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खाड़ी में जंग: ट्रंप के पक्ष और विपक्ष में बंटी दुनिया और अमेरिका, किंतु इस कहानी की खलनायक कौन

ब्रेट स्टीफेंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: Pavan Updated Fri, 06 Mar 2026 08:25 AM IST
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सार
जो ट्रंप को अमेरिकी विदेश नीति को लोकतांत्रिक मूल्यों से अलग करने का दोषी ठहराते हैं, अब वही लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए युद्ध में जाने का आरोप उन पर लगा रहे हैं। अब यह फैसला दुनिया करे कि इस कहानी में कौन नायक है और कौन खलनायक।
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Gulf War: world-America are divided between those for and against Trump, but who is the villain of this story
इस कहानी का खलनायक कौन? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ईरानी शासन को गिराने के लिए युद्ध में इस्राइल का साथ देने के फैसले के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की जगह-जगह आलोचना हो रही है, जिसके नतीजे में शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या हो गई। इसके कई कारण हैं।


एलिजाबेथ वॉरेन कहती हैं कि यह 'अमेरिकी लोगों के साथ धोखा है', और चेतावनी देती हैं कि इससे 'एक और पीढ़ी हमेशा के लिए युद्ध में फंस सकती है।' मार्जोरी टेलर ग्रीन कहती हैं कि यह 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के सिद्धांतों के साथ धोखा है। उन्होंने 'अमेरिका को सबसे अंत में रखने' के लिए ट्रंप की बुराई की। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के अनुसार, यह गैर-कानूनी है, क्योंकि यह संसद की मंजूरी के बिना हो रहा है। लेखक एंड्रयू सुलिवन के अनुसार, यह गैर-जरूरी है, जो सोचते हैं कि ईरान कोई बड़ा खतरा नहीं है और यह युद्ध इस्राइल के लिए लड़ा जा रहा है। इसी तरह की प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। लेकिन जिस देश में अमेरिका और इस्राइल का व्यापक समर्थन हो रहा है, वह वही देश है, जिस पर बमबारी हो रही है। हालांकि यह भी सच है कि बहुत सारे आम लोग मारे गए, और खामनेई के लिए जनता में शोक मनाया गया। लेकिन उन दुख जताने वालों को सरकार की बंदूकों के डर से बाहर नहीं निकलना पड़ा।


एक समय था, जब ऐसे पलों से अमेरिकियों का दिल द्रवित हो जाता था- जब आजाद देश, वर्षों तक जालिमों के उकसावे और हमलों को झेलने के बाद, इंसाफ करने और उम्मीद जगाने के लिए एक साथ आते थे। अब हम एक अलग देश हैं, कम भोले लेकिन काफी ज्यादा निराशावादी और सनकी, और इसलिए यह पूछने की ज्यादा संभावना है : इसमें हमारे लिए क्या है?

मैं इस सवाल का जवाब देता हूं। सबसे पहले, तो यह कहना गलत है कि ट्रंप ने अमेरिका को युद्ध में उलझाया। उन्होंने जो किया, वह उस युद्ध का जवाब था, जो ईरान 1979 से अमेरिका के खिलाफ लड़ रहा है। इसने 1979 में हमारे दूतावास पर कब्जा करके, 1983 में बेरूत में हमारे सैकड़ों सैनिकों की हत्या (प्रॉक्सी के जरिये) करके और आईईडी की आपूर्ति करके युद्ध छेड़ा, जिससे इराक युद्ध के दौरान हमारे 1,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए या घायल हो गए। इसने युद्ध तब छेड़ा, जब जॉन बोल्टन, माइक पोम्पिओ और, पोलिटिको की 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खुद ट्रंप समेत अमेरिका के पुराने वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या करने की कोशिश की। ईरान ने ऐसा बर्ताव इसलिए किया कि उसे लगा, कोई बड़ी कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी।

दूसरी बात, पिछले जून में तेहरान के पास अपना रास्ता बदलने का मौका था, जब इस्राइल ने उस पर 12 दिन तक और अमेरिका ने रात भर हमला किया। लेकिन उसने अपनी परमाणु क्षमताओं को फिर से बनाना शुरू कर दिया, साथ ही तेजी से मिसाइल फोर्स को फिर से बनाया, जो अब तेल अवीव, दुबई, मनामा और रियाद में आम लोगों को डरा रही है, और अमेरिकी सैन्य संपत्तियों को निशाना बना रही है। क्या अमेरिका, अरब दुनिया या इस्राइल ज्यादा सुरक्षित होते, अगर हमने ईरान के कई हजार और मिसाइल बनाने का एक या दो साल इंतजार किया होता? या तब, जब रूस ने ईरान को हजारों उन्नत एयर डिफेंस मिसाइलें दी होतीं, जैसा कि फाइनेंशियल टाइम्स में पिछले हफ्ते खबर छपी थी कि वह ऐसा करने के लिए राजी हो गया है?

