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स्मृति: 'इस लिफाफे में तुम्हारे पूर्वजों की स्मृति है', इसी गुरुत्वाकर्षण का नाम था ज्ञानरंजन!
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अमर उजाला
विस्तार
ज्ञानरंजन ने कहा था।वे सुदीर्घ योगदान के लिए जब अमर उजाला शब्द सम्मान समारोह में आकाशदीप ग्रहण कर रहे थे तो उनके शब्दों की दमक मुंबई के सभागार में खचाखच भरे हॉल को रोशनी से भर रही थी।
वे ऐसे ही, हरदम उद्दाम ऊर्जा के साथ एक गहरे स्थैर्य को भी संबोधित करते आए थे। अस्सी के दशक में उनसे मेरी दुआ-सलाम शुरू हुई जो पहले ही दौर में एक आत्मीय रिश्ते में तब्दील हो गई। ऐसा मैं अकेला नहीं था। उनकी उम्र से आधी उम्र के लोग उनके बहुत गहरे मित्र हो जाते थे। उनके छोटे-छोटे पोस्टकार्ड और जलती सीपियों सी चिट्ठियां अपने साथ समंदर की आवाज और तल में बैठी धूप एक साथ दे सकती थीं। शायद यह उनकी प्रकृति और पृष्ठभूमि का ही खेल था कि वे वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ अंतरंगता के इंद्रधनुष में कहीं गहरे रंग डाल सकते थे।
पर्वत शृंखलाओं को पार करने, नदियों की छाती पर पुल बनाने, जंगलों-बीहड़ों से गुजरते जाने और रेतीले तपिश भरे अनुभवों में जाने और लौटने को वे अपना चुना हुआ काम कहते थे। मध्यवर्गीय शहरी जीवन की विसंगत स्थितियों का संधान करने की शक्ति से उन्होंने साठोत्तरी कहानी को अपनी ऊर्जा से भर दिया था। विवादों, असहमतियों और जिद का उनका अपना इतिहास है। चाहे वह गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता रामनाथ सुमन से हो या आलोचक नामवर सिंह से। पिता अपने इस मझले बेटे की वैचारिकी से असहमत थे, पर गुंटर ग्रास की महंगी किताब 'डॉग ईयर्स’ खरीदने के लिए रुपए भी वही देते थे। नामवर उन्हें ‘डेढ़ कहानी का कथाकार’ कहते थे पर सोवियत लैंड अवार्ड देने के लिए उन्हें पचास साल के ज्ञानरंजन का नाम ही सबसे प्यारा लगा। ज्ञानरंजन की इस अनूठी उलटबांसी में ही ‘पहल’ पत्रिका का एक जबर्दस्त समूह तैयार हुआ जिसे वह स्वयं ‘अंडरवर्ल्ड’ कहते थे। ये वे रस्सियां थीं, जो कुओं से जल निकालती थीं।
विचार का डंका हवा में नहीं बजता। ‘पहल’ कथा, कविता, आलोचना सबकी एक धड़कती जगह थी। ज्ञानरंजन की भाषा उनकी शख्सियत का जोड़ थी। सधी रीढ़, बेधती आंख, फीतों की मुश्किल से आजाद चप्पलें, बढ़ी हुई दाढ़ी, जिद का प्याला, थामा हुआ गरम हाथ और झरने सी बहती शीतल-गुनगुनी आत्मीयता। उसकी वजह से ही शायद ‘चार यार’ (दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन) इलाहाबाद की मशहूर चौकड़ी रहे होंगे। संभ्रांतों की दुनिया में अचानक घुस आए गुरिल्ले। खुद ज्ञानरंजन के शब्दों में, जब वे कहानियां लिख रहे थे, तब की दुनिया अलग थी। तब जोशीले, कलंदर, मोहब्बतों से भरे हुए जिंदादिल लोग थे। रचनाएं जुगनुओं की तरह दमकती थीं। सोहबतों का वृंदावन था।
