भविष्य सिर्फ मतदान केंद्रों पर ही तय नहीं होगा, बल्कि डाटा सेंटर, कोड रिपॉजिटरी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी तय होगा। लोकतंत्र इस बदलाव में बचेगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि समाज कितनी जल्दी यह पहचानता है कि साइबरस्पेस अब सिर्फ संचार साधन नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक अखाड़ा बन गया है। और हर सत्ता क्षेत्र की तरह, इसमें भी जवाबदेही की जरूरत होती है। -edit@amarujala.com
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