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Delhi NCR News: मां की गोद बनी कमजोर नवजातों की ताकत, जीरो सेपरेशन से बेहतर हो रही सेहत
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-सफदरजंग अस्पताल के एमएनसीयू मॉडल ने दिखाई नई राह
सिमरन
नई दिल्ली। समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले नवजातों के लिए मां का साथ अब इलाज का अहम हिस्सा बन रहा है। वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (वीएमसीसी) और सफदरजंग अस्पताल ने मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) मॉडल अपनाया है। इस जीरो सेपरेशन मॉडल से नवजात देखभाल की पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव आ रहा है।
एमएनसीयू मॉडल में 1800 ग्राम से कम वजन वाले नवजातों को मां से अलग नहीं रखा जाता। मां बच्चे की देखभाल में 24 घंटे सक्रिय भागीदार बनती है। चिकित्सकीय निगरानी में मां बच्चे को कंगारू मदर केयर यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क देती है। एमएनसीयू में ऑक्सीजन, मॉनिटर, सीपीएपी जैसी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध रहती हैं। सफदरजंग अस्पताल के अनुभव बताते हैं कि एमएनसीयू में देखभाल पाने वाले बच्चों में 28 दिन की मृत्यु दर कम हुई है। साथ ही, हाइपोथर्मिया और संदिग्ध सेप्सिस के मामलों में भी कमी दर्ज की गई है।
मां का स्पर्श और जीरो सेपरेशन
अस्पताल के बाल चिकित्सा विभाग के डॉ. तुषार कांति मैती ने बताया कि कंगारू मदर केयर से बच्चे को गर्माहट मिलती है और तापमान स्थिर रहता है। यह स्तनपान को भी बढ़ावा देता है। कम वजन वाले बच्चों में यह संक्रमण और जटिलताओं को कम करने में सहायक है। डॉ. मैती ने कहा कि अस्पताल का माहौल नवजात के लिए तनावपूर्ण हो सकता है, ऐसे में मां का स्पर्श भावनात्मक और शारीरिक सहारा देता है।
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एनआईसीयू जैसी सुविधाएं, लेकिन मां भी साथ
रीजनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी, एनसीआर बायोटेक साइंस क्लस्टर की नित्या वाधवा ने बताया कि जो नवजात गंभीर रूप से बीमार नहीं हैं, लेकिन उन्हें ऑक्सीजन या कुछ समय तक विशेष चिकित्सा की जरूरत है, उनमें बड़ी संख्या को मां के साथ एमएनसीयू में संभाला जा सकता है। उन्होंने बताया कि पहले समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले बच्चों को इलाज के लिए अलग यूनिट में रखा जाता था। मां से उनकी मुलाकात सीमित रहती थी। एमएनसीयू मॉडल इस सोच को बदल रहा है।
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सिमरन
नई दिल्ली। समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले नवजातों के लिए मां का साथ अब इलाज का अहम हिस्सा बन रहा है। वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (वीएमसीसी) और सफदरजंग अस्पताल ने मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) मॉडल अपनाया है। इस जीरो सेपरेशन मॉडल से नवजात देखभाल की पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव आ रहा है।
एमएनसीयू मॉडल में 1800 ग्राम से कम वजन वाले नवजातों को मां से अलग नहीं रखा जाता। मां बच्चे की देखभाल में 24 घंटे सक्रिय भागीदार बनती है। चिकित्सकीय निगरानी में मां बच्चे को कंगारू मदर केयर यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क देती है। एमएनसीयू में ऑक्सीजन, मॉनिटर, सीपीएपी जैसी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध रहती हैं। सफदरजंग अस्पताल के अनुभव बताते हैं कि एमएनसीयू में देखभाल पाने वाले बच्चों में 28 दिन की मृत्यु दर कम हुई है। साथ ही, हाइपोथर्मिया और संदिग्ध सेप्सिस के मामलों में भी कमी दर्ज की गई है।
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मां का स्पर्श और जीरो सेपरेशन
अस्पताल के बाल चिकित्सा विभाग के डॉ. तुषार कांति मैती ने बताया कि कंगारू मदर केयर से बच्चे को गर्माहट मिलती है और तापमान स्थिर रहता है। यह स्तनपान को भी बढ़ावा देता है। कम वजन वाले बच्चों में यह संक्रमण और जटिलताओं को कम करने में सहायक है। डॉ. मैती ने कहा कि अस्पताल का माहौल नवजात के लिए तनावपूर्ण हो सकता है, ऐसे में मां का स्पर्श भावनात्मक और शारीरिक सहारा देता है।
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एनआईसीयू जैसी सुविधाएं, लेकिन मां भी साथ
रीजनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी, एनसीआर बायोटेक साइंस क्लस्टर की नित्या वाधवा ने बताया कि जो नवजात गंभीर रूप से बीमार नहीं हैं, लेकिन उन्हें ऑक्सीजन या कुछ समय तक विशेष चिकित्सा की जरूरत है, उनमें बड़ी संख्या को मां के साथ एमएनसीयू में संभाला जा सकता है। उन्होंने बताया कि पहले समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले बच्चों को इलाज के लिए अलग यूनिट में रखा जाता था। मां से उनकी मुलाकात सीमित रहती थी। एमएनसीयू मॉडल इस सोच को बदल रहा है।