सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Tamil nadu assembly election 2026 thalapathi vijay could be game changer

क्या गेम चेंजर बनेंगे थलापति: विजय की लोकप्रियता के चलते उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल

mahendar babu kuruwa महेंद्र बाबू कुरुवा
Updated Thu, 09 Apr 2026 07:47 AM IST
विज्ञापन
सार
विजय की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, पर अगर वह सत्ता-विरोधी वोटों को बांट देते हैं, तो फायदा द्रमुक को ही होगा।
loader
Tamil nadu assembly election 2026 thalapathi vijay could be game changer
विजय, अध्यक्ष, टीवीके - फोटो : ANI

विस्तार

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में 234 सीटों के लिए ‘चतुष्कोणीय’ मुकाबला देखने को मिलेगा। सत्ताधारी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) अपने ‘धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन’, जिसमें कांग्रेस समेत 23 पार्टियां शामिल हैं, के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक राजग के तहत भाजपा के साथ सत्ता-विरोधी रुझान का लाभ उठाकर बदलाव के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। इसके साथ ही, सीमन के नेतृत्व वाली नाम तमिलर काची (एनटीके) भी कड़ी टक्कर दे रही है, पर सबकी नजरें चौथे खिलाड़ी अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर पर टिकी हैं, जिन्हें ‘थलापति’ विजय कहा जाता है।


विजय ने अपनी पार्टी टीवीके के साथ तमिल राजनीति में अचानक प्रवेश किया है। व्यापक लोकप्रियता के कारण उन्हें संभावित ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है, खासकर ऐसे राज्य में, जहां करीब छह दशकों से द्रविड़ दलों ने शासन किया है और राष्ट्रीय दलों को मौका नहीं दिया। फिलहाल, विजय की टीवीके अकेले सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। विजय खुद को मौजूदा द्रविड़ पार्टियों के विकल्प के रूप में पेश करते हैं, पर लगता है, वह भी द्रविड़ राजनीति के मूल सिद्धांतों से जुड़े हुए हैं।


विजय राज्य की राजनीति पर कितना असर डाल पाएंगे, यह जानने के लिए उस ‘द्रविड़’ राजनीति के मॉडल को समझना जरूरी है, जो करीब 100 वर्षों से तमिल राजनीतिक विमर्श का अभिन्न अंग रहा है। द्रविड़ राजनीति की शुरुआत ईवी रामास्वामी नायकर से हुई थी, जिन्हें ‘पेरियार’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने हाशिये पर पड़े समुदायों और महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई, धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ी और मजबूत तमिल सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा दिया। 1943 में पेरियार ने जिस द्रविड़ पार्टी की स्थापना की, वह बाद में दो पार्टियों-द्रमुक और अन्नाद्रमुक में बंट गई। तर्कवाद और आत्म-सम्मान के दर्शन पर बनी इन पार्टियों का नेतृत्व भी फिल्मी हस्तियों ने ही किया, जिन्हें मतदाताओं ने भी स्वीकार किया। यह तमिल राजनीति का ऐसा अनोखा विरोधाभास है, जो तर्क-वितर्क से परे है। इसी विरोधाभास ने विजय को राजनीति में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। विजय की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह उस खाई को भरने में कहां तक कामयाब होते हैं, जो दोनों द्रविड़ दलों ने पिछले साठ वर्षों में बनाई है, और जनता उसे किस नजरिये से देखती है।

तमिलनाडु में शासन करने वाली दोनों पार्टियों ने जिस बात को नजरअंदाज किया, वह है समावेशिता और सामाजिक न्याय का मुद्दा-जो 1940 के दशक में द्रविड़ आंदोलन के केंद्र में था। दोनों पार्टियों के शासनकाल में पिछड़े वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा है, पर कई ऐसी प्रभावशाली जातियां हैं, जिन्हें ओबीसी की श्रेणी में रखा गया, और चुनावी नतीजों पर आज भी उनकी मजबूत पकड़ बनी हुई है। महिलाएं और दलित इसका खामियाजा भुगत रहे हैं। गृह मंत्रालय द्वारा 2022 में जारी आंकड़ों में तमिलनाडु के 38 में से 37 जिलों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों पर अत्याचार के मामले में ‘संवेदनशील’ घोषित किया गया।

दूसरा पहलू, जिससे लोगों का मोहभंग हुआ, वह है इन पार्टियों के राजनीति करने का तरीका। द्रमुक और अन्नाद्रमुक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, पर उनके राजनीति करने का तरीका और बयानबाजी एक जैसी है। दोनों ही पार्टियां राज्य की समस्याओं के लिए हिंदी या केंद्र सरकार को दोषी ठहराती हैं। फिर भी, राष्ट्रीय पार्टियों ने द्रविड़ पार्टियों द्वारा पैदा शून्य को भरने और उनके शासन से उपजे असंतोष का राजनीतिक लाभ उठाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने ही क्रमशः द्रमुक या अन्नाद्रमुक के कनिष्ठ साझेदार तक खुद को सीमित रखा। भाजपा ने इस घेरे को तोड़ने की बहुत कोशिश की, पर उसे सीमित सफलता ही मिली, क्योंकि उसे अपना नेतृत्व उन्हीं लोगों में से चुनना पड़ा, जो द्रविड़ दलों की छत्रछाया में पले-बढ़े थे। तमिलनाडु अकेला ऐसा राज्य है, जहां अनुकूल धार्मिक जनसांख्यिकी के बावजूद भाजपा सीमांत खिलाड़ी बनी हुई है।

विजय एक नए चेहरे के रूप में सामने आए, जो द्रविड़ दलों के घिसे-पिटे राजनीतिक ढांचे से मुक्त हैं। हालांकि, उनके पास वह संस्थागत ढांचा नहीं है, जो द्रविड़ पार्टियों के पास है। फिर भी, विजय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर उस राज्य में, जहां 51 फीसदी मतदाता महिलाएं हैं। अगर वह प्रशंसकों, अल्पसंख्यकों तथा युवाओं का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो द्रमुक को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पर अगर सत्ता-विरोधी वोटों को बांट देते हैं, तो फायदा द्रमुक को ही होगा, जिसके खिलाफ वह लड़ रहे हैं। भाजपा के लिए भी विजय का प्रदर्शन निर्णायक होगा, क्योंकि टीवीके का प्रदर्शन ही उस द्रविड़ राजनीति की दिशा तय करेगा, जिसने भाजपा को लंबे समय से हाशिये पर रखा है।  
विज्ञापन
विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed