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Delhi NCR News: 12 साल से युवती लापता, अपहरण के केस से युवक बरी युवक पर अपहरण का केस, पीड़िता 12 साल से लापता, कोर्ट ने किया बरी
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2014 के एक अपहरण मामले में आरोपी सुनील कुमार को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। अदालत के आदेश में मुख्य बिंदु था कि बीते 12 साल में अब तक पुलिस पीड़िता को अदालत नहीं ला सकी है।
मामले की शुरुआत जुलाई 2014 में सोनिया विहार पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी से हुई थी। शिकायतकर्ता दीन दयाल ने आरोप लगाया था कि उनकी 17 वर्षीय बेटी घर से नकदी और कपड़ों के साथ गायब हो गई। उन्हें संदेह है कि किसी ने उसे बहला-फुसलाकर ले गया। पुलिस को पीड़िता का कोई सुराग नहीं मिला। जून 2017 में पीड़िता के पिता ने उसे पुलिस के सामने पेश किया। इसी आधार पर सुनील कुमार की पहचान हुई और उसकी गिरफ्तारी हुई। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिसमें पीड़िता और शिकायतकर्ता की पहचान को आधार बनाया गया। हालांकि, ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता (एकमात्र सार्वजनिक गवाह) ने अभियोजन पक्ष का साथ नहीं दिया और आरोपी के खिलाफ कोई आपत्तिजनक बयान नहीं दिया। अदालत ने नोट किया कि पीड़िता को बार-बार बुलाने के बावजूद ट्रेस नहीं किया जा सका। जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि पीड़िता के माता-पिता को भी उसकी जानकारी नहीं है। इस कारण अदालत ने पीड़िता को गवाहों की सूची से हटा दिया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुनीत पहवा की अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जो आरोपी की दोषसिद्धि साबित कर सके।
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नई दिल्ली। कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2014 के एक अपहरण मामले में आरोपी सुनील कुमार को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। अदालत के आदेश में मुख्य बिंदु था कि बीते 12 साल में अब तक पुलिस पीड़िता को अदालत नहीं ला सकी है।
मामले की शुरुआत जुलाई 2014 में सोनिया विहार पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी से हुई थी। शिकायतकर्ता दीