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मुद्दा: जंग, जलजला और जलवायु; भारत ने संतुलित रणनीति अपनाकर पेश की मिसाल
डॉ. सीमा जावेद
Published by: Pavan
Updated Wed, 08 Apr 2026 08:49 AM IST
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विस्तार
एक तरफ, दुनिया तेल और गैस की आपूर्ति शृंखलाओं के टूटने, बढ़ती कीमतों और गहरी अनिश्चितता से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर, भारत ने जलवायु परिवर्तन के प्रति एक साहसिक व सुनियोजित प्रतिबद्धता दिखा कर दुनिया को हैरान कर दिया है। भारत एक ऐसा देश है, जहां अगले दशक में बिजली की मांग लगभग दोगुनी होने वाली है, जहां इलेक्ट्रिक वाहन, डाटा सेंटर और आर्थिक विकास ऊर्जा के नियमों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। उसने ऊर्जा असुरक्षा और कल की जलवायु महत्वाकांक्षा के बीच, विकास और जिम्मेदारी, आकांक्षा और संयम के बीच एक संतुलन की कहानी लिख कर दुनिया के सामने एक बार फिर एक मिसाल पेश की है। ऐसे में, असली सवाल यह नहीं है कि भारत विकास करेगा या नहीं। सवाल यह है कि वह उस विकास को गति देने के लिए कौन सा तरीका चुनेगा?पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से न केवल ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है, बल्कि पर्यावरण पर भी इसका प्रभाव सामने आने लगा है। युद्ध की शुरुआत से अब तक 50 लाख टन ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन हो चुका है, जो 84 देशों के कुल उत्सर्जन से भी अधिक है। देश और दुनिया जलवायु और ऊर्जा से जुड़ी दोहरी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे माहौल में, भारत ने 2031 से 2035 तक की अवधि के लिए अपने राष्ट्रीय स्तर पर उत्सर्जन में कटौती के निर्धारित योगदान (एनडीसी) को मंजूरी देकर नए जलवायु लक्ष्य तय किए हैं। ये लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बढ़े अहम कदम माने जा रहे हैं। इसके तहत उत्सर्जन तीव्रता में 47 फीसदी की कमी और बिजली क्षमता का 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।
गौरतलब है कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने हाल ही में 2026 से 2036 तक के लिए एक नया नेशनल जनरेशन एडिक्वेसी प्लान जारी किया है। इसके अनुसार, भारत में बिजली की मांग आने वाले 10 वर्षों में लगभग दोगुनी हो सकती है। इस बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों का तेजी से बढ़ना, डाटा सेंटरों की संख्या में इजाफा, और देश की अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास करना। इन सभी कारणों से बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में, जब देश को इतनी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होगी, तब भी भारत ने 2035 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए जो लक्ष्य तय किए हैं, वे सच में चौंकाने वाले हैं। इसका मतलब यह है कि भारत एक साथ विकास भी करना चाहता है और पर्यावरण की जिम्मेदारी भी निभाना चाहता है।
अब सोलर बिजली की धड़कन बनेगा और 2035 की बिजली ज्यादातर ‘ग्रीन’ होगी। 2035-36 तक भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 1,121 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इसमें से करीब 70 प्रतिशत, यानी 786 गीगावाट, गैर-जीवाश्म स्रोतों से आएगा। 2035 तक सोलर अकेले 45 प्रतिशत स्थापित क्षमता का हिस्सा बन सकता है। कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में भारत दुनिया में चौथे पायदान पर है। भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 220 गीगावाट से अधिक हो गई है। बहुत कम देश इतने बड़े पैमाने और इतनी तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ बढ़ पाए हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक और चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश भी बन गया है। ऐसे में, 2035 तक 60 फीसदी गैर-जीवाश्म ईंधन से उत्पादित ऊर्जा का लक्ष्य यह दिखाता है कि भारत अपनी घरेलू वास्तविकताओं को भी समझ रहा है।
मेरकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2035-36 तक 900 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता को ग्रिड से जोड़ना प्रस्तावित है। इसके लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार किया जाएगा। करीब 1,37,500 सर्किट किलोमीटर नई लाइनें बिछाई जाएंगी। साथ ही, सबस्टेशन क्षमता भी बढ़ाई जाएगी।
पीएम-कुसुम योजना, पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना, और हरित ऊर्जा ओपन एक्सेस जैसी पहलें पहले से ही यह दिखा रही हैं कि भारत गैर-जीवाश्म ईंधन (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) से बनने वाली बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हरित ऊर्जा ओपन एक्सेस के तहत, बड़े उपभोक्ता, जिनकी बिजली खपत एक किलोवाट से ज्यादा है, अब सीधे बिजली उत्पादकों से साफ और हरित ऊर्जा खरीद सकते हैं। यह भारत की जलवायु से जुड़ी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। सिर्फ इतना ही नहीं, भारतीय रेलवे, जिसमें हर दिन करीब 2.6 करोड़ लोग यात्रा करते हैं, अब 100 प्रतिशत विद्युतीकरण के करीब है। उसके पास 898 मेगावाट सौर ऊर्जा है ओर लगभग 70 प्रतिशत बिजली सीधे ट्रेनों को चलाने में मदद करती है।