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यह किसका युद्ध था: ट्रंप और इस्राइल कर गए हैं बड़ी भूल, खाड़ी देश खुद को ठगा महसूस कर रहे

Brett Stephens ब्रेट स्टीफेंस
Updated Fri, 10 Apr 2026 07:04 AM IST
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सार

जो देश या लोग ट्रंप-विरोध में उलझकर ईरान युद्ध को अमेरिका की रणनीतिक विफलता बता रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि इस युद्ध के नतीजे उनके हितों पर भी असर डालेंगे। लेव त्रोत्सकी का कहना गलत नहीं कि मुमकिन है, आपकी युद्ध में दिलचस्पी न हो, लेकिन युद्ध को आपमें दिलचस्पी हो सकती है।

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ईरान इस्राइल युद्ध - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह युद्ध जो भी सोचकर शुरू किया हो, लेकिन अमेरिका के नाटो सहयोगियों, अमेरिकी संसद के डेमोक्रेट्स सांसदों और अमेरिकी जनता के एक वर्ग ने जिस तरह से ट्रंप की रणनीति पर विरोध जताया, उससे यह जरूरत पैदा होती है कि इस युद्ध की वास्तविक प्रकृति को समझा जाए। राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस तरह से नाटो सहयोगियों को धमकाया, नीचा दिखाया और डराया, उससे यह समझा जा सकता है कि वह ईरान के साथ लड़ाई में अमेरिका व इस्राइल का साथ क्यों नहीं देना चाहते।
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डेमोक्रेट्स सांसदों की नाराजगी भी जायज है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने कभी उनसे सलाह-मशविरा करने की जरूरत नहीं समझी। लिहाजा, विपक्ष इस युद्ध को ट्रंप की रणनीतिक विफलता बताकर अपने लिए राजनीतिक फायदे की गुंजाइश ढूंढ़ रहा है। ट्रंप ने कहा था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले जून में ही पूरी तरह खत्म कर दिया गया था, तो आम अमेरिकी यह पूछेगा ही कि आखिर किसे खत्म करने के लिए ट्रंप ने इतनी मशक्कत कर डाली। ये सभी बातें बेशक तर्कसंगत हैं, लेकिन युद्ध के सबसे मुखर विरोधी भी यह नहीं समझ पा रहे कि इस युद्ध के नतीजों से उनके हित भी जुड़े हैं।
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जब राष्ट्रपति ट्रंप ने यह कहा कि वह होर्मुज को फिर से खोलने के लिए बल का प्रयोग किए बगैर ही युद्ध समाप्त करने को तैयार हो सकते हैं, तो उनकी इस बात का अर्थ क्या था? हो सकता है कि वह जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाने के मकसद से महज दिखावा कर रहे हों, या फिर बिना किसी ठोस योजना के ही काम कर रहे हों।

दोनों ही सूरतों में, जलडमरूमध्य पर दोबारा कब्जा करने से पहले ही युद्ध को खत्म कर देना कई वजहों से एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। तेहरान इसे अपनी जीत और अपनी स्थिति की पुष्टि के तौर पर देखेगा और वह ऐसा कर भी रहा है। इससे उसका बिखरा हुआ शासन और मजबूत होगा तथा आगे बातचीत में वह और भी ज्यादा अड़ियल हो जाएगा, न कि नरम। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी के अन्य देश इस समझौते से खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं, क्योंकि इस समझौते ने उन्हें ईरानियों के हमलों का शिकार होने के बाद भी उनके सामने कूटनीतिक रूप से घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।  

ट्रंप प्रशासन के लिए बेहतर रणनीति यह होती कि वह उन टैंकरों पर कब्जा कर लेता, जो ईरानी कच्चा तेल लेकर जलडमरूमध्य से बाहर निकल रहे थे, और फिर उस जब्त तेल को मित्र देशों के बंदरगाहों पर पहुंचा देता-ठीक वैसे ही, जैसा अमेरिका ने दिसंबर से वेनेजुएला के मामले में करना शुरू किया था। यह देखते हुए कि ईरान के राष्ट्रपति ने कथित तौर पर कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ढहने के कगार पर है, यह रणनीति कारगर हो सकती थी।
एक बात जो मुमकिन नहीं थी, वह यह कि कोई देश यह कहे कि वह इस युद्ध के नतीजों से बेपरवाह रह सकता है। जब जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस जैसा कोई व्यक्ति यह कहता है, ‘यह हमारा युद्ध नहीं है’, तो इसका सही जवाब यही होता है कि क्या वह सच में गंभीर हैं?