इलाहाबाद उनके भीतर इस तरह उतरा हुआ था कि वे कहते थे, आंखों पर पट्टी बांध कर आप स्टेशन पर उतार दीजिए, मैं जान जाऊंगा कि इलाहाबाद में हूं या नहीं। उस शहर के बारे में उनका बयान था-‘मौत के मुंह में वहां गंगाजल के बाद सर्वाधिक उम्मीद कविता से थी।’
और शहरों की तरह इलाहाबाद भी अब वह शहर नहीं रहा, जिसे वे भीतर रखे हुए थे। बाद के दिनों में की गई एक यात्रा के बाद उन्होंने लिखा था-ऐसा लगता है, अकाल अब हर समय चल रहा है। अब अकाल ही अकाल है। लोग जादुई तरह से कराहते हुए गायब हो रहे हैं। अभी-अभी वे थे और अभी-अभी वे नहीं हैं। चीजों के निशान बचे नहीं या बने ही नहीं। क्या आज सभी शहरों की एक जैसी हालत है या इलाहाबाद ही वह शहर है जो मरी हुई आंखों में पुतली की तरह फैल गया है।
बेंजामिन कहते थे, कोई चेहरा इतना अतियथार्थवादी नहीं है जितना एक शहर का चेहरा। यहां इच्छाओं और लालसाओं की एक भयावह मरीचिका रची गई है।
अंधेरी दुनिया के ऊपर दमकते मीना बाजारों को देखते हुए जब हम किसी शहर में मीनमेख निकाल रहे होते हैं, उसी समय लाखों लाख लोग उसे प्यार भी कर रहे होते हैं। ज्ञानरंजन का मानना था कि पूरी तरह महानगरीय यथार्थ को व्यक्त करने वाली संपूर्ण रचना अब तक लिखी जाना बाकी है।
प्रकृति और शहर, ज्ञानरंजन को संगति देते थे। इस संगति ने उन्हें अनुभव, बिंब और मुठभेड़ का असलहा उपलब्ध कराया। अधूरे, उद्विग्न और बेगाने कैशोर्य से आवारागर्द की तरह वे जीवन की पाठशाला में उतरने का उपक्रम तलाशते हुए यहां तक पहुंचे। उनके ही शब्दों में, कभी ऐसा दिन भी होता है और ऐसी ऋतु जब आकाश पर सुबह तक चांद एक वाटरमार्क की तरह उपस्थित रहता है और दूसरी तरफ सूर्योदय भी हो रहा होता है। उनके जीवन का प्रारंभ कुछ ऐसा ही था।
ज्ञानरंजन की भाषा कुछ ऐसी थी जैसे-‘शमशेर (बहादुर सिंह) के नेत्र मैं भूलता नहीं, वे चलती नावों की तरह हंै।’ ‘सपना नहीं’ की उनकी समग्र कहानियां हों या ‘कबाड़खाना’ अथवा ‘उपस्थिति का अर्थ’ का गद्य, उनकी मोहक शक्ति सर्वत्र उपस्थित होती है।
वे जब चिट्ठी खत्म करते थे तो अंत में पूरा ‘तुम्हारा’ लिखने की बजाय ‘तु.’ लिखते थे। और, एक बार उन्होंने मुझे लिफाफा भेजा आर.के. लक्ष्मण के बनाए चित्र के साथ! लिखा था-‘इसमें तुम्हारे पूर्वजों की स्मृति है।’
इसी गुरुत्वाकर्षण का नाम था ज्ञानरंजन! जब हम समुद्र को नहीं जानते थे, तब वह डरावना था। फिर एक मस्तूल उठा, फिर नमक बना, फिर सीपियां खोजी गईं, फिर तेल भी निकला उसी के कुओं से। जानने के लिए जीवन में प्रवेश करना और मुठभेड़ को प्रस्तुत होना ही लहराते जीवन का मूल है। ज्ञानरंजन की स्मृति उस लहर को जिंदा रखेगी, अपनी अदम्य बुलाहट की तरह, ‘इसमें तुम्हारे पूर्वजों की स्मृति है।’