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Delhi NCR News: खून में मौजूद खास प्रोटीन से स्ट्रोक के खतरे और रिकवरी का लगाया जा सकता है अंदाजा
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शोध : बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन पर वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल के अध्ययन में खुलासा
विशेषज्ञ बोले-इसे बायोमार्कर मानने से पहले बड़े और दीर्घकालिक शोध जरूरी
सिमरन
नई दिल्ली। खून में पाए जाने वाले बीटा-2 एड्रीनर्जिक रिसेप्टर माइक्रोग्लोबुलिन (बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन) नामक प्रोटीन का संबंध स्ट्रोक के बाद मरीज की स्थिति और उसके स्वास्थ्य परिणामों से हो सकता है। वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (वीएमएमसी) और सफदरजंग अस्पताल के शोधकर्ताओं के अध्ययन में संकेत मिले हैं कि जिन लोगों के रक्त में इस प्रोटीन का स्तर अधिक होता है, उनमें स्ट्रोक के बाद गंभीर जटिलताओं और खराब स्वास्थ्य परिणामों का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध की पुष्टि के लिए अभी बड़े और दीर्घकालिक अध्ययनों की आवश्यकता है।
अध्ययन में दुनिया भर में प्रकाशित 15 शोधों का विश्लेषण किया गया, जिनमें लगभग 13,180 वयस्कों के आंकड़े शामिल थे। शोध के अनुसार, बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की सक्रियता, किडनी की कार्यक्षमता और शरीर में होने वाली सूजन, विशेषकर न्यूरोइन्फ्लेमेशन, से जुड़ा होता है। इसी कारण वैज्ञानिक इसे स्ट्रोक के मरीजों की भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाने वाले संभावित प्रोग्नोस्टिक बायोमार्कर के रूप में देख रहे हैं। प्रोग्नोस्टिक बायोमार्कर एक जैविक माप है जो यह बताता है कि किसी मरीज में बीमारी कितनी गंभीर हो सकती है, और मरीज के ठीक होने या जीवित रहने की संभावना कितनी है।
विश्लेषण में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों में बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन का स्तर अधिक था, उनमें स्ट्रोक के तीन महीने बाद शारीरिक कार्यक्षमता कमजोर रहने की आशंका अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। वहीं, स्ट्रोक होने के जोखिम के साथ इसके सीधे संबंध को लेकर उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं और विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष भी एक जैसे नहीं हैं।
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अध्ययन से जुड़े न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दिव्यम गोयल ने बताया कि रक्त में बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन का बढ़ा हुआ स्तर स्ट्रोक के बाद मृत्यु के जोखिम, शारीरिक अक्षमता, दोबारा स्ट्रोक आने की आशंका तथा याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में कमी जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए अधिक व्यापक और बहु-केंद्रित शोध आवश्यक हैं। वहीं, न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुमन ठाकुर के अनुसार भविष्य में यह प्रोटीन मरीजों के जोखिम का आकलन करने में उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन इसका इस्तेमाल करते समय किडनी की कार्यक्षमता जैसे अन्य महत्वपूर्ण कारकों को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि यह प्रोटीन उनसे भी प्रभावित होता है।
क्या है बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन
बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन एक छोटा प्रोटीन है, जो रक्त में पाया जाता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली तथा किडनी के कामकाज से जुड़ा होता है। इसके स्तर में वृद्धि शरीर में सूजन या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में यह स्ट्रोक मरीजों के जोखिम के आकलन में उपयोगी बायोमार्कर बन सकता है, बशर्ते इसकी प्रभावशीलता बड़े अध्ययनों से प्रमाणित हो जाए।
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विशेषज्ञ बोले-इसे बायोमार्कर मानने से पहले बड़े और दीर्घकालिक शोध जरूरी
सिमरन
नई दिल्ली। खून में पाए जाने वाले बीटा-2 एड्रीनर्जिक रिसेप्टर माइक्रोग्लोबुलिन (बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन) नामक प्रोटीन का संबंध स्ट्रोक के बाद मरीज की स्थिति और उसके स्वास्थ्य परिणामों से हो सकता है। वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (वीएमएमसी) और सफदरजंग अस्पताल के शोधकर्ताओं के अध्ययन में संकेत मिले हैं कि जिन लोगों के रक्त में इस प्रोटीन का स्तर अधिक होता है, उनमें स्ट्रोक के बाद गंभीर जटिलताओं और खराब स्वास्थ्य परिणामों का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध की पुष्टि के लिए अभी बड़े और दीर्घकालिक अध्ययनों की आवश्यकता है।
अध्ययन में दुनिया भर में प्रकाशित 15 शोधों का विश्लेषण किया गया, जिनमें लगभग 13,180 वयस्कों के आंकड़े शामिल थे। शोध के अनुसार, बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की सक्रियता, किडनी की कार्यक्षमता और शरीर में होने वाली सूजन, विशेषकर न्यूरोइन्फ्लेमेशन, से जुड़ा होता है। इसी कारण वैज्ञानिक इसे स्ट्रोक के मरीजों की भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाने वाले संभावित प्रोग्नोस्टिक बायोमार्कर के रूप में देख रहे हैं। प्रोग्नोस्टिक बायोमार्कर एक जैविक माप है जो यह बताता है कि किसी मरीज में बीमारी कितनी गंभीर हो सकती है, और मरीज के ठीक होने या जीवित रहने की संभावना कितनी है।
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विश्लेषण में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों में बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन का स्तर अधिक था, उनमें स्ट्रोक के तीन महीने बाद शारीरिक कार्यक्षमता कमजोर रहने की आशंका अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। वहीं, स्ट्रोक होने के जोखिम के साथ इसके सीधे संबंध को लेकर उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं और विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष भी एक जैसे नहीं हैं।
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अध्ययन से जुड़े न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दिव्यम गोयल ने बताया कि रक्त में बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन का बढ़ा हुआ स्तर स्ट्रोक के बाद मृत्यु के जोखिम, शारीरिक अक्षमता, दोबारा स्ट्रोक आने की आशंका तथा याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में कमी जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए अधिक व्यापक और बहु-केंद्रित शोध आवश्यक हैं। वहीं, न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुमन ठाकुर के अनुसार भविष्य में यह प्रोटीन मरीजों के जोखिम का आकलन करने में उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन इसका इस्तेमाल करते समय किडनी की कार्यक्षमता जैसे अन्य महत्वपूर्ण कारकों को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि यह प्रोटीन उनसे भी प्रभावित होता है।
क्या है बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन
बीटा-2 माइक्रोग्लोब्युलिन एक छोटा प्रोटीन है, जो रक्त में पाया जाता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली तथा किडनी के कामकाज से जुड़ा होता है। इसके स्तर में वृद्धि शरीर में सूजन या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में यह स्ट्रोक मरीजों के जोखिम के आकलन में उपयोगी बायोमार्कर बन सकता है, बशर्ते इसकी प्रभावशीलता बड़े अध्ययनों से प्रमाणित हो जाए।