Hello Bacchon Review: अलख पांडे की जर्नी को सादगी से दिखाती ईमानदार कहानी, असर छोड़ते हैं विनीत कुमार
Hello Bacchon Web Series Review: विनीत कुमार सिंह अभिनीत वेब सीरीज 'हैलो बच्चों' रिलीज हो गई है। यह कैसी है? अभिनय से लेकर कहानी तक...; यहां पढ़िए रिव्यू
विस्तार
'हैलो बच्चों' ऐसी वेब सीरीज है, जिसे देखकर सबसे पहले यही महसूस होता है कि यह किसी बनावटी ड्रामा की तरह नहीं बनाई गई है। इसमें न तो जबरदस्ती का इमोशनल ओवरलोड है और न ही तेज-तर्रार ट्विस्ट का दिखावा। कहानी बहुत सरल तरीके से एक 12वीं पास शिक्षक की जर्नी दिखाती है। उसके पास साधन भले कम हों, लेकिन वह यह ठान लेता है कि पढ़ाई हर उस बच्चे तक पहुंचे, जिसे सच में इसकी जरूरत है। यही ईमानदारी इस सीरीज को खास बनाती है। TVF ऑडियंस की पसंद को अच्छी तरह समझता है। डायलॉग से लेकर कास्टिंग तक, इस सीरीज के माहौल के साथ बिल्कुल फिट बैठता है। जहां कोटा फैक्ट्री छात्रों के इमोशनल बर्नआउट को दिखाती थी, वहीं ये सीरीज उस कहानी का दूसरा पहलू खोलती है- ऑनलाइन एजुकेशन की दुनिया को और ज्यादा विस्तार से सामने लाती है।
कहानी
सीरीज की शुरुआत बहुत साधारण तरीके से होती है। एक टीचर है जो कम फीस में पढ़ाना चाहता है, ताकि पैसों की वजह से कोई बच्चा पीछे न रह जाए। कोचिंग चलाते समय उसे ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें शिक्षा से ज्यादा फायदा दिखता है। लेकिन वह अपने फैसले पर टिका रहता है। वह मानता है कि पढ़ाई अच्छी होनी चाहिए और हर बच्चे के लिए आसान होनी चाहिए।
जब वह ऑनलाइन पढ़ाने की कोशिश करता है तो मुश्किलें और बढ़ती जाती हैं। कैमरा, रिकॉर्डिंग, एडिटिंग और पैसों की कमी। कई टीचर्स बीच में नौकरी छोड़ देते हैं। हर दिन एक नई परेशानी खड़ी रहती है। फिर भी वह हार नहीं मानता। धीरे-धीरे उसके वीडियो उन बच्चों तक पहुंचने लगते हैं जिनके पास कोई दूसरा सहारा नहीं था। यही हिस्सा सीरीज को गर्माहट देता है।
सीरीज में पांच छात्रों की अपनी-अपनी कहानियां भी चलती रहती हैं। कोई फीस नहीं भर पा रहा। कोई घर के बोझ में दबा है। कोई गलती से गलत संगत में पहुंच गया है। कोई दबाव में अपने सपनों से दूर होता जा रहा है। इन बच्चों की मुश्किलें बहुत असल लगती हैं। ऐसा महसूस होता है कि यह वही बच्चे हैं जो हर जगह देखने को मिलते हैं।
एक्टिंग
विनीत कुमार सिंह इस सीरीज का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। वह टीचर के किरदार में बेहद नेचुरल लगते हैं। उनका बोलने का तरीका, पढ़ाते समय का व्यवहार और चेहरे पर हल्की थकान सब कुछ बिल्कुल असली लगता है। उन्हें देखते समय ऐसा महसूस होता है कि कैमरा किसी असली शिक्षक की जिंदगी रिकॉर्ड कर रहा हो। छात्र बने कलाकार भी ईमानदारी से अभिनय करते हैं और उनकी इमोशंस साफ दिखाई देती हैं।
निर्देशन
प्रतिश मेहता का निर्देशन भी कहानी की तरह सरल है। लोकेशन छोटे कमरे और तंग गलियारे हैं। रोशनी भी बहुत हल्की रखी गई है ताकि माहौल असली लगे। ऑनलाइन पढ़ाई की परेशानियों को भी बिना किसी अतिरिक्त ड्रामा के दिखाया गया है। बैकग्राउंड म्यूजिक कम है ताकि सीन अपने आप असर छोड़ सकें।
देखे या नहीं?
कुछ कमियां भी हैं। कई जगह कहानी की चाल धीमी हो जाती है। कुछ एपिसोड लंबे लगते हैं। छात्रों की कहानी एक-दो जगह पहले से समझ आने लगती है। अलख पांडे की जर्नी, कंट्रोवर्सी.. पहले से ही काफी लोगों को पता है, इसलिए कुछ ऑडियंस को नया कम लगेगा। एक और बात जो हल्के से महसूस होती है... वह यह कि सीरीज कुछ हिस्सों में उनकी इमेज बिल्डिंग जैसी लगती है...जहां संघर्ष के साथ-साथ उन्हें बहुत सकारात्मक रूप में पेश किया गया है।
फिर भी 'हैलो बच्चों' एक ईमानदार और दिल को छूने वाली सीरीज है। यह कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और दिखावा नहीं करती। यदि आपको सादगी और असली भावनाओं वाली कहानियां पसंद हैं, तो यह सीरीज अंत तक आपका साथ नहीं छोड़ती।
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