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शंकर गुहा नियोगी: एक विचारक के असमय जाने की क्षति, जिससे उबर न सका नागरिक समाज आंदोलन
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सार
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शंकर गुहा नियोगी (फाइल)
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amar ujala
विस्तार
भारत की आजादी के बाद का इतिहास कई प्रमुख राजनेताओं की हत्या से भरा है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या 60 साल की उम्र में हुई, राजीव गांधी अपनी उम्र के चालीस के दशक में मारे गए और प्रमोद महाजन की हत्या 50 साल के आसपास हुई। इनके अलावा वे लोग भी हैं, जिनकी मृत्यु हवाई या सड़क दुर्घटनाओं में हुई। इनमें संजय गांधी, राजेश पायलट, माधवराव सिंधिया, वाई एस राजशेखर रेड्डी शामिल हैं। अगर ये सभी लोग 20 साल और जीवित रहते, तो उनका राजनीतिक जीवन किस दिशा में जाता, यह एक सोचने का विषय है।लेकिन मेरा मानना है कि इन सबके मुकाबले, विचारक और ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी की असमय मृत्यु ने भारत को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाया। उनका जाना भारत के नागरिक समाज आंदोलन के लिए एक गहरा झटका था, जिससे वह शायद आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। 1991 में जब वह 40 साल के थे, उनकी हत्या कर दी गई, क्योंकि वे मजदूरों में आत्म सम्मान और बराबरी का नागरिक होने का विश्वास जगा रहे थे।
मैं गुहा नियोगी के बारे में लिख चुका हूं, लेकिन अब मुझे उनके बारे में अधिक विश्लेषणात्मक रूप में फिर लिखना पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि समाजशास्त्री राधिका कृष्णन ने हाल ही में उनके जीवन और कार्य पर एक महत्वपूर्ण किताब प्रकाशित की है। यह किताब बताती है कि उनके जीवन का अर्थ और उपयोगिता क्या है। किताब का नाम है, ‘शंकर गुहा नियोगी : ए पॉलिटिक्स इन रेड एंड ग्रीन’। यह पुस्तक साक्षात्कारों और हिंदी के दुर्लभ स्रोतों पर आधारित है।
1943 में एक बंगाली परिवार में पैदा हुए गुहा नियोगी ने 19 वर्ष की आयु में भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी की। जल्द ही वह नौकरी छोड़कर समाज सेवा में आ गए। उन्होंने एक आदिवासी महिला से विवाह किया और खदान मजदूरों को संगठित करने में जुट गए। साथ ही पर्यावरण न्याय के सवालों में भी रुचि लेने लगे। वह चाहते थे कि जल और वन नीतियां केवल उद्योगों और व्यापार के हित में न बनें, बल्कि स्थानीय किसानों और आदिवासी समुदायों की जरूरतों के प्रति भी संवेदनशील हों। 1977 में उन्होंने छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ की स्थापना में मदद की, जिसका नाम ही खदान मजदूरों के अधिकारों पर केंद्रित है। दो साल बाद उन्होंने एक व्यापक संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के गठन में भूमिका निभाई। दोनों संगठन में महिलाओं, युवाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अलग-अलग मोर्चे बनाए गए। संगठन ने खदान मजदूरों के लिए एक अस्पताल भी चलाया। गुहा नियोगी की हत्या तक दोनों संगठन अधिकारों, सामाजिक सुधार और पर्यावरणीय के लिए संघर्ष करते रहे।
देश के मध्यमवर्ग के कई आदर्शवादी युवा, आरामदेह पेशेवर जीवन छोड़कर नियोगी और उनके संगठनों से जुड़े। इनमें बिनायक सेन जैसे नाम शामिल थे, जो वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से स्नातक थे और सुधा भारद्वाज जो कानपुर आईआईटी से पढ़ी थीं। गुहा नियोगी एक मौलिक चिंतक थे, लेकिन जीवन की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उन्हें शायद ही कभी कलम उठाने का समय मिला।
