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Interview: राष्ट्रीय फलक पर गूंजी ढोली की थाप; फिल्म की सफलता से बदलेगी पहाड़ की सोच, युवाओं के लिए है सौगात

Fri, 24 Jul 2026 12:05 PM IST
Alka Tyagi विजयलक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
विजयलक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: Alka Tyagi Updated Fri, 24 Jul 2026 12:05 PM IST
सार

श्रीनगर के खोला गांव के रहने वाले मोहित ने फिल्म में ढोल वादक की भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि फिल्म की शूटिंग में जिस तरह से पूरी टीम रात-दिन कड़ी मेहनत में जुटी थी तभी लग रहा था कि फिल्म राष्ट्रीय फलक पर चमक बिखेरेगी।

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First Time Garhwali Movie Dholi Got national Film award gift for youths Of Uttarakhand
गढ़वाली फिल्म ढोली - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

गढ़वाली सिनेमा ने करीब 43 वर्ष बाद ढोली फिल्म के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर अपना नाम दर्ज करा दिया है। फिल्म को मिले राष्ट्रीय पुरस्कार ने पहाड़ की सोच बदलने की उम्मीद जगा दी है। फिल्म के हीरो मोहित घिल्डियाल का कहना है कि जिस समाज में आज भी अधिकांश अभिभावक बच्चों को नौकरी की सुरक्षित राह चुनने की सलाह देते हैं वहां अब फिल्म जगत में कॅरिअर की संभावनाओं पर भी चर्चा शुरू हो गई है। यह बदलाव युवाओं के लिए नए अवसरों के साथ गढ़वाली बोली-भाषा और सांस्कृतिक विरासत को भी नई ऊर्जा देगा।

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श्रीनगर के खोला गांव के रहने वाले मोहित ने फिल्म में ढोल वादक की भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि फिल्म की शूटिंग में जिस तरह से पूरी टीम रात-दिन कड़ी मेहनत में जुटी थी तभी लग रहा था कि फिल्म राष्ट्रीय फलक पर चमक बिखेरेगी। इंजीनियर मोहित बताते हैं कि उन्हें अभिनय का शौक बचपन से ही था लेकिन इसमें कॅरिअर बनाने का जब भी विचार किया और परिजनों के सामने मन की बात रखी तो उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया। जिससे इंजीनियरिंग की नौकरी के साथ-साथ शौक को जिंदा रखते हुए हिंदी सीरियल, फिल्मों में छोटे-छोटे रोल किए जिनकी बहुत तारीफ हुई। तब लगा अब अभिनय के क्षेत्र में ही काम करना है।
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फिल्म कांतारा देखकर जगी ढोली की आस

मोहित ने बताया कि जब दक्षिण भारत की फिल्म कांतारा देखी तो लगा इस तरह की संस्कृति तो पूरे पहाड़ में हैं। हमारे पहाड़ की संस्कृति बड़े पर्दे पर अपनी अलग पहचान क्यों नहीं बना सकती। बस यही सोचकर गढ़वाली बोली-भाषा और संस्कृति के लिए कुछ करने का मन बनाया और जुट गए। ढोली फिल्म के बारे में उन्होंने बताया कि फिल्म के लिए उन्होंने ढोल विधा के विशेषज्ञ प्रेमलाल हिंदवाण से प्रशिक्षण लिया। महीनों की कड़ी मेहनत के बाद ही इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं।

मोहित बताते हैं कि गढ़वाली-जौनसारी बोली-भाषा में फिल्में तो बन रही है लेकिन पहाड़ों में थियेटर नहीं होने के कारण ये दूरस्थ गांव के दर्शक तक नहीं पहुंच पाती है। सरकार की ओर से क्षेत्रीय फिल्मों को आगे बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। उसी का नतीजा है कि जहां पहले एक फिल्म को पूरा होने में वर्षों लग जाते थे वो आज कुछ महीनों में ही रिलीज हो जाती है। इससे निश्चित रूप से पहाड़ के युवाओं को रोजगार मिलने के साथ ही हमारी गढ़वाली, कुमाउंनी और जौनसारी बोली-भाषा को भी एक नई पहचान मिलेगी।

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