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आधी आबादी की अधूरी कहानी: महिलाओं की मेहनत का अनदेखा मूल्य, समान अवसरों की अब भी दरकार

Tue, 07 Jul 2026 06:54 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 07 Jul 2026 06:54 AM IST
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सार
एनएसओ के ताजा सर्वेक्षण का यह कहना चौंकाता है कि देश के सर्वाधिक उन्नत शहरों में करीब 69 फीसदी महिलाएं घरेलू कामकाज के चलते श्रमबल से बाहर हैं। यह इस मिथक को भी तोड़ता है कि आर्थिक संपन्नता अपने आप लैंगिक समानता लेकर आती है।
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आधी आबादी की अधूरी कहानी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा सर्वेक्षण का यह खुलासा कि देश के दस लाख से अधिक आबादी वाले शीर्ष 46 शहरों में तकरीबन 69 फीसदी महिलाएं बच्चों की देखभाल और घरेलू कामकाज की वजह से श्रमबल से बाहर हैं, चौंकाने वाला तो खैर है ही, जीडीपी विकास दर के अनुमानों और अर्थव्यवस्था में आधी आबादी की सहभागिता के बीच मौजूद विरोधाभास को भी बेहद स्पष्ट ढंग से सामने लाता है। सर्वेक्षण के अनुसार, इन शहरों में जो नौकरीपेशा महिलाएं हैं, वे भी पुरुषों की तुलना में करीब 23 फीसदी कम मासिक वेतन पा रही हैं। स्वरोजगार के मामले में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में तकरीबन आधी कमाई ही कर पा रही हैं। दरअसल, ये आंकड़े सिर्फ आर्थिक तथ्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज में गहराई तक जड़ें जमाए लैंगिक असमानता का आईना हैं। विडंबना यह है कि यह स्थिति उन शहरी और अपेक्षया संपन्न इलाकों की है, जहां शिक्षा, आय और आधुनिक जीवनशैली के कारण बराबरी की अपेक्षा अधिक की जाती है। कई मामलों में महिलाएं परिवार की देखभाल के कारण पदोन्नति के अवसर छोड़ देती हैं, जिससे उनके कॅरिअर में विकास पर असर पड़ता है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य क्षेत्रों में शिक्षित महिलाओं का घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से श्रमबल से बाहर होना उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि समाज की उत्पादकता की दृष्टि से भी नुकसानदायक है।  इस स्थिति के पीछे वे सामाजिक मानदंड जिम्मेदार हैं, जिनमें घर की देखभाल करने को महिलाओं का स्वाभाविक कर्तव्य मान लिया जाता है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस अदृश्य श्रम का आर्थिक मूल्य लगभग शून्य मान लिया जाता है। घर के भीतर दिन-रात किए जाने वाले काम न तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का हिस्सा बनते हैं और न ही उन्हें अपेक्षित सम्मान मिलता है। जबकि, यही काम अगर घरेलू सहायक, आया, रसोइया इत्यादि करते हैं, तो इसे आर्थिक गतिविधि में शामिल किया जाता है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घरेलू महिलाओं को राष्ट्र निर्माता कहते हुए किसी दुर्घटना आदि में मुआवजे के संदर्भ में उनके श्रम के आर्थिक मूल्य का भी निर्धारण किया गया है। लेकिन, समाज में अपेक्षित बदलाव तभी आएगा, जब घर व परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी को केवल महिलाओं का दायित्व मानने की मानसिकता बदले। विकसित देशों में पितृत्व अवकाश, लचीले कार्य-घंटे और वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाओं ने महिलाओं की कार्यस्थल पर वापसी को आसान बनाया है। भारत में भी ऐसी नीतियों को व्यापक और प्रभावी बनाए जाने की जरूरत है। आर्थिक विकास तभी सार्थक हो सकता है, जब वह समावेशी भी हो।
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