गुहा नियोगी को ऐसी उत्पादन तकनीकों में विशेष रुचि थी, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हों। वे समझते थे कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका से भारी मशीनों का अंधाधुंध आयात समाज को वर्ग और लैंगिक आधार पर और अधिक विभाजित कर देगा। कृष्णन लिखती हैं- 'छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने अपने अनुभवों से यह भी जाना कि यंत्रीकरण का सबसे भारी बोझ अनिवार्य रूप से महिलाओं पर ही पड़ता है। डल्ली की हाथ से चलने वाली खानों में महिलाएं कम से कम आधी कार्यशक्ति थीं, लेकिन पूरी तरह मशीनीकृत खानों में उन्हें ‘अकुशल’ मान लिया गया और काम के योग्य नहीं समझा गया। मोर्चा ने रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की इस क्षति को महिलाओं की गरिमा पर सुनियोजित हमला माना।'
गुहा नियोगी और उनका संगठन एक ऐसे वैकल्पिक उत्पादन मॉडल को विकसित करने में लगे थे, जिसमें रोजगार की सुरक्षा, श्रम शक्ति के सर्वोत्तम उपयोग और श्रमिकों की क्रय-शक्ति बढ़ाने पर जोर रहता, ताकि जीवंत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था खड़ी की जा सके। कृष्णन ने गुहा नियोगी के शब्दों का उल्लेख किया है- 'चिपको आंदोलन हमें प्रेरित करता है और हम उसे एक क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में पहचानते हैं।'
उनकी पुस्तक पढ़ते हुए मुझे गुहा नियोगी और चिपको आंदोलन के महान नेता चंडी प्रसाद भट्ट के बीच कई समानताएं दिखाई दीं। गुहा नियोगी एक हरित मार्क्सवादी थे, जबकि भट्ट (जो सौभाग्य से आज भी हमारे बीच हैं) एक वामपंथी गांधीवादी। दोनों ने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया-पर्यावरण और समानता का समन्वय। दोनों बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहकर काम करते थे। गुहा नियोगी की हत्या को 30 साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन कम से कम पांच महत्वपूर्ण तरीकों से उनका जीवन और कार्य आज के भारत से सीधे संवाद करता है।
पहला, यह असंगठित श्रमिकों की असुरक्षित स्थिति को उजागर करता है, जो आज खासकर निर्माण क्षेत्र और गिग इकोनॉमी में साफ दिखाई देती है। दूसरा, यह लोकतंत्र को जीवित रखने में स्वतंत्र नागरिक समाज संगठनों की अनिवार्य भूमिका को रेखांकित करता है। आज भारत में ऐसे संगठनों की आवश्यकता और भी तीव्रता से महसूस की जा रही है, जब भाजपा उन नागरिक समूहों को डराती-धमकाती और सताती है जो उसकी हिंदुत्ववादी विचारधारा के अनुरूप नहीं चलते। तीसरा, यह बताता है कि विकास प्रक्रिया में पर्यावरण को शामिल करना कितना आवश्यक है। हमारे शहरों में वायु प्रदूषण, जहरीला होता भूजल, नदियों का प्रदूषण और हिमालय, पश्चिमी घाट तथा अरावली पर सत्ता के करीब खड़ी बुनियादी ढांचा व खनन कंपनियों के क्रूर हमले-ये सब दिखाते हैं कि शंकर गुहा नियोगी (और चंडी प्रसाद भट्ट) की चेतावनियों की अनदेखी वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को कितनी भारी पड़ रही है।
चौथा, गुहा नियोगी का काम छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जैसे छोटे, लेकिन संसाधन-संपन्न राज्यों के लिए एक अधिक अर्थपूर्ण- यानी कम शोषणकारी और कम विनाशकारी- विकास मॉडल का रास्ता दिखाता है। पांचवां, यह हमें नई तकनीकों के दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर अत्यधिक आशावादी होने से सावधान करता है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस लाखों भारतीयों को बेरोजगार कर सकती है। गुहा नियोगी सिलिकॉन वैली या बंगलूरू के तकनीकी उत्साहियों से कहीं बेहतर समझते थे कि नई तकनीकें, जहां एक ओर निजी कंपनियों के लिए उत्पादकता और मुनाफा बढ़ाती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज और प्रकृति के लिए गंभीर रूप से विभाजनकारी और हानिकारक प्रभाव भी ला सकती हैं।