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सत्ता ही नहीं, साख की भी लड़ाई: केरल, असम और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव कल; बड़े नामों के लिए 'अग्नि परीक्षा'

शेखर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Pavan Updated Wed, 08 Apr 2026 08:40 AM IST
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सार
कल केरल, असम और पुदुचेरी में होने वाले चुनाव राजनीतिक दलों की तुलना में उनसे जुड़े बड़े नामों के लिए ‘अग्नि परीक्षा’ साबित हो सकते हैं। केरल में पिनाराई विजयन, असम में हिमंत बिस्वा सरमा और पुडुचेरी में एन रंगास्वामी की साख का सवाल तो है ही, चुनावी नतीजों के राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे होंगे।
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battle for credibility: Assembly elections in Kerala, Assam, Puducherry tomorrow; a litmus test for big names
सत्ता ही नहीं, साख की भी लड़ाई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केरल में 81 वर्षीय पिनाराई विजयन अगर तीसरी बार मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचते हैं, तो वह देश में मार्क्सवादी पार्टी की एकमात्र सरकार को बचा सकेंगे। हालांकि, उनके नेतृत्व में, सत्ताधारी वामपंथी दल पिछले साल के स्थानीय निकाय चुनावों में फीके प्रदर्शन के बाद अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए संघर्ष ही कर रहा है। केरल को कम्युनिस्टों का आखिरी गढ़ माना जाता है, क्योंकि 2018 में त्रिपुरा में सत्ता गंवाने और 2011 में अपने पुराने गढ़ पश्चिम बंगाल में पूरी तरह से हाशिये पर चले जाने (एक भी विधायक न होने) के बाद यही एकमात्र राज्य बचा है। दूसरी ओर, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है, जबकि भाजपा भी राज्य में तीसरी ताकत के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश में है।


विजयन की मुश्किलों के तार खुद उनकी पार्टी सीपीआई (एम) के भीतर ही देखे जा सकते हैं। कई मार्क्सवादी दिग्गज उनके काम करने के तरीके से नाखुश हैं और उन पर वामपंथ के ‘मूल सिद्धांतों’ को कमजोर करने व पिछले दस वर्षों में व्यापार और व्यवसायों के प्रति अधिक मित्रवत होने का आरोप लगाते हैं। उन पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर झुकाव का आरोप भी लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का उनकी सरकार द्वारा समर्थन किए जाने से वामपंथी दल को हिंदू मतदाताओं का नुकसान उठाना पड़ा है, जो राज्य की आबादी का लगभग 54.73 प्रतिशत हैं। अब, अपने पहले के रुख में बदलाव के चलते विजयन हिंदू समर्थक समूहों की बहुत अधिक आलोचना नहीं कर रहे हैं।


विजयन अपने चुनावी अभियान में साफ तौर पर ‘विकास’ (विकासनम) को ही सबसे बड़ा मुद्दा बता रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उनके नेतृत्व में केरल ने कई कठिन दौरों का मजबूती से सामना किया है-चाहे वह 2018 की विनाशकारी बाढ़ हो या कोविड महामारी का दौर। साथ ही, उन्होंने पूरे राज्य में बड़ा आर्थिक बदलाव लाया है और कई कल्याणकारी योजनाओं के जरिये गरीब तबके का भी ख्याल रखा है। वहीं, कांग्रेस ईसाइयों के बीच अपने मजबूत आधार पर दांव लगा रही है, जिनकी आबादी में हिस्सेदारी 18.38 प्रतिशत है। साथ ही, राहुल गांधी के जोरदार चुनावी प्रचार के चलते कांग्रेस को उम्मीद है कि मुस्लिम मतदाता, जो करीब 26.56 प्रतिशत हैं, इस बार वामपंथियों से दूरी बनाकर यूडीएफ के साथ आएंगे, क्योंकि यूडीएफ में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) एक अहम साझीदार है। दूसरी ओर, भाजपा के लिए सबसे अनुकूल स्थिति यह होगी कि राज्य के हिंदू मतदाता एकजुट होकर उसके पक्ष में वोट करें। अगर ऐसा होता है, तो भाजपा इतनी सीटें हासिल कर सकती है कि वह सत्ताधारी एलडीएफ और पिनाराई विजयन के सामने मजबूती से उभर सके। हालांकि, इसकी संभावना कम ही है, फिर भी, भाजपा केरल में ईसाई समुदाय के साथ सक्रिय रूप से नेटवर्क बना रही है। उसने बीडीजेएस, ट्वेंटी-20 पार्टी, केरल कांग्रेस (डेमोक्रेटिक), केरल कामराज कांग्रेस और लोक जनशक्ति पार्टी जैसी कई छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन पक्का कर लिया है।

