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दुनिया: यह ट्रंप का पीस बोर्ड है, क्या इस तरह के मंच से संभव है विश्व शांति?

एंटोन ट्रोयानोव्स्की, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 24 Jan 2026 06:51 AM IST
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सार
इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया में शांति के लिए एक व्यापक व अंतरराष्ट्रीय सहमति की जरूरत है और संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था इस उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी है। लेकिन, यह एक ऐसी नई संस्था के जरिये शायद ही पाई जा सकती है, जो पूरी तरह से एक व्यक्ति की मनमर्जी पर निर्भर हो।
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World: This is Trump's Peace Board, is world peace possible through such a platform?
ट्रंप का पीस बोर्ड - फोटो : X @WhiteHouse

विस्तार
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हाल ही में अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों को भेजे गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के प्रस्तावित चार्टर में, एक आदमी के पास फैसलों को वीटो करने, एजेंडे को मंजूरी देने, सदस्यों को बुलाने, पूरे बोर्ड को भंग करने और अपना उत्तराधिकारी चुनने की शक्ति है। उस व्यक्ति का नाम अनुच्छेद 3.2 में कुछ इस तरह लिखा हुआ है: ‘डोनाल्ड जे ट्रंप बोर्ड ऑफ पीस के पहले चेयरमैन के तौर पर काम करेंगे।’


कई अधिकारी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस पहल की व्यापकता देखकर हैरान रह गए। यह एक और उदाहरण था, जिसमें ट्रंप ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका द्वारा निर्मित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को खत्म करके, खुद को केंद्र में रखकर एक नई व्यवस्था बनाई। शांति वार्ता के विशेषज्ञ एवं कई वैश्विक निकायों के साथ मिलकर काम करने वाले कैंब्रिज के अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर मार्क वेल्लर का मानना है कि ‘यह संयुक्त राष्ट्र पर सीधा हमला है। इस पहल को एक व्यक्ति द्वारा अपनी मर्जी से दुनिया की व्यवस्था पर कब्जा करने के तौर पर देखा जा सकता है।’


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने नवंबर में एक प्रस्ताव पारित करके खुद ही पीस बोर्ड बनाने का समर्थन किया था। उस प्रस्ताव में अमेरिका की मध्यस्थता वाले उस शांति योजना का स्वागत किया गया था, जिससे गाजा में इस्राइल की जंग खत्म होनी थी। उस प्रस्ताव के मुताबिक, यह बोर्ड 2027 तक ‘ट्रांजिशनल एडमिनिस्ट्रेशन’ के तौर पर काम करेगा और गाजा के पुनर्विकास की देखरेख करेगा।

लेकिन पिछले हफ्ते बोर्ड ऑफ पीस पेश करते समय, ट्रंप प्रशासन ने गाजा को सिर्फ उस कार्य का महज एक हिस्सा बताया, जो यह नई संस्था करेगी। हालांकि, इसकी शक्तियां तय नहीं हैं, लेकिन इसका मिशन अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के संयुक्त राष्ट्र के मकसद से मिलता-जुलता होगा।

ट्रंप के पहले कार्यकाल के पूर्व नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ ऑफ स्टाफ रहे फ्रेड फ्लीट्ज ने बताया कि ट्रंप ने खुद को एक काफी काबिल और आक्रामक नेता साबित किया है। यह इसी का फायदा उठाना है। प्रस्तावित चार्टर में कहा गया है कि बोर्ड ‘संघर्ष से प्रभावित या खतरे वाले इलाकों में स्थायी शांति’ लाने की कोशिश करेगा।

ट्रंप के शांति दूत और पीस बोर्ड के कार्यकारी समूह के सदस्य स्टीव विटकॉफ ने बताया कि बीस से ज्यादा देश पहले ही इसमें शामिल होने के लिए सहमत हो गए हैं और बोर्ड ऑफ पीस ‘शांति हासिल करने के लिए विचार-विमर्श करने’ के मकसद से ‘एक साथ आने वाले नेताओं का एक शानदार समूह’ होगा। उन्होंने रूस, यूक्रेन, ईरान, सूडान और सीरिया को उन जगहों में गिना, जहां ‘रिश्तों को बेहतर बनाने’ की जरूरत है।

