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भरोसे की बहाली का समय: जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं; समाज, परिवार, शिक्षकों के साथ खुद छात्रों पर भी दारोमदार

Mon, 27 Jul 2026 06:43 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Mon, 27 Jul 2026 06:43 AM IST
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सार
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 को और प्रभावी बनाने के लिए सख्त संशोधनों का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत पेपर लीक और परीक्षा माफिया पर कठोर सजा, भारी जुर्माना, संपत्ति कुर्की, फास्ट-ट्रैक अदालतों और डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही गई है। लेख में जोर दिया गया है कि परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षण संस्थानों, कोचिंग उद्योग और छात्रों की भी है।
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Time to restore trust Responsibility does not lie solely government also society families teachers students
पेपर लीक पर सख्ती की तैयारी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

प्रश्नपत्र की रक्षा करोड़ों युवाओं के विश्वास की रक्षा है। यह संविधान प्रदत्त समान अवसर की रक्षा है। यह भारत की प्रतिभा, प्रशासनिक गुणवत्ता और लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा है। पेपर लीक से निपटने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान, कोचिंग उद्योग और स्वयं छात्रों की भी है। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं को और अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और उत्तरदायी बनाने के लिए ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024’ को और प्रभावी बनाने हेतु व्यापक संशोधनों का प्रस्ताव रखा है। इन प्रस्तावों का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे दंड बढ़ाते हैं, बल्कि इसलिए भी है कि वे परीक्षा-अपराधों के प्रति शासन की गंभीरता का स्पष्ट संकेत देते हैं।



क्या अब पेपर लीक करने वालों पर पहले से कहीं ज्यादा सख्त कार्रवाई होगी?
प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार, व्यक्तिगत संलिप्तता के मामलों में न्यूनतम कारावास की अवधि पांच वर्ष तक बढ़ाने तथा गंभीर मामलों में आर्थिक दंड को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये तक करने का प्रस्ताव है। संगठित परीक्षा माफिया के लिए 10 वर्ष तक के कठोर कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने की व्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि अब परीक्षा अपराधों को सामान्य धोखाधड़ी नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध माना जा रहा है। दोषी एजेंसियों की संपत्ति कुर्क करने, उनके प्रबंधन के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई करने तथा विशेष अदालतों को अधिक प्रभावी वैधानिक अधिकार प्रदान करने का प्रस्ताव भी इसका हिस्सा है। इन संशोधनों का सबसे उल्लेखनीय पक्ष ‘समयबद्ध न्याय’ की अवधारणा है। वर्षों तक लंबित मुकदमे अपराधियों में भय नहीं, बल्कि साहस पैदा करते हैं। इसलिए फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से तीन माह के भीतर सुनवाई पूरी करने की व्यवस्था केवल प्रक्रियागत सुधार नहीं, बल्कि न्याय की प्रभावशीलता की बहाली का प्रयास है। इसके साथ ही निर्दोष विद्यार्थियों को अनावश्यक दुष्प्रभाव से बचाने के लिए सुरक्षा प्रावधानों पर बल दिया जाना दर्शाता है कि कानून का उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि न्याय भी है।


क्या केवल कठोर कानून से परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष बन सकती है?
वस्तुतः ये प्रस्ताव शासन की उस नई सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें राज्य अपराध की संभावना को न्यूनतम करने वाला उत्तरदायी संरक्षक बनता है। यह दंडात्मक शासन से आगे बढ़कर निवारक सुशासन की दिशा में उठाया गया कदम है। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि कोई भी कानून, चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो, अपने आप परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह निष्पक्ष नहीं बना सकता। कानून भय उत्पन्न कर सकता है, लेकिन विश्वास नहीं। विश्वास का निर्माण पारदर्शी संस्थाओं, सक्षम प्रशासन और सुरक्षित तकनीकी व्यवस्था से होता है।

