पहाड़ और पीड़ा: देखभाल की उम्र में 'खाली' आशियानों की पहरेदारी कर रहीं ये बूढ़ी आंखें
- कर्णप्रयाग के 250-300 परिवारों वाले गांव रतूड़ा में आज सिर्फ 90 लोग
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देखभाल की उम्र में खुद पहरेदार बने हैं। जवानी घरों पर ताले डालकर चली गई, गांव बूढ़ों के हवाले रह गया। 250-300 परिवारों में से सिर्फ90 लोग रह गए। सभी बुजुर्ग हैं। ये वे लोग हैं जो मैदानी इलाकों की प्रदूषित हवा-पानी में सांस नहीं ले पाते, इसलिए बच्चों के बिना अपने गांव में पड़े हैं। कर्णप्रयाग के रतूड़ा गांव की भयावह स्थिति है। बुजुर्ग बीमार हो जाएं तो राम ही उन्हें बचाए। कोई इमरजेंसी आ जाए तो डंडी के सहारे ले जाना पड़ता है।
वहां गाड़ी का इंतजार करना पड़ता है। घरों में अकेले रह रहीं बुजुर्ग महिलाएं खुद घास लाने को मजबूर हैं। कुछ दिन पहले एक वृद्धा घास लेने गई। वहीं पोखर में गिर गईं। कंधे पर बोझा था। कई घंटे बाद उन पर किसी की नजर पड़ी। तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। रतूड़ा और इस जैसे गांवों में रह रहे बुजुर्गों की यही पुकार है, जो बचे हैं, उन्हें तो बचा लो।
सभी मूलभूत सुविधाओं से कटा हुआ गांव है रतूड़ा। कर्णप्रयाग से करीब 18 किमी दूर इस गांव में पानी भी इसी साल आया है। सिलेंडर भी रोड हेड तक ही आता है। वहां से बुजुर्ग नेपाली लोगों को पैसे देकर सिलेंडर घर पर मंगाते हैं। राशन या अन्य चीजों के लिए भी वे उन्हीं पर आश्रित हैं। बीमारी-तकलीफ में भी उन्हें इलाज नहीं मिल पाता। बिस्तर में पड़े-पड़े कुछ चमत्कार होने की उम्मीद करते हैं। आधे से ज्यादा लोग बीमार हैं।
यहां बस हवा-पानी है और कोई सुविधा नहीं
गांव में जंगली जानवर उत्पात मचाते हैं। फौज से रिटायर्ड 74 वर्षीय कैप्टन अयोध्या प्रसाद अपनी बीमार पत्नी के साथ यहां रहते हैं। उनका बेटा दिल्ली में नौकरी करता है। कहते हैं दिल्ली का हवा-पानी हमारे अनुकूल नहीं है। अपने गांव का वातावरण स्वच्छ है, इसलिए परेशानियों के बावजूद यहां रहते हैं।
सबसे बड़ी दिक्कत हॉस्पिटल की है। ऐन वक्त पर गाड़ी भी नहीं मिलती। किसी को हार्ट अटैक आ जाए तो भगवान ही उसे बचाए। गांव में 50-60 लोग सर्विस से रिटायर्ड हैं, जो गांव छोड़कर नहीं गए, उनके बारे में सरकार को सोचना चाहिए। बुजुर्गों का कोई सहारा नहीं है।
65 वर्षीय सावित्री देवी कहती हैं, मुझे अपेंडिक्स की बीमारी थी। अगर मेरे पति फौज में नहीं होते तो शायद मैं हॉस्पिटल नहीं पहुंच पाती। यहां कई औरतें जंगल में गिर गईं। दो औरतों को भालू खा गया। काफी देर बाद एंबुलेंस आई, तब जाकर उन्हें कर्णप्रयाग ले जाया जा सका। यहां बस हवा-पानी है और कोई सुविधा नहीं। बाहर जाएं तो धुआं, प्रदूषण से मरते हैं। पहले भरा-पूरा गांव था। जन्माष्टमी, नंदाष्टमी, होली, दीवाली पर गांव में पूजा पाठ होता था तो बैठने की जगह नहीं मिलती थी।
डिस्पेंसरी है लेकिन डॉक्टर नहीं
अब तो गिनती के लोग रह गए। गांव में रास्ते तक नहीं हैं। 63 वर्षीय सुरेंद्र सिह ने बताया कि रतूड़ा के केदारूखाल गांव में डिस्पेंसरी है लेकिन डॉक्टर नहीं है। कंपाउंडर है जो मरहम-पट्टी करता है। आयुर्वेदिक हॉस्पिटल बना था पर उसकी बिल्डिंग हैंडओवर नहीं हुई। वह टूट गया। 57 वर्षीय उद्धव प्रसाद कहते हैं जन्मभूमि छोड़ी नहीं जाती।
हमारे पास रोजगार नहीं है, कहां जाएं। यहां दादा जी का घर है। गांव में स्वास्थ्य और यातायात की बहुत दिक्कत है। प्राइवेट गाड़ी चलती है जो मनमानी करते हैं। सड़क से गांव तक सामान लाने के लिए नेपाली लोग लगाते हैं। पत्नी दिव्यांग है। बच्चे बाहर रहते हैं। बीमार हो जाते हैं तो कर्णप्रयाग से दवा लाते हैं।
ढह गए आधे से ज्यादा घर
भरत प्रसाद बताते हैं, यह ब्राह्मण बाहुल्य गांव है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 के आसपास गांव से पलायन शुरू हुआ। करीब 300 परिवार छोड़कर चले गए। आधे से ज्यादा घर खंडहर हो गए। बस बूढ़े लोग बचे हैं। मुख्य कारण शिक्षा रहा। प्राइमरी स्कूल खाली पड़ा है। रोड कनेक्टिविटी नहीं है। पूर्व प्रधान हरीश चंद्र भी इन दिक्कतों के लिए कुछ नहीं कर सके। पूछने पर कहते हैं, सड़क के लिए विधायक को बोला था पर कोई काम नहीं हुआ। हॉस्पिटल बंद पड़ा है, हैंडओवर ही नहीं हुआ।