पिछले वर्ष जून में, पिस्टोरियस के नेता चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने यह माना था कि उस महीने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर इस्राइल का हमला ‘ऐसा घृणित काम था, जिसे इस्राइल हम सभी के लिए कर रहा है।’ क्या ईरान से पैदा होने वाले खतरे के बारे में उनकी सरकार की रणनीतिक सोच में, ट्रंप प्रशासन के प्रति उनके कड़े विरोध के अलावा, कोई और बदलाव आया है? जनवरी में, संयुक्त अरब अमीरात ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी कि वह ईरान पर हमले के लिए अपने हवाई क्षेत्र, अपने भू-भाग या अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा। यह घोषणा संयुक्त अरब अमीरात को ईरान की जवाबी कार्रवाई से सुरक्षित रखने का एक प्रयास ही था। लेकिन ईरान ने तब से अबू धाबी, दुबई और संयुक्त अरब अमीरात के कई अन्य सैन्य और नागरिक ठिकानों पर कम से कम 433 बैलिस्टिक मिसाइलों, 19 क्रूज मिसाइलों और 1,977 ड्रोनों से हमला किया।

स्पेन और इटली की सरकारों ने भी संयुक्त अरब अमीरात की रणनीति को अपनाते हुए अमेरिका को ईरान पर हमले करने के लिए अपने ठिकानों (और मैड्रिड के मामले में, अपने हवाई क्षेत्र) का इस्तेमाल करने से रोका। क्या उन सरकारों को लगता है कि अगर वे कभी तेहरान की मिसाइलों की जद में आ गईं, तो वे उसके कहर से बच जाएंगी?

क्या यूरोपीय देशों को यह समझ नहीं आ रहा कि अगर रूस हमला करता है, तो ट्रंप सरकार का नाटो की मदद करने की ज्यादा संभावना है? जबकि नाटो ने ईरान को कमजोर करने के अमेरिकी प्रयासों के प्रति इतना शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया है।

विशेष रूप से ट्रंप का विरोध करने वाले अमेरिकियों के लिए सवाल यह है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति उनकी नापसंदगी, ईरान से उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में रणनीतिक आकलन पर हावी हो जाना चाहिए। हाल ही में, द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक प्रमुख डेमोक्रेट और वकील डेविड बोइस ने यह बात कही कि यदि ट्रंप ने कोई कदम नहीं उठाया होता, तो ‘उनके उत्तराधिकारी के सामने अपने पूर्ववर्तियों द्वारा छोड़ी गई स्थिति से भी कहीं अधिक खतरनाक विकल्प बचता। आज से तीन या चार साल बाद, ईरान की जो मिसाइलें अभी उसके पड़ोसियों को निशाना बना रही हैं, वे बर्लिन या लंदन को, और शायद न्यूयॉर्क या वाशिंगटन को भी निशाना बना सकती हैं। इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए।’
अगर डेमोक्रेट्स सांसद अमेरिका के लिए जरूरी नीतियों का समर्थन नहीं कर पाते हैं, तो यह उनकी राजनीति के लिए भी भविष्य में कठिनाई बन सकती है।

लेव त्रोत्सकी ने सही ही कहा है कि हो सकता है कि आपको युद्ध में दिलचस्पी न हो, लेकिन युद्ध को आप में दिलचस्पी हो सकती है। अगर ऐसा है, और इतिहास भी यही बताता है, तो क्या अमेरिकियों को इसे जीतने में भी दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए थी?
 
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