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Delhi NCR News: बड़े ऑपरेशन के बिना 12 साल की बच्ची की बदली जिंदगी, दो साल से मिर्गी का गंभीर दौरा नहीं
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एम्स के डॉक्टरों का कमाल
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नौ महीने की उम्र में स्ट्रोक से दायां मस्तिष्क हुआ था क्षतिग्रस्त, दिल की बीमारी के कारण ओपन ब्रेन सर्जरी थी बेहद जोखिम भरी, रोबोटिक तकनीक से हुई मिनिमली इनवेसिव सर्जरी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। केरल के एक दूरदराज गांव की 12 वर्षीय बच्ची ने मिर्गी के लगातार दौरों और अस्पतालों के चक्कर के बीच बीते बचपन को अब पीछे छोड़ दिया है। नौ महीने की उम्र में स्ट्रोक के बाद करीब एक दशक तक गंभीर मिर्गी से जूझने वाली बच्ची अब सामान्य जिंदगी जी रही है। एम्स, दिल्ली में अत्याधुनिक मिनिमली इनवेसिव ब्रेन सर्जरी के बाद पिछले दो वर्षों में उसे मिर्गी का कोई गंभीर दौरा नहीं पड़ा है। वह रोजमर्रा के काम भी सामान्य रूप से कर रही है।
बच्ची को जन्म से ही गंभीर हृदय रोग था। ऐसे में सामान्य तरीके से की जाने वाली बड़ी ब्रेन सर्जरी उसके लिए जानलेवा जोखिम पैदा कर सकती थी। इसी चुनौती को देखते हुए एम्स की टीम ने रोबोटिक थर्मोकोएगुलेटिव हेमिस्फेरोटॉमी तकनीक का सहारा लिया। इसमें खोपड़ी को बड़े स्तर पर खोलने के बजाय छोटे छेदों के जरिए मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्से को बाकी मस्तिष्क से अलग किया जाता है।
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केस स्टडी : रोजाना आते थे एक-दो गंभीर दौरे, दवाएं भी बेअसर
स्ट्रोक के कारण बच्ची के मस्तिष्क का दायां हिस्सा स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। करीब दो वर्ष की उम्र से उसे लगातार मिर्गी के दौरे पड़ने लगे। दौरों को रोकने के लिए कई तरह की एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं के बावजूद रोजाना एक-दो गंभीर दौरे आते रहे। मां ने केरल के कई अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन राहत नहीं मिली।
आर्थिक परेशानी के बीच केरल मुख्यमंत्री राहत कोष से मिली मदद के बाद परिवार मार्च 2024 में दिल्ली पहुंचा। एम्स की मिर्गी टीम ने जांच के बाद इसे ड्रग-रेसिस्टेंट एपिलेप्सी माना। न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, लगातार दौरों ने बच्ची के सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया था और सर्जरी ही प्रभावी विकल्प बचा था।
सर्जरी के दौरान कार्डियक अरेस्ट हुआ, तत्काल रिससिटेशन कर संभाली स्थिति
एम्स न्यूरोसर्जरी एवं गामा नाइफ विभाग के प्रमुख डॉ. पी. शरत चंद्र बताते हैं कि ऐसे मामलों में आमतौर पर मस्तिष्क की एक बेहद जटिल और दुर्लभ न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया (ओपन हेमिस्फेरोटॉमी) की जाती है। लेकिन जन्मजात हृदय रोग और हृदय की मांसपेशियों से जुड़ी एक अन्य बीमारी (डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी) के कारण बच्ची में यह बेहद जोखिम भरा था।
सर्जरी के दौरान बच्ची को कार्डियक अरेस्ट भी हुआ। न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और कार्डियोलॉजी की संयुक्त टीम ने तत्काल रिससिटेशन कर उसकी स्थिति संभाली। न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रमेश डोड्डामानी के मुताबिक, ऐसे जटिल मामले में सभी विशेषज्ञ टीमों का समन्वय बेहद अहम रहा।
दूसरी बार भी नहीं खोली खोपड़ी
सर्जरी के करीब तीन महीने बाद जांच में क्रॉनिक सबड्यूरल हेमेटोमा (मस्तिष्क की सतह और उसकी बाहरी परत के बीच पुराना खून या तरल जमा होना) मिला। दोबारा ओपन ब्रेन सर्जरी बच्ची के कमजोर दिल के लिए जोखिम भरी थी। इसलिए एम्स के न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय गर्ग ने मिडिल मेनिंजियल आर्टरी एम्बोलिजेशन (किसी बड़ी सर्जरी के कैथेटर के जरिए रक्त वाहिका को बंद करना)के जरिए इसका इलाज किया। इस एंडोवास्कुलर प्रक्रिया में खोपड़ी खोले बिना रक्तस्राव से जुड़ी समस्या का उपचार किया गया। लगातार दौरों से जूझ रही बच्ची के लिए यह उपचार अब सामान्य जीवन की ओर लौटने का रास्ता बन गया है।
