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भावनाएं दुश्मन नहीं हैं: क्यों बुद्धिमान लोग भी कर बैठते हैं मूर्खतापूर्ण फैसले? सोच कर देखिए सोचना क्या है
डेविड ब्रूक्स, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 25 Jan 2026 05:53 AM IST
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सोच कर देखिए सोचना क्या है
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अमर उजाला
विस्तार
आप कौन हैं? आपके भीतर की गहराइयों में इस वक्त चल क्या रहा है? आप अपने ही दिमाग को किस तरह समझते हैं? प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस विषय पर गहन विमर्श किया था, और अब आधुनिक तंत्रिका विज्ञान हमें इसे समझने में मदद कर रहा है। करीब दो दशक पहले, जब तंत्रिका विज्ञान में मेरी रुचि शुरू हुई, तब वैज्ञानिक दिमाग के विभिन्न कार्यों के स्थान का पता लगाने में व्यस्त थे। इसी वजह से आम बोलचाल में कहा जाने लगा कि भावनाएं एमिग्डाला में, तो प्रेरणा न्यूक्लियस एकंबेंस में होती है। लेकिन, पिछले कुछेक वर्षों में तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में इस मॉड्यूलर दृष्टिकोण, कि दिमाग के प्रत्येक क्षेत्र का अपना कार्य होता है, की जगह एक नई दृष्टि विकसित हुई।शोधकर्ताओं का मानना है कि दिमाग असल में परस्पर जुड़े हुए क्षेत्रों का जाल होता है। इसमें न्यूरॉन्स का एक विशाल व गतिशील नेटवर्क होता है, जो दिमाग के विभिन्न भागों को जोड़ता है। मैरीलैंड न्यूरोइमेजिंग सेंटर के प्रमुख लुइस पेसोआ ने एक उदाहरण के जरिये मुझ जैसे आम आदमी को यह बात समझाई। वह सारस पक्षी के झुंड की कल्पना करने को कहते हैं, जो आकाश में उड़ रहा है। कोई एक सारस पूरे झुंड का नेतृत्व कर रहा हो, ऐसा नहीं होता, फिर भी उनकी उड़ान में एक तारतम्य दिखता है। ठीक इसी तरह, जब हमारा दिमाग रोजाना की परेशानियों से निपटने की कोशिश कर रहा होता है, तब वह दिमाग के कई क्षेत्रों में वितरित तंत्रिका समूह बनाता है, जो सारस पक्षियों के झुंड की तरह सामूहिक व्यवहार में एकल पैटर्न बनाता है।
अब यह बात मेरी समझ में आती है। जिंदगी वाकई जटिल है। अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने के लिए, आप भी नहीं चाहेंगे कि दिमाग में केवल कुछ ही क्षेत्र हों, जो गिने-चुने काम करते हों। बल्कि आप यह चाहेंगे कि दिमाग बड़ी संख्या में नेटवर्क वाले समूहों को विकसित करने में सक्षम हो, जो आपस में जुड़कर समझदारी भरी प्रतिक्रियाएं निर्मित कर सकें। पेसोआ के उदाहरण ने मुझे एक छोटा-सा प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। मान लीजिए, आप एक शिक्षक हैं और अपने प्रत्येक छात्र को सारस पक्षियों के झुंड की तरह देखते हैं। छात्रों के दिमाग खाली बर्तन नहीं हैं, जिन्हें सूचनाओं से भरा जाना है। वे कंप्यूटर भी नहीं हैं, जो निर्जीव ढंग से गणनाएं करते हों। इसके उलट, हर विद्यार्थी विचारों, भय, भावनाओं, इच्छाओं, आवेगों, स्मृतियों और शारीरिक संवेदनाओं का निरंतर बदलता हुआ भंवर है। ये सभी चीजें मिलकर एक एकल मन का निर्माण करती हैं, जो दिन भर की घटनाओं के माध्यम से विद्यार्थी का मार्गदर्शन करता है।
अगर आप लोगों को इस नजरिये से देखें, तो मुझे लगता है कि सबसे पहले आप यह देखेंगे कि उनमें कितनी विविधता है। अगर आप बच्चों के दिमाग को एक बर्तन की तरह देखें, जिसे भरना है, या अगर आप दिमाग को एक तरह का कंप्यूटर समझें, तो हर बर्तन और हर कंप्यूटर लगभग एक जैसा ही है। लेकिन अगर बच्चों को भंवरों की तरह देखें, तो हर भंवर की अपनी अलग गति होती है-उसका अपना व्यक्तित्व, उसका अपना अनूठा नृत्य।
फिर भी हमारी शिक्षा प्रणाली मानकीकृत है। जैसा कि टॉड रोज ने अपनी उत्कृष्ट किताब द एंड ऑफ एवरेज में लिखा है कि जब हम लोगों को ग्रेड देते हैं या वर्गीकृत करते हैं, तो हम उन्हें कुछ मानदंडों के अनुसार मापते हैं। कुछ लोग ए ग्रेड के होते हैं, कुछ बी ग्रेड के और कुछ डी ग्रेड के। संदेश यह है कि सबसे बेहतर बनो। लेकिन अगर आप लोगों को सारस पक्षियों के झुंड के रूप में देखें, तो आपको समझ आएगा कि इस तरह की वर्गीकरण प्रणाली कितनी अमानवीय है। क्या सारस के झुंड में कोई सारस दूसरे से बेहतर होने की कोशिश करता है?