तीसरी बात, ईरान भू-राजनीतिक शून्य में नहीं है: मॉस्को और बीजिंग के साथ यह तानाशाही की धुरी का एक मुख्य सदस्य है, जो बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक दुनिया के लिए खतरा है। वही लिबरल, जो पुतिन का जोरदार विरोध न करने के लिए ट्रंप पर आरोप लगाते हैं, उन्हें यह सोचना चाहिए कि तेहरान ने ही रूस को ड्रोन और ड्रोन टेक्नोलॉजी दी है, जिससे यूक्रेन का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया है। और वही कंजर्वेटिव, जो ईरान में युद्ध के लिए प्रशांत से सैन्य संशाधनों को हटाने का ट्रंप पर आरोप लगाते हैं, उन्हें ध्यान देना चाहिए कि ईरान, वादे के मुताबिक 25 साल की, 400 अरब डॉलर की रणनीतिक भागीदारी के तहत चीन को चुपके से अपना ज्यादातर तेल आपूर्ति करता है। अगर तेहरान इस धुरी से बाहर हो जाता है, तो हमारे बाकी दुश्मन और कमजोर हो जाएंगे।

चौथी बात, इस शासन के खत्म हुए बिना पश्चिम एशिया में शांति की कल्पना करना नामुमकिन है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि ईरान तथाकथित विरोध की धुरी का मुख्य समर्थक रहा है, जिसमें हर वह आतंकवादी समूह शामिल है, जो इस्राइल को नक्शे से मिटाना चाहता था। बात यह भी है कि कोई भी इस्राइली सरकार कभी ऐसे फलस्तीनी देश के लिए राजी नहीं होगी, जो ईरान के कब्जे में आ सकता है। अगर तेहरान का शासन गिर जाता है और सऊदी अरब इस्राइल के साथ शांति का प्रस्ताव देता है, तो नेतन्याहू की सरकार को फलस्तीनी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करने में बहुत मुश्किल होगी।

पांचवीं बात, भले ही अमेरिका और इस्राइल ईरान को सरकार बदलने पर मजबूर न कर पाएं, वे रणनीतिक रूप से जरूरी लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। अमेरिका तब ज्यादा मजबूत होता है, जब अमेरिका-विरोधी तानाशाहों के पास हमारे गुस्से से डरने की पक्की वजहें होती हैं: इससे रोकथाम की ताकत वापस आती है और ऐसा करने से कूटनीति ज्यादा असरदार बनती है। जब ईरान कमजोर होता है, तो इस्राइल और अरब दुनिया ज्यादा सुरक्षित होती है: ध्यान दें कि, अब तक, लेबनान में हिजबुल्ला इस्राइल के खिलाफ जंग में शामिल नहीं हुआ है।

अगर ईरान की सरकार नहीं भी गिरती है, तो भी अपने बर्ताव को बदलने के लिए उस पर अंदर ही अंदर भारी दबाव होगा, ठीक वैसे ही जैसे वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज के समय हुआ है, जो उसके (उम्मीद है) अंतरिम राष्ट्रपति हैं। हो सकता है कि यह सबसे अच्छा परिणाम न हो, पर यह पहले की तुलना में काफी बेहतर है। आखिरकार अमेरिका और इस्राइल ने सही काम करने के लिए काफी सैन्य और राजनीतिक जोखिम उठाए हैं और यह कोई छोटी बात नहीं है।

उन्होंने दुनिया को एक तानाशाह से छुटकारा दिलाया है। यह अजीब है कि वही लोग जो ट्रंप को अमेरिका की विदेश नीति को उसके लोकतांत्रिक मूल्यों से अलग करने के लिए दोषी ठहराते हैं, अब लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए युद्ध में जाने के लिए उन्हें दोषी ठहराते हैं। फिर भी, दुनिया भर में लाखों आम लोग यह देखेंगे कि अपनी कई कमियों के बावजूद, अमेरिका अब भी आजादी के पक्ष में खड़ा है। निश्चित रूप से ट्रंप व नेतन्याहू ने आजाद दुनिया पर एक साहसी और ऐतिहासिक एहसान किया। - ©The New York Times 2026
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