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Uttarakhand: हॉस्टल में छात्र से दुष्कर्म के दोषी कर्मचारी की सजा बढ़ी, दो की बजाय सात साल की कैद काटनी होगी

माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Fri, 16 Jan 2026 12:22 PM IST
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सार

अदालत ने हॉस्टल में छात्र से दुष्कर्म के दोषी कर्मचारी की सजा बढ़ा दी है। दोषी कर्मचारी को अब दो की बजाय सात साल की कैद काटनी होगी।

Employee convicted of Misdeed a student in a hostel sentence increased serve seven years in prison Uttarakhand
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार
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शहर के एक बोर्डिंग स्कूल में 13 वर्षीय छात्र के साथ दुष्कर्म के मामले में अदालत ने बुधवार को आरोपी शक्ति सिंह की सजा को दो साल से बढ़ाकर सात साल कठोर कारावास कर दिया। साथ ही उस पर लगाए गए जुर्माने को भी 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये किया है। जुर्माना न भरने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।

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मामला नवंबर 2011 का है। दिल्ली निवासी एक अभिभावक ने शहर कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, उनका 13 वर्षीय बेटा एक निजी बोर्डिंग स्कूल में कक्षा सात का छात्र था। दीपावली की छुट्टियों के बाद जब छात्र स्कूल लौटा तो कर्मचारी शक्ति सिंह ने उसके साथ दुष्कर्म किया। किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी। डर के मारे छात्र स्कूल से भागकर अपने पिता के परिचित के पास पहुंचा और पूरी घटना की जानकारी दी।

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इस तरह मामला अभिभावकों की जानकारी में आया और पुलिस से शिकायत की गई। इस मामले में 11 सितंबर 2023 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम ने शक्ति सिंह को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई थी।

दोनों पक्षों ने दायर की थी अपील

सजा पर फैसले के खिलाफ सत्र न्यायालय में दो अपील दायर की गईं। पहली अपील दोषी शक्ति सिंह की ओर से सजा रद्द करने के लिए दाखिल हुई, जबकि दूसरी अपील शिकायती पक्ष की ओर से सजा को आजीवन कारावास में बदलने की मांग के साथ दायर की गई।

ऐसे अपराधों को रोकने के लिए ही पॉक्सो एक्ट

अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता अरविंद कपील ने दलील दी कि बच्चों के साथ बढ़ते यौन अपराधों को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2012 में बालकों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) बनाया, जिसमें इस तरह के अपराध में सजा की अवधि 20 साल से कम न होने का प्रावधान किया गया। उस नजरिये से देखा जाए तो पूर्व फैसले में अदालत ने इस बिंदु पर विचार नहीं किया कि अपराध का पीड़ित किशोर के मनोभाव पर क्या असर रहा होगा। उस दौरान पीड़ित स्कूल के बाथरूम में नहाने जाने से भी डरता था और अत्यधिक सदमे में रहा था। उस लिहाज से दोषी की अपील खारिज करके पीड़ित की अपील पर अधिकतम सजा दी जाए।

 

29 जनवरी को दोषी को आत्मसमर्पण करने का आदेश

प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश महेश चन्द्र कौशिवा ने अभियोजन की दलीलों और मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि घटना के समय पीड़ित मात्र 13 साल का बच्चा था और अभियुक्त स्कूल छात्रावास का स्टाफ था। बच्चों की सुरक्षा करना उसकी जिम्मेदारी थी। अदालत ने माना कि निचली अदालत की सजा अपराध की प्रकृति के अनुसार बहुत कम थी। अदालत ने अभियुक्त को 29 जनवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है ताकि उसे सजा भुगतने के लिए जेल भेजा जा सके।

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