दरअसल, हमारी संस्कृति में लोगों को एक सांचे में ढालने की प्रवृत्ति है, लेकिन झुंड हमेशा गतिमान रहते हैं। व्यक्ति मूलत: ऐसा ही होता है, जो घर पर बर्हिमुखी हो, वह बाहर अंतर्मुखी हो सकता है। आप उसे सांचे में ढाल नहीं सकते। आप स्वयं ही देखें, क्या आप हर परिस्थिति में एक जैसा व्यवहार करते हैं? नहीं, न। इसलिए हमें लोगों को पक्षियों के झुंड के रूप में देखना चाहिए। तभी हम समझ सकेंगे कि विभिन्न मानसिक गतिविधियां एक समग्र प्रक्रिया के हिस्से के रूप में एक-दूसरे से कैसे जुड़ी हुई हैं। आपकी भावनाएं आपके देखने को उतना ही प्रभावित करती हैं, जितना कि आपका देखना आपकी भावनाओं को। जब हम ऐसा सोचते हैं, तो मानसिक श्रेणियों के बीच विभाजन अपने आप धीरे-धीरे मिटने लगता है।
प्राचीन ग्रीक विचार कहता है कि तर्क एक बुद्धिमान सारथी है और भावनाएं व इच्छाएं रथ को खींचने वाले घोड़े हैं। इस विचार में तर्क शांत, परिष्कृत और बुद्धिमान है, जबकि भावनाएं व इच्छाएं मूक व आदिम जानवर हैं। इसका यह अर्थ भी है कि लोग अच्छा तर्कसंगत जीवन तब जीते हैं, जब वे भावनाओं को दबाने और नियंत्रित करने के लिए तर्क का उपयोग करते हैं। हालांकि, यह विचार तर्क की शक्ति के अत्यधिक सकारात्मक, जबकि भावनाओं के अति नकारात्मक आकलन पर आधारित है। सच्चाई यह है कि भावनाओं की अपनी भूमिका होती है। यही आपको जोखिम लेने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, अपने संकीर्ण स्व से परे अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करती हैं। मसलन, दुख की भावना आपके सोचने के तरीके को बदलती है। इच्छाओं की भी भूमिका होती है। ये शरीर की भाषा होती हैं। एनी मर्फी पॉल अपनी किताब द एक्सटेंडेड माइंड में लिखती हैं कि हाल के शोध एक आश्चर्यजनक संभावना की ओर इशारा करते हैं: शरीर मस्तिष्क से अधिक तर्कसंगत हो सकता है।
दरअसल, ये तर्क, भावनाएं और इच्छाएं केवल दिमाग के संसाधन हैं, जिनका उपयोग वह अपने निर्णयों में करता है। इन सभी की अपनी-अपनी खूबियां और कमियां होती हैं, और जीवन तब सर्वोत्तम होता है, जब व्यक्ति क्षमताओं को सहज और सुव्यवस्थित तरीके से समन्वित करता है। कुछ लोग अपनी सारथी वाली भूमिका से इतने भ्रमित हो जाते हैं कि वे अपनी सभी क्षमताओं का विकास करने की जरूरत तक नहीं समझते। यही कारण है कि असाधारण रूप से बुद्धिमान लोग अक्सर आश्चर्यजनक रूप से मूर्खतापूर्ण कार्य कर बैठते हैं। एक सचेत व्यक्ति के रूप में आपका काम एक तर्कवादी सारथी बनना नहीं है, बल्कि अपनी भावनाओं, इच्छाओं और शरीर द्वारा भेजे गए निर्णयों को पढ़ना, जब वे उचित हों, तो उन पर अमल करना और जब वे अनियंत्रित हो जाएं, तो उन्हें सही दिशा देना है।
चेतन मन जब हमारी प्रजाति की आत्मकथा लिखता है, तो खुद को मुख्य भूमिका सौंपता है। लेकिन मनुष्य को पक्षियों के झुंड के समान देखने से हम उन गहन प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं, जिन पर हमें हर पल भरोसा करना चाहिए, भले ही वे चेतन जागरूकता की सतह के नीचे से उभरती हों।