एक्सक्लूसिव: अब माणा में भी आभा बिखेरना लगा नील कमल, समय से पहले ही खिल गए कई फूल
- अपने प्राकृतिक क्षेत्र से एक हजार मीटर नीचे फूल खिलने से इसके संरक्षण की जगी उम्मीद
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समुद्रतल से 45 सौ मीटर से भी अधिक ऊंचाई पर खिलने वाला नील कमल अब इससे कहीं कम ऊंचाई पर भी आभा बिखेर रहा है। बदरीनाथ धाम से कुछ दूरी पर स्थित सीमांत माणा के संरक्षण केंद्र में वन अनुसंधान केंद्र ने नीलकमल को उगाने और पुष्पित करने में सफलता पाई है। इस केंद्र में फूलों की अति दुर्लभ प्रजातियां राज्य पुष्प ब्रह्म कमल, फैन कमल भी संरक्षित की गईं हैं।
ग्लोबल वार्मिंग, वनों के अवैध कटान और खनन के चलते वनस्पतियों की कई प्रजातियां विलुप्त होती जा रहीं हैं। वन अनुसंधान केंद्र ऐसी प्रजातियों को संरक्षित करने की दिशा में काम कर रहा है। वन अनुसंधान केंद्र ने समुद्रतल से करीब 33 सौ मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित माणा में वन पंचायत की करीब एक एकड़ भूमि पर संरक्षण केंद्र बनाया है।
इस केंद्र में ब्रह्मकमल, फैन कमल और 4500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाए जाने वाले नील कमल को संरक्षित कर लिया गया है। इन तीनों फूलों का औषधीय महत्व भी है। तिब्बत क्षेत्र में इनका औषधि के रूप में प्रयोग होता है।
फूल बैंक में इस फूल को लगाने में सफलता मिली
राज्य पुष्प ब्रह्मकमल व फैन कमल 39 सौ से लेकर 42 सौ मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। नील कमल इनसे भी अधिक ऊंचाई पर मिलता है। नील कमल के फूल को खिलने के लिए बर्फबारी, प्राकृतिक जल स्रोत व चट्टानी जमीन की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके प्राकृतिक स्थल से करीब एक हजार मीटर नीचे लाकर संरक्षण केंद्र के फूल बैंक में इस फूल को लगाने में सफलता मिली है।
वन अनुसंधान केंद्र ने पहले इसे बीज पद्धति से उगाने का प्रयास किया लेकिन यह फूल नहीं उग सका। बाद में इस राइजोम पद्धति (जड़, तना) के माध्यम से लगा लिया गया।
नील कमल फूल 45 से लेकर 48 सौ मीटर तक की ऊंचाई में होते हैं। चूकिं हम इन्हें नीचे लेकर आए हैं तो उनके आकार में थोड़ा बदलाव आया है। सामान्यत: यह फूल जुलाई-अगस्त में खिलते हैं, लेकिन केंद्र में यह फूल मई-जून में खिल गए हैं। यह वन अनुसंधान केंद्र के प्रयासों का सकारात्मक परिणाम है।
-संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक, वन अनुसंधान केंद्र, हल्द्वानी।