ट्रंप ने कहा कि काश, संयुक्त राष्ट्र कुछ ज्यादा कर पाता। काश, हमें पीस बोर्ड बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह चाहते हैं कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की जगह ले, तो ट्रंप ने कहा कि ‘ऐसा हो सकता है’। उन्होंने आगे कहा कि मेरा मानना है कि आपको यूएन को जारी रहने देना चाहिए, क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा संभावना है। लेकिन बोर्ड ऑफ पीस के बारे में ट्रंप प्रशासन के अस्पष्ट रुख ने अमेरिकी विदेश नीति की उलझन को और बढ़ा दिया है। वेनेजुएला पर हमला, ईरान पर हमले की धमकियां और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ट्रंप की मांग, इन सबने यह संदेश दिया है कि अमेरिका एक नए एकतरफा तरीके से अपनी वैश्विक शक्ति का इस्तेमाल करना चाहता है।

नॉर्वे, स्वीडन और फ्रांस ने पहले ही इसमें शामिल होने से इन्कार कर दिया है। नाटो, चीन और दूसरी जगहों पर अमेरिका के पूर्व राजदूत आर निकोलस बर्न्स ने कहा, ‘अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे का रिश्ता टूट गया है। ग्रीनलैंड पर प्रशासन की हद से ज्यादा दखलअंदाजी और गलत आकलन की वजह से यूरोपीय और कनाडाई नजरिये में वास्तव में बदलाव आया है।’

दो हफ्ते पहले, ट्रंप ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से किनारा कर लिया, जिन्हें उनके प्रशासन ने ‘फिजूलखर्ची वाला, बेकार और नुकसानदायक’ माना था। उन्होंने संकेत दिया है कि वह अपने बोर्ड को उस खालीपन को भरने के रूप में देख रहे हैं-दुनिया को अमेरिकी जुड़ाव का एक ज्यादा मजबूत ब्रांड पेश करते हुए, जिसका प्रतिनिधित्व ट्रंप खुद करेंगे।

चार्टर की शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है कि ‘स्थायी शांति’ के लिए ऐसे तरीकों और संस्थानों से अलग होने का साहस चाहिए, जो अक्सर फेल हो चुके हैं। ट्रंप प्रशासन के करीबी थिंक टैंक एवं अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट से जुड़े फ्लीट्ज ने कहा कि आमंत्रित सदस्यों में रूस और चीन को शामिल करने का फैसला बोर्ड के इच्छित ‘व्यापक स्वरूप’ को दिखाता है। ट्रंप इस संभावना को कम करना चाहते हैं कि अलग-अलग देश इसे नाकाम करने की कोशिश करेंगे। हालांकि, चीन ने कहा कि उसे आमंत्रित किया गया, पर उसने यह नहीं बताया कि वह इसे स्वीकार करेगा या नहीं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने भी आमंत्रण को स्वीकार करने से मना कर दिया, और कहा कि उनके विदेश मंत्रालय को इसका विश्लेषण करने की जरूरत है। लेकिन ट्रंप की महत्वाकांक्षाओं का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने के इरादे से पुतिन ने कहा कि रूस बोर्ड में एक अरब डॉलर का योगदान देने के लिए तैयार है, बशर्ते यह पैसा उन रूसी संपत्तियों से आए, जिन्हें यूक्रेन पर हमला करने के बाद पश्चिम में फ्रीज कर दिया गया था।

अमेरिकी अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की कि राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी ट्रंप बोर्ड में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ट्रंप तब तक चेयरमैन बने रह सकते हैं, जब तक वह खुद इस्तीफा नहीं दे देते। हालांकि, भविष्य में कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति बोर्ड में अमेरिकी प्रतिनिधि को नियुक्त या नामित कर सकता है।

शांति वार्ता के विशेषज्ञ वेल्लर ने कहा कि ट्रंप के लिए जो निजी केंद्रीय भूमिका सोची गई है, वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी जानकारी में किसी भी दूसरे समझौते से अलग है। उन्होंने कहा कि यह दुनिया में शांति के लिए टिकाऊ रास्ता नहीं हो सकता। ‘दुनिया में शांति के लिए एक व्यापक, अंतरराष्ट्रीय सहमति की जरूरत है। यह एक ऐसी संस्था के जरिये शायद ही बनाई जा सकती है, जो पूरी तरह से एक आदमी की मर्जी पर निर्भर हो।’ ©The New York Times 2026
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