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नौ महीने की उम्र में स्ट्रोक से दायां मस्तिष्क हुआ था क्षतिग्रस्त, दिल की बीमारी के कारण ओपन ब्रेन सर्जरी थी बेहद जोखिम भरी, रोबोटिक तकनीक से हुई मिनिमली इनवेसिव सर्जरी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। केरल के एक दूरदराज गांव की 12 वर्षीय बच्ची ने मिर्गी के लगातार दौरों और अस्पतालों के चक्कर के बीच बीते बचपन को अब पीछे छोड़ दिया है। नौ महीने की उम्र में स्ट्रोक के बाद करीब एक दशक तक गंभीर मिर्गी से जूझने वाली बच्ची अब सामान्य जिंदगी जी रही है। एम्स, दिल्ली में अत्याधुनिक मिनिमली इनवेसिव ब्रेन सर्जरी के बाद पिछले दो वर्षों में उसे मिर्गी का कोई गंभीर दौरा नहीं पड़ा है। वह रोजमर्रा के काम भी सामान्य रूप से कर रही है।
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बच्ची को जन्म से ही गंभीर हृदय रोग था। ऐसे में सामान्य तरीके से की जाने वाली बड़ी ब्रेन सर्जरी उसके लिए जानलेवा जोखिम पैदा कर सकती थी। इसी चुनौती को देखते हुए एम्स की टीम ने रोबोटिक थर्मोकोएगुलेटिव हेमिस्फेरोटॉमी तकनीक का सहारा लिया। इसमें खोपड़ी को बड़े स्तर पर खोलने के बजाय छोटे छेदों के जरिए मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्से को बाकी मस्तिष्क से अलग किया जाता है।
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केस स्टडी : रोजाना आते थे एक-दो गंभीर दौरे, दवाएं भी बेअसर
स्ट्रोक के कारण बच्ची के मस्तिष्क का दायां हिस्सा स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। करीब दो वर्ष की उम्र से उसे लगातार मिर्गी के दौरे पड़ने लगे। दौरों को रोकने के लिए कई तरह की एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं के बावजूद रोजाना एक-दो गंभीर दौरे आते रहे। मां ने केरल के कई अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन राहत नहीं मिली।
आर्थिक परेशानी के बीच केरल मुख्यमंत्री राहत कोष से मिली मदद के बाद परिवार मार्च 2024 में दिल्ली पहुंचा। एम्स की मिर्गी टीम ने जांच के बाद इसे ड्रग-रेसिस्टेंट एपिलेप्सी माना। न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, लगातार दौरों ने बच्ची के सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया था और सर्जरी ही प्रभावी विकल्प बचा था।
सर्जरी के दौरान कार्डियक अरेस्ट हुआ, तत्काल रिससिटेशन कर संभाली स्थिति
एम्स न्यूरोसर्जरी एवं गामा नाइफ विभाग के प्रमुख डॉ. पी. शरत चंद्र बताते हैं कि ऐसे मामलों में आमतौर पर मस्तिष्क की एक बेहद जटिल और दुर्लभ न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया (ओपन हेमिस्फेरोटॉमी) की जाती है। लेकिन जन्मजात हृदय रोग और हृदय की मांसपेशियों से जुड़ी एक अन्य बीमारी (डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी) के कारण बच्ची में यह बेहद जोखिम भरा था।
सर्जरी के दौरान बच्ची को कार्डियक अरेस्ट भी हुआ। न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और कार्डियोलॉजी की संयुक्त टीम ने तत्काल रिससिटेशन कर उसकी स्थिति संभाली। न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रमेश डोड्डामानी के मुताबिक, ऐसे जटिल मामले में सभी विशेषज्ञ टीमों का समन्वय बेहद अहम रहा।
दूसरी बार भी नहीं खोली खोपड़ी
सर्जरी के करीब तीन महीने बाद जांच में क्रॉनिक सबड्यूरल हेमेटोमा (मस्तिष्क की सतह और उसकी बाहरी परत के बीच पुराना खून या तरल जमा होना) मिला। दोबारा ओपन ब्रेन सर्जरी बच्ची के कमजोर दिल के लिए जोखिम भरी थी। इसलिए एम्स के न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय गर्ग ने मिडिल मेनिंजियल आर्टरी एम्बोलिजेशन (किसी बड़ी सर्जरी के कैथेटर के जरिए रक्त वाहिका को बंद करना)के जरिए इसका इलाज किया। इस एंडोवास्कुलर प्रक्रिया में खोपड़ी खोले बिना रक्तस्राव से जुड़ी समस्या का उपचार किया गया। लगातार दौरों से जूझ रही बच्ची के लिए यह उपचार अब सामान्य जीवन की ओर लौटने का रास्ता बन गया है।