लगातार बारिश ने जिस तरह से देश की आर्थिक राजधानी की रफ्तार थाम ली है और मौसम विभाग ने उत्तर भारत में भी अगले एक हफ्ते में भारी बारिश की चेतावनी दी है, उससे यह प्रश्न फिर प्रासंगिक हो गया है कि आखिर हर वर्ष मानसून के आगे घुटने टेकती शहरी व्यवस्थाएं सबक कब लेंगी।
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मुंबई में लगातार हो रही बारिश ने जिस तरह सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त किया हुआ है और मौसम विभाग ने उत्तर भारत में भी अगले एक हफ्ते तक भारी बारिश की चेतावनी दी है, उससे यह सवाल एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है कि आखिर हर वर्ष मानसून के दौरान डूबते शहरों, बाधित यातायात और जान-माल के नुकसान से सबक लेने में हमारी शहरी व्यवस्थाएं इतनी असफल क्यों साबित होती हैं? मुंबई की बारिश में पिछले एक हफ्ते में कई लोगों की जान जा चुकी है, निचले इलाकों में जलभराव से हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं और मुंबई की जीवन रेखा मानी जाने वाली उपनगरीय रेल सेवाएं भी कई बार बाधित हुई हैं। कमोबेश यही स्थिति हर वर्ष दिल्ली, गुरुग्राम, बंगलूरू, चेन्नई, हैदराबाद, पटना और लखनऊ जैसे शहरों में भी देखने को मिलती है। मानसून का कैलेंडर तय है, उसकी संभावित तीव्रता का अनुमान भी मौसम विभाग अब अधिक सटीकता से लगाने लगा है। फिर आखिर क्यों हमारी तैयारी हर बार नाकाफी रह जाती है? बारिश एक प्राकृतिक घटना है, पर उसका हर वर्ष आपदा में बदल जाना क्या मानवीय विफलता का नतीजा नहीं माना जाना चाहिए? यह समझना चाहिए कि समस्या बारिश नहीं, बल्कि शहरी विकास का वह मॉडल है, जिसमें प्रकृति के लिए कोई जगह नहीं बची। नदियों, तालाबों, झीलों और प्राकृतिक नालों को पाटकर अव्यवस्थित ढंग से आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाएं खड़ी कर दी गईं। बारिश के पानी के प्राकृतिक प्रवाह के रास्ते अवरुद्ध हो जाने से पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिल पाता और थोड़ी देर की बारिश से पूरा शहर तालाब में तब्दील हो जाता है। ज्यादातर शहरों में दशकों पुरानी सीवर और ड्रेनेज प्रणाली आज की आबादी व कंक्रीट के फैलाव का भार उठाने में सक्षम नहीं है। नालों की समय पर सफाई नहीं होती, जबकि प्लास्टिक व ठोस कचरा उनमें भरता जाता है। बारिश शुरू होने के बाद सफाई अभियान की औपचारिकता निभाई जाती है, जबकि इसकी तैयारी गर्मियों से शुरू होनी चाहिए। यह देखते हुए कि जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को अधिक गंभीर बना दिया है और अब कम समय में अधिक मात्रा में बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, सिर्फ पुराने ढांचे की मरम्मत से काम नहीं चलेगा, बल्कि मौसमी बदलावों के मद्देनजर नई तरह की शहरी योजना बनानी होगी। इस मामले में हम दुनिया के अत्याधुनिक शहरों से काफी कुछ सीख सकते हैं, जिन्होंने स्पंज सिटी मॉडल, हरित क्षेत्रों के संरक्षण और रियल-टाइम में बाढ़ की चेतावनी प्रणाली के जरिये शहरी बाढ़ के जोखिम को कम किया है। बारिश के बाद समीक्षा बैठकों, मुआवजे की घोषणाओं और जांच समितियों का चक्र अब टूटना चाहिए और शहरी नियोजन को भी जलवायु-जोखिमों के अनुरूप बदलना चाहिए।
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