'बेवजह तमाशा बना रहे हैं शंकराचार्य'

कौशल सिखौला/ अमर उजाला, हरिद्वार Updated Thu, 03 Jul 2014 05:25 PM IST
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत ज्ञानदास ने पहली बार शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया की। उन्होंने कहा कि स्वरूपानंद बेवजह साईं पूजा को लेकर तमाशा खड़ा कर रहे हैं।
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बुधवार को अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत ज्ञानदास ने अयोध्या से दूरभाष पर बताया कि साईं बाबा के बारे में शंकराचार्य बकवास कर रहे हैं।

कहा कि अखाड़ा परिषद का कोई साधु उनके साथ नहीं हैं। संन्यासी, बैरागी, उदासी और निर्मल अखाड़े के संत भी इस प्रश्न से अलग हैं।

हिंदू धर्म कोई बंधा हुआ धर्म नहीं हैं। सबको अपने अराध्यों की पूजा करने और मंदिर बनाने की छूट है। अखाड़ा परिषद न शंकराचार्य के साथ है और न उसे साईं पूजा से कोई परहेज है।

नागाओं के साथ आने की बात झूठी: हरि गिरी

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उधर श्रीमहंत हरि गिरी ने भी इस बात से इंकार किया है कि जूना अखाड़े के नागा संन्यासी शंकराचार्य के साथ खड़े हो गए हैं।

नासिक में बैठे जूना अखाड़े के राष्ट्रीय संरक्षक और अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरी ने उन खबरों से इंकार किया जिनमें कहा गया है कि जूना अखाड़े के नागाओं ने साईं मंदिरों के खिलाफ शंकराचार्य को समर्थन दिया है।

हरि गिरी ने कहा कि जूना अखाड़ा संवैधानिक संस्था है। इसकी कार्यकारिणी में 52 सदस्य हैं। बिना बैठक हुए कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता।

जूना अखाड़े का कोई भी बयान तब सही माना जाएगा जब अखाड़े के राष्ट्रीय प्रवक्ता स्वामी विद्यानंद सरस्वती की ओर से आया हो।

नासिक में कुछ समय बाद जूना अखाड़े की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठेगी। यदि यह प्रश्न बैठक में आया तो उस पर विचार किया जाएगा।

ज्योर्तिपीठ का शंकराचार्य नहीं मानते अखाड़े

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जूना अखाड़ा सहित संन्यासियों के अखाड़े स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को द्वारिका के शंकराचार्य तो मानते हैं, लेकिन ज्योर्तिपीठ का शंकराचार्य नहीं मानते।

जूना अखाड़े ने स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्य की मान्यता दी है। यही वजह थी कि विगत प्रयाग कुंभ में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को स्नान नहीं करने दिया।

अखाड़ा परिषद ने फिर शंकराचार्य के बयान से खुद को अलग कर संकेत दिया है कि अखाड़ों का समर्थन उन्हें मिलने वाला नहीं है।

पीपल, तुलसी की पूजा तो साईं की क्यों नहीं

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साईं पूजा पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बयानों से सनातन धर्म में खिंची ताजा लकीर में कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम बुधवार को साईं भक्तों के साथ खड़े हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि शंकराचार्य में उनकी अपार श्रद्धा है पर वह साईं पूजा को लेकर शंकराचार्य के मत से सहमत नहीं हैं। साईं की पूजा सनातन धर्म से अलग नहीं है। वह सवाल उठाते हैं कि किसी को साईं में भगवान दिखते हैं तो इसमें क्या पाप है?

पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति भावना, श्रद्धा, प्रेम, आस्था, वैराग्य का विषय है जबकि धर्म ज्ञान, तर्क इत्यादि का। सनातन धर्म में पीपल, नदी, पत्थर, गुरु, तुलसी और सांप की पूजा होती है तो साईं की पूजा क्यों नहीं हो सकती? यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है जिसे संवेदनशीलता से लिया जाना चाहिए।

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि हरिद्वार के डीएम ने साईं भक्तों के हरकी पौड़ी पर गंगा स्नान में अनुमति नहीं दी है। यह संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उन्होंने साईं भक्तों को हर की पैड़ी पर स्नान करने की अनुमति दिए जाने की मांग की है।

‘प्रतिशोध पर न उतरें साईं भक्त’

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भूमा पीठाधीश्वर आचार्य स्वामी अच्युतानंद तीर्थ ने कहा कि साईं भक्तों को प्रतिशोध रूप में कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जो देश की परंपरा के विरुद्ध हो। सच्चा साईं भक्त दूसरे का अपमान कभी नहीं करता।

एक वक्तव्य में उन्होंने कहा कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मान्यता से देशवासी सहमत हैं जिन्हें स्वरूपानंद की बात बुरी लगी हो वे शांतिपूर्वक विरोध व्यक्त कर सकते हैं। साईं भक्तों को पूतले फूंकना शोभा नहीं देता।
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