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स्थायी शांति की उम्मीद: युद्धविराम पर सहमति स्वागतयोग्य, लेकिन राहत के लिए अभी असली परीक्षा बाकी

अमर उजाला Published by: Shubham Kumar Updated Thu, 09 Apr 2026 07:50 AM IST
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सार
पिछले करीब चालीस दिनों से जारी पश्चिम एशियाई संकट में नाटकीय मोड़ आया है। अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच दो हफ्ते के लिए यु्द्धविराम पर सहमति स्वागतयोग्य है। हालांकि, देखने वाली बात है कि यह शांति कितनी स्थायी होगी।
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US-Iran Ceasefire Agreement Hope for Lasting Peace News In Hindi
अमेरिका ईरान युद्धविराम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच पिछले करीब चालीस दिनों से चल रहे युद्ध में चार हजार से अधिक लोगों के मारे जाने और वैश्विक तेल व गैस के स्रोत खाड़ी क्षेत्र को अरबों डॉलर के नुकसान के बाद, दोनों पक्षों के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम पर जो सहमति बनी है, वह राहत देने वाली है। लेकिन, इसके कुछ ही घंटे बाद ईरान और कुवैत द्वारा एक-दूसरे को निशाना बनाने की जो खबरें मिली हैं, उससे यही महसूस होता है कि शांति की इस घोषणा की असल परीक्षा अभी होनी बाकी है।



यह आशंका इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे एक ही दिन पहले ट्रंप ने ईरान की सभ्यता के अंत की धमकी दी थी और फिर घटनाक्रमों का नाटकीय मोड़ युद्धविराम के रूप में सामने आया। फिर, हम पूर्व में इस्राइल व फलस्तीन के बीच भी कई असफल युद्धविराम देख चुके हैं। ऐसे में, तो यही लगता है कि अगर तीनों पक्ष आने वाले दिनों में खुद पर नियंत्रण रख पाते हैं, तभी प्रस्तावित इस्लामाबाद वार्ता सकारात्मक माहौल में शुरू हो सकती है और तभी यह स्पष्ट संकेत मिल सकेगा कि इन देशों में शांति की कोई वास्तविक इच्छा है भी या नहीं।


चीन और रूस का सामने आना कैसे अहम?
इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम कूटनीतिक मोड़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी देखने को मिला, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पेश किए गए प्रस्ताव को रूस व चीन ने वीटो कर दिया, जो वैश्विक शक्ति संतुलन की गहरी दरारों को ही उजागर करता है। एक ओर पश्चिमी देश हैं, जो होर्मुज को खुला रखने और ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में हैं, तो दूसरी ओर रूस व चीन हैं, जो खुलकर ईरान के समर्थन में खड़े हैं। अमेरिका व ईरान के बीच युद्धविराम के संदर्भ में यह विभाजन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

जाहिर है कि जब वैश्विक शक्तियां ही एकमत नहीं हैं, तो स्थायी शांति की राह सिर्फ सैन्य ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। इस्राइल पहले ही लेबनान को निशाना बनाना जारी रखने की बात कह चुका है। जाहिर है कि यह पश्चिम एशियाई संकट का पूर्ण अंत नहीं है, फिर भी एक अंतहीन प्रतीत हो रहे युद्ध का वार्ता की जमीन पर उतरना स्वागतयोग्य है। अब पूरी दुनिया का ध्यान निस्संदेह इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता पर केंद्रित है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या दोनों ही पक्ष अपने रुख में थोड़ी ढील देने को तैयार हैं।

इतिहास गवाह है कि कई बार पक्ष इस तरह के विराम का इस्तेमाल अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने के लिए करते हैं। ऐसे में, इस युद्धविराम को रणनीतिक विराम बनने से रोकना होगा। अगर संयम और ईमानदारी के साथ वार्ताएं ठोस दिशा में बढ़ती हैं, तभी यह विराम पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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