क्या एआई और डिजिटल सुरक्षा पेपर लीक पर रोक लगाने में गेमचेंजर बन सकते हैं?
आज आवश्यकता है कि परीक्षा सुरक्षा को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय डिजिटल अवसंरचना का दर्जा दिया जाए। प्रश्नपत्र केवल मुद्रित कागज नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ा संवेदनशील डिजिटल दस्तावेज है। उसके निर्माण, एन्क्रिप्शन, भंडारण, परिवहन और उपयोग के लिए वही सुरक्षा मानक अपनाए जाने चाहिए, जो बैंकिंग, रक्षा और डिजिटल भुगतान प्रणालियों में लागू होते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भी इस दिशा में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती है। एआई संदिग्ध गतिविधियों का विश्लेषण कर सकती है, प्रतिरूपण की पहचान कर सकती है, साइबर हमलों की पूर्व चेतावनी दे सकती है और परीक्षा प्रक्रिया की सतत निगरानी कर सकती है। किंतु तकनीक का उपयोग सदैव पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और मानवीय नियंत्रण के साथ होना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य न्याय को सशक्त करना है, उसका स्थान लेना नहीं।

क्या देश को राष्ट्रीय परीक्षा सुरक्षा ग्रिड की जरूरत है?
इसके साथ ही प्रत्येक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षा के लिए स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, साइबर सुरक्षा का नियमित मूल्यांकन, केंद्र और राज्यों के बीच राष्ट्रीय परीक्षा सुरक्षा ग्रिड तथा स्पष्ट प्रशासनिक जवाबदेही की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। परीक्षा माफिया सीमाओं में नहीं बंधे हैं, इसलिए सुरक्षा तंत्र भी समन्वित, प्रौद्योगिकी-सक्षम और अखिल भारतीय होना चाहिए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 16 लोक सेवाओं में समान अवसर की गारंटी प्रदान करता है। प्रतियोगी परीक्षाएं इन दोनों संवैधानिक आदर्शों की व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं। जब प्रश्नपत्र पहले से कुछ लोगों तक पहुंच जाता है, तब केवल परीक्षा नियमों का उल्लंघन नहीं होता, बल्कि संविधान की मूल भावना भी आहत होती है। इसीलिए परीक्षा सुधार एक संवैधानिक उत्तरदायित्व है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी प्रौद्योगिकी-सक्षम, पारदर्शी और विश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली का समर्थन करती है। दूसरी ओर, आधार, यूपीआई और डिजिटल अवसंरचना ने सिद्ध किया है कि भारत विशाल स्तर पर सुरक्षित डिजिटल प्रणालियां विकसित करने में सक्षम है। यही क्षमता अब परीक्षा प्रणाली में भी दिखाई देनी चाहिए।

क्या परीक्षा सुधार की जिम्मेदारी केवल सरकार की है?
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर सार्वजनिक भर्ती प्रक्रियाओं की निष्पक्षता को लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला माना है। यह स्मरण कराता है कि सरकारी नियुक्तियां केवल रिक्त पद भरने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का अनुबंध भी हैं। यदि चयन प्रक्रिया संदिग्ध हो जाए, तो उसका प्रभाव केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शासन की नैतिक वैधता को भी प्रभावित करता है। इससे निपटने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान, कोचिंग उद्योग और स्वयं विद्यार्थियों को भी यह स्वीकार करना होगा कि ईमानदारी सफलता का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है। जिस समाज में परिश्रम की अपेक्षा छल को महत्व मिलने लगे, वहां कठोर कानून भी स्थायी समाधान नहीं दे सकते।

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क्या अब विवाद छोड़ समाधान की ओर बढ़ने का समय आ गया है?
आज हमारे सामने दो विकल्प हैं। पहला, प्रत्येक पेपर लीक के बाद कुछ दिनों तक राजनीतिक विवादों में उलझे रहें और फिर अगली घटना की प्रतीक्षा करें। दूसरा, ऐसी परीक्षा व्यवस्था का निर्माण करें, जहां अपराध करना कठिन हो, पकड़ा जाना निश्चित हो और ईमानदारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाए। एक आत्मविश्वासी और विकसित राष्ट्र दूसरा मार्ग चुनता है। प्रश्नपत्र की रक्षा करोड़ों युवाओं के विश्वास की रक्षा है। यह संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर की रक्षा है। यह भारत की प्रतिभा, उसकी प्रशासनिक गुणवत्ता और उसके लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा है। यही समय है कि हम विवाद से विमर्श, विमर्श से नीति और नीति से समाधान की यात्रा प्रारंभ करें। क्योंकि विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव केवल आधुनिक अवसंरचना नहीं, बल्कि ऐसी निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वास-आधारित परीक्षा व्यवस्था होगी, जिस पर प्रत्येक युवा बिना किसी संशय के भरोसा कर सके।

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