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Sri Lanka Crisis: श्रीलंका में इस शांति का मतलब
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Sri lanka Crisis
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सोशल मीडिया
विस्तार
पिछली गर्मियों की राजनीतिक उथल-पुथल और परोक्ष रूप से दिवालियापन में डूब जाने के बाद से श्रीलंका में अभी शांति नजर आ रही है। ईंधन के लिए लगने वाली सर्पिल अकार की लंबी कतारें अब नजर नहीं आतीं; जिस समुद्र तट पर महीने भर तक प्रदर्शन चलता रहा, वह छुट्टियों के दौरान क्रिसमस की रोशनी में जगमग कर रहा था और कार्निवाल के जश्न में डूबा हुआ था। लेकिन सतह के नीचे, हलचल है। इस द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था अब भी वेंटिलेटर पर है और सरकार को अभी तबाह कर देने वाले कर्ज से उबरने का सुरक्षित रास्ता तलाशना है।
श्रीलंकाई इस दुखद सचाई के आदी हो चुके हैं: कम भोजन, सिकुड़ती आय और घटती उम्मीदें। अनेक युवा बेताबी के साथ देश से बाहर जाने के रास्ते तलाश रहे हैं। जो लोग भागने में सफल नहीं हो सकते, वे इस उम्मीद के साथ हैं कि कभी मध्य आय वाला देश रहे श्रीलंका में आर्थिक बदलाव आएगा।
शायद सबसे ज्यादा, जो बात श्रीलंकाई लोगों को परेशान कर रही है, वह यह है कि जुलाई में एक लोकप्रिय विद्रोह के बाद भी, जिसने मजबूत राष्ट्रपति को हटा दिया, लेकिन अब भी बहुत कम जवाबदेही के साथ कमान उसी राजनीतिक अभिजात वर्ग के पास है, जो कि देश की बर्बादी के लिए जिम्मेदार है।
आर्थिक आंकड़े बदहाल जीवन की तस्वीर पेश करते हैं। मुद्रास्फीति, जो कि संकट के चरम के समय 90 फीसदी तक पहुंच गई थी, अब भी कष्टकारी ढंग से 59 फीसदी है। हर पांच में से चार घरों में खाद्य सामग्री की खरीद उनकी आय का 75 फीसदी चट कर जाती है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 30 फीसदी आबादी खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है। स्थिरता की कुछ झलक नजर आई जरूर, लेकिन अर्थव्यवस्था की मरम्मत के कारण नहीं, बल्कि पीड़ादायक कर वृद्धि और सब्सिडी में कटौती के कारण, जिसने मांग को और बाधित किया है। ये कदम जहां जरूरी है, अलोकप्रिय भी हैं और इससे राजनीतिक विपक्ष को हमलावर होने का मौका मिल गया है, जो कि आशंका जता रहा है कि सरकार या अगली सरकार और ज्यादती कर सकती है।
श्रीलंका के हरे-भरे मैदानी मध्य भाग में एक छोटी दुकान चलाने वाले 65 वर्षीय किसान एचएम दिसानायके और उनकी 64 वर्षीय पत्नी मालनी मांगलिका ने मछली और मांस का सेवन हफ्ते में तीन बार से घटाकर महीने में एक बार कर दिया है।
यह याद करने के लिए वे दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगते हैं कि आखिरी बार उन्होंने दूध कब लिया था। फिर मांगलिका कहती हैं, 'छह महीने पहले।'
दिसानायके पूछते हैं, 'हमने अंडे कब से नहीं लिए?'
वह कहती हैं, 'दो महीने से।'
अधिकारी और राजनयिक बारीकी से देख रहे हैं कि क्या 2.2 करोड़ की आबादी वाला देश श्रीलंका चीजों को नियंत्रित करने में सफल हो पाता है या नहीं, या फिर वह गहरे आर्थिक संकट में तो नहीं डूब जाएग, ताकि वे इसके दूरगामी प्रभाव का आकलन कर सकें। दर्जनों अन्य छोटे राष्ट्र इसी तरह अस्थिर ऋण से जूझ रहे हैं, यह ऐसा झटका है, महामारी के आर्थिक प्रहार और यूक्रेन पर रूस द्वारा थोपे गए युद्ध के कारण बढ़ती कीमतों से, जिससे उबरना और भी कठिन हो गया है। इन सभी देशों में एक बात समान है और वह यह कि इन सबके कर्ज का बड़ा हिस्सा चीन के कर्ज से डूबा हुआ है।
पिछले वसंत में श्रीलंका अपना कर्ज चुकाने में नाकाम हो गया था। अब वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ एक बेलआउट पैकेज पर चर्चा कर रहा है, जो कि 2.9 अरब डॉलर की नकदी उसकी अर्थव्यवस्था में डाल सकता है, जिसकी उसे जरूरत है और उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इससे वह लेनदारों के साथ कुछ विश्वास बहाली कर सकता है।
आईएमएफ के पैकेज की शर्तों के अनुसार श्रीलंका को चीन जैसे अपने द्विपक्षीय कर्जदारों के साथ अपने बकाए कर्ज की शर्तों को संशोधित करना होगा। श्रीलंका के लगभग 50 अरब डॉलर के ऋण का अधिकांश हिस्सा बहुपक्षीय उधारदाताओं और संप्रभु बांडों से आता है। श्रीलंका सरकार के अनुसार, लगभग सात अरब डॉलर के बकाया ऋण के साथ चीन सबसे बड़ा द्विपक्षीय दाता है। भारत उसका एक अन्य मुख्य कर्जदाता है और उसने भी ऋण पुनर्गठन को लेकर आश्वासन दिया है।
श्रीलंका के वित्त राज्य मंत्री शेहन सेमासिंघे कहते हैं कि सरकार ने भयावह संकट के महीनों की तुलना में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और उपलब्धता को बेहतर किया है। लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 'नगण्य' बना हुआ है और देश बहुत कठिनाई से गुजारा कर रहा है।
- साथ में स्कंध गुणाशेखर