असम में, हिमंत बिस्वा सरमा को पूरा भरोसा है कि वह भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाएंगे और खुद दूसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्होंने कांग्रेस के संगठनात्मक आधार को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। कांग्रेस का संगठन राहुल गांधी की उस पसंद के कारण लड़खड़ा गया है, जिसमें उन्होंने एकमात्र गौरव गोगोई को ही असम में पार्टी की किस्मत का फैसला करने वाला बना दिया था। असम में अवैध प्रवासन ने वहां की मूल गैर-मुस्लिम आबादी के मन में गहरी चिंताएं पैदा कर दी हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर, हिमंत ने जमीनी स्तर पर कई मोर्चों पर विकास करके अपना काम बखूबी निभाया है। इनमें कमजोर वर्गों, खासकर महिलाओं को नकद आर्थिक सहायता देना भी शामिल है। कांग्रेस पिछले एक दशक से विपक्ष में है, जबकि भाजपा लगातार दो बार सत्ता का सुख भोग चुकी है। चुनावी चर्चा एक बार फिर जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध घुसपैठिये जैसे वैचारिक मुद्दों पर केंद्रित हो गई है और कांग्रेस असम के बहुसंख्यक लोगों की चिंताओं को समझने में नाकाम रही है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 93 सीटों पर चुनाव लड़कर 60 सीटों पर जीत हासिल की थी और सरकार बनाई थी। यही नहीं, 2014 के बाद से भाजपा ने असम में कोई भी बड़ा चुनाव नहीं हारा है। ऐसे में, मौजूदा माहौल को देखते हुए पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की मजबूत दावेदार नजर आ रही है। खास बात यह है कि कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के पिता तरुण गोगोई वही नेता थे, जिन्होंने कभी राज्य में कांग्रेस को दोबारा मजबूती से खड़ा किया था। 2001 से 2016 तक मुख्यमंत्री रहते हुए वह असम के इतिहास में सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले नेता बने। उनके ही एक करीबी हिमंत अब भाजपा का चेहरा हैं और उन्होंने गौरव के लिए चुनौती को इतना मुश्किल बना दिया है कि गौरव असम के बहुसंख्यक लोगों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे हैं।

केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी में सारा दारोमदार 75 साल के नटेसन कृष्णसामी गौंडर रंगास्वामी पर है, जिन्हें आम तौर पर ‘एनआर’ के नाम से जाना जाता है। वह मई 2021 से मुख्यमंत्री के पद पर हैं। इससे पहले वे 2001 से 2008 तक और 2011 से 2016 तक भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। रंगास्वामी अपनी खुद की पार्टी, ‘ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस’ (एआईएनआरसी) के संस्थापक अध्यक्ष हैं। इस पार्टी का गठन 2011 में कांग्रेस से अलग होने के बाद किया गया था। वह ‘नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस’ (एनडीए) का नेतृत्व कर चुके हैं, जिसमें भाजपा एक अहम सदस्य है। उनके विरोधी कांग्रेस (उनकी पुरानी पार्टी) और द्रमुक ने मिलकर चुनाव के लिए एक गठबंधन बनाया था। लेकिन, विपक्ष के इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, इस बात पर दोनों पार्टियों के बीच की आपसी खींचतान की वजह से यह गठबंधन अब टूटा हुआ-सा नजर आ रहा है। नौ अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए राहुल गांधी और द्रमुक प्रमुख एमके स्टालिन ने अलग-अलग प्रचार किया।

इस केंद्रशासित प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वी नारायणसामी, जिन्हें उनकी अपनी ही पार्टी ने किनारे कर दिया है, ने कहा है कि कांग्रेस में उनके अपने ही साथियों ने केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में आकर इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के साथ रिश्तों में तनाव होने के बावजूद, रंगास्वामी मतदाताओं के साथ अपने सीधे जुड़ाव की वजह से इस मुकाबले में बढ़त बनाए हुए हैं। - edit@amarujala.com
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