Uttarakhand: मानव-वन्यजीव संघर्ष, 25 साल में 954 लोगों की मौत, तेंदुए के हमलों में सबसे ज्यादा 548 जानें गईं
उत्तराखंड में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ता टकराव अब कई इलाकों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। जंगलों के आसपास बस्तियों के विस्तार और वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी से संघर्ष की घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं।
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उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। वन्यजीवों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार राज्य में भालुओं की संख्या करीब 3,200 है, जो सबसे अधिक है। इसके बाद तेंदुओं की संख्या 2,276, हाथियों की संख्या 2,026 और बाघों की अनुमानित संख्या 560 है। इनमें 260 बाघ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में पाए जाते हैं।
यह बात मूल रूप से चमोली जिले के रहने वाले मिजोरम विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर व स्कूल ऑफ अर्थ साइंसेज एंड नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट के डीन विश्वंभर प्रसाद सती के अध्ययन में सामने आई हैं। उन्होंने बताया कि जिलेवार आंकड़ों के मुताबिक पौड़ी में तेंदुओं की संख्या सबसे अधिक है और भालू मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं का प्रमुख कारण हैं।
नैनीताल में बाघों और तेंदुओं की बड़ी संख्या संघर्ष को बढ़ाती है। इसका प्रमुख कारण कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की निकटता है। हरिद्वार में हाथियों की संख्या अधिक है और देहरादून-हरिद्वार रेलवे लाइन पर हाथियों की मौत की घटनाएं सामने आती रहती हैं। इसके पीछे उचित रूप से डिजाइन किए गए हाथी गलियारे का अभाव प्रमुख कारण है। टिहरी भी तेंदुए और भालू के साथ संघर्ष के कारण राज्य के प्रमुख हॉट स्पॉट में शामिल है।
भालू संघर्ष में सबसे आगे, फसलों को भी नुकसान
देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में हाथियों का प्रभुत्व है। कुल मिलाकर भालू से संबंधित संघर्ष की घटनाएं सबसे अधिक हैं और मानवों के घायल होने और मृत्यु के मामलों में भी भालू प्रमुख कारण हैं। मध्य हिमालयी क्षेत्र में भालू प्रमुख संघर्षकारी वन्यजीव हैं, जबकि तेंदुए भी संघर्ष की आवृत्ति और मानव हताहतों के मामले में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। जंगली सूअर और लंगूर खड़ी फसलों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं।
25 साल में 954 मौतें, तेंदुए सबसे घातक
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 तक 25 वर्षों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की वजह से उत्तराखंड में लगभग 954 लोगों की मृत्यु हुई। यह औसतन लगभग 30 मौतें प्रतिवर्ष है। हाल के वर्षों में मानव मृत्यु की संख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गई है। इस अवधि में सबसे अधिक 548 मौतें तेंदुओं के हमलों से हुईं। इसके बाद हाथियों के हमलों से 230 और बाघों के हमलों से 106 लोगों की मृत्यु हुई। भालुओं के हमलों से 70 लोगों की जान गई। घायलों की संख्या भी चिंता बढ़ाने वाली है। 2000 से 2025 के बीच तेंदुए के हमलों से सबसे अधिक 2,127 लोग घायल हुए। इसके बाद भालू के हमलों से 2,013, हाथियों के हमलों से 234 और बाघों के हमलों से 130 लोग घायल हुए।
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छह साल में 438 मौतें, 2335 लोग घायल
वर्ष 2020 से 2025 के बीच मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण कुल 438 लोगों की मृत्यु और 2335 लोग घायल हुए। इस अवधि में सबसे अधिक 84 मौतें वर्ष 2024 में हुईं, जबकि 2022 में 82 मौतें दर्ज की गईं। घायलों की संख्या के मामले में भी 2024 सबसे आगे रहा, जब 512 लोग घायल हुए। इसके बाद 2025 में 488 लोग घायल हुए। 2000–2025 की दीर्घकालिक अवधि और 2020-2025 की हाल की छह वर्षीय अवधि की तुलना से पता चलता है कि बाद की अवधि में मृत्यु और चोटों की दर असंगत रूप से अधिक रही है, जबकि यह कुल अध्ययन अवधि का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। मानव–वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट में पौड़ी जिले में मानव मृत्यु की संख्या सबसे अधिक 53 रही। इसके बाद अल्मोड़ा में 47 और टिहरी में 36 लोगों की मृत्यु हुई। चमोली और नैनीताल जिलों में भी 30-30 लोगों की मृत्यु हुई। वहीं बागेश्वर, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और चंपावत जिलों में वन्यजीवों के कारण मानव मृत्यु की संख्या 20 से कम रही।