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निर्णयों में इतना विलंब क्यों?: श्रम न्यायालयों में फैसलों में देरी, आखिर कहां अटक रही है न्याय व्यवस्था
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निर्णयों में इतना विलंब क्यों?
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विस्तार
26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू किया गया, जिसने देश की शासन व्यवस्था को विधिक आधार प्रदान किया। समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक सुधार भी किए जाते रहे हैं। इसी क्रम में श्रम कानूनों के सरलीकरण एवं आधुनिकीकरण हेतु भारत सरकार द्वारा चार श्रम संहिताओं की अधिसूचना जारी की गई। संविधान में सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की स्थापना को राज्य का मूल दायित्व माना गया है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु विवादों के त्वरित निस्तारण के लिए श्रम न्यायालयों एवं औद्योगिक न्यायाधिकरणों की स्थापना की गई है। श्रम कानूनों का मूल उद्देश्य श्रमिकों को सुलभ, त्वरित एवं कम खर्चीला न्याय उपलब्ध कराना है। किंतु, व्यवहार में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि श्रम न्यायालयों में मामलों के निस्तारण में इतना विलंब क्यों होता है और क्या यह देरी जानबूझकर की जाती है?सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक श्रम न्यायालयों एवं औद्योगिक न्यायाधिकरणों में पीठासीन अधिकारियों के पदों का लंबे समय तक रिक्त रहना है। सेवानिवृत्त प्रशासनिक या अन्य सेवाओं के अधिकारियों को पीठासीन अधिकारी नियुक्त किए जाने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। यद्यपि, उनके पास प्रशासनिक क्षेत्र का अनुभव होता है, तथापि न्यायिक प्रक्रिया, साक्ष्य के मूल्यांकन तथा विधिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग का अनुभव सीमित होने के कारण वे कई अवसरों पर अधीनस्थों पर निर्भर हो जाते हैं। इससे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता तथा न्याय वितरण प्रणाली के प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।
न्यायालयों का उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, न कि विवादों को अनावश्यक रूप से लटकाना। तथापि, संस्थागत कमियों, न्यायिक ढांचे की सीमाओं तथा विशेषज्ञता के अभाव के कारण अनेक मामलों में विलंब हो जाता है। देश के अधिकांश राज्यों में श्रम न्यायालयों की संख्या, लंबित मामलों की तुलना में पर्याप्त नहीं है। एक ही न्यायालय को कई जनपदों के मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है। न्यायालयों में रिक्त पद, सीमित संसाधन तथा बढ़ते औद्योगिक विवाद कार्यभार को और बढ़ा देते हैं। राष्ट्रीय न्यायिक डाटाग्रिड के आंकड़े समय-समय पर यह दर्शाते रहे हैं कि देशभर के विभिन्न न्यायालयों में बड़ी संख्या में श्रम व सेवा संबंधी विवाद लंबित रहते हैं। स्पष्ट है कि समस्या केवल एक राज्य या न्यायालय की नहीं, बल्कि एक व्यापक संस्थागत चुनौती है। कई बार किसी मामले की सुनवाई के दौरान पीठासीन अधिकारी बदल जाते हैं। नए अधिकारी को प्रकरण की पूरी पृष्ठभूमि समझने में समय लगता है। इन सबसे भी कार्यवाही की अवधि बढ़ जाती है।
भारत में अधिकांश न्यायिक अधिकारी सामान्य न्यायिक सेवा से आते हैं। उनकी प्रारंभिक प्रशिक्षण व्यवस्था मुख्यतः दीवानी, फौजदारी तथा प्रक्रिया संबंधी कानूनों पर केंद्रित होती है, जबकि श्रम कानूनों की प्रकृति विशिष्ट एवं तकनीकी है। कई मामलों में श्रम न्यायालयों के निर्णयों को उच्च न्यायालयों में चुनौती दी जाती है। यदि उच्च न्यायालय किसी निर्णय में विधिक त्रुटि पाता है, तो वह मामले को पुनः विचारार्थ वापस भेज सकता है। ऐसी स्थिति में, विवाद का अंतिम निस्तारण और अधिक समय लेता है। यद्यपि, यह प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा का आवश्यक भाग है, फिर भी इससे मुकदमों की अवधि बढ़ जाती है।
विधि आयोग तथा विभिन्न विशेषज्ञ समितियों ने समय-समय पर सुझाव दिए हैं कि श्रम न्यायालयों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। साथ ही, श्रम न्यायालयों एवं औद्योगिक न्यायाधिकरणों की संख्या में वृद्धि, रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति, श्रम कानूनों में विशेष प्रशिक्षण, ई-कोर्ट एवं डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली का विस्तार, समयबद्ध सुनवाई एवं केस प्रबंधन प्रणाली का प्रभावी क्रियान्वयन, वैकल्पिक विवाद निस्तारण और सुलह एवं मध्यस्थता को प्रोत्साहन जैसे जरूरी कदम भी उठाए जाने चाहिए।
श्रम न्यायालयों में होने वाला विलंब किसी व्यक्ति या संस्था की जानबूझकर की गई कार्यवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि न्यायिक अवसंरचना, कार्यभार, विशेषज्ञता की कमी तथा प्रक्रियागत जटिलताओं का संयुक्त प्रभाव है। यदि भारत को श्रमिकों के लिए वास्तविक और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना है, तो श्रम न्याय व्यवस्था में संरचनात्मक एवं संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी। विशेषज्ञ न्यायाधीशों, पर्याप्त न्यायालयों और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ही श्रम न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, विश्वसनीय और न्यायोन्मुख बनाया जा सकता है।