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पश्चिम एशिया संकट और तेल की बढ़ती कीमतें: क्या भारत के निर्यात पर संकट मंडरा रहा है?

जयंतीलाल भंडारी Published by: Shubham Kumar Updated Sat, 07 Mar 2026 07:26 AM IST
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सार
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि व आपूर्ति शृंखला के टूटने जैसे चिंताजनक हालातों से भारत के निर्यात और निवेश पर असर हो सकता है।
 
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West Asia crisis and rising oil prices: Are India exports facing a crisis
निर्यात - फोटो : Istock

विस्तार

इन दिनों ईरान और इस्राइल-अमेरिका के बीच युद्ध गहराने और उससे पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत के निर्यात परिदृश्य पर भी दिखाई देने लगा है। तीन मार्च को वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच की इकाई बीएमआई ने 'इंडिया आउटलुक' रिपोर्ट में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, माल ढुलाई लागत महंगी होने और आपूर्ति शृंखला के टूटने जैसे चिंताजनक हालातों से भारत के निर्यात और निवेश पर असर होगा।



रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 0.3 से 0.6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और निर्यात क्षेत्र की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इस स्थिति को देखते हुए सरकार ने निर्यात से जुड़े मंत्रालयों, निर्यातक संगठनों व शिपिंग कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ विशेष बैठक कर निर्यातकों को सहयोग देने के लिए बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क स्थापित की और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति व भंडार की निगरानी के लिए चौबीसों घंटे काम करने वाला कंट्रोल रूम भी बनाया गया है।


ईरान ने वैश्विक शिपिंग मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया है। इस मार्ग से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति होती है। इस मार्ग के बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। भारत का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी मार्ग से होकर आता है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। पांच मार्च को कच्चे तेल की कीमत करीब 83 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य पर पहुंच गई।

युद्ध के लंबा खिंचने पर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है और इससे पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे। चूंकि इस युद्ध से सीधे तौर पर जुड़े हुए अमेरिका, इस्राइल और ईरान सहित युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देश भी भारत के प्रमुख निर्यात बाजार हैं, ऐसे में भारत के निर्यातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। पश्चिम एशिया जाने वाला माल भारत के घरेलू बंदरगाहों पर जमा होने लगा है। शिपिंग कंपनियां चालक दल, कार्गो और जहाजों की सुरक्षा को देखते नए निर्यात आदेश नहीं ले रही हैं। ऐसे में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात घटने की आशंका है।

भारत ने इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर की अवधि में पश्चिम एशिया के 13 देशों को करीब 50 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया, जो कुल निर्यात का करीब 15 फीसदी है। इन देशों में भारत से होने वाले निर्यात प्रभावित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत को द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाते हुए निर्यात को आगे बढ़ना होगा। हाल के महीनों में भारत ने कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। भारत को निर्यात बढ़ाने के लिए चिह्नित किए गए करीब 200 देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

घरेलू कच्चे माल की ऊंची लागत और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण भी भारत द्वारा निर्यात किए जाने वाले उत्पाद की लागत वैश्विक स्तर से करीब 15-20 फीसदी की अधिक है। वित्त मंत्री द्वारा केंद्रीय बजट 2026-27 में निर्यात बढ़ाने के लिए जो कई रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष में शुरुआत से ध्यान देना होगा। उम्मीद करें कि सरकार ईरान और इस्राइल-अमेरिका के विस्तारित होते हुए युद्ध की चुनौतियों से निपटने और निर्यात को बेहतर करेगी। सरकार के द्वारा निर्यातकों के लिए जो बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क बनाई गई है, उसके माध्यम से सरकार निर्यातकों, लॉजिस्टिक संचालकों और शिपिंग कंपनियों के लिए हरसंभव सहयोग और सहायता के लिए अहम भूमिका निभाते हुए दिखाई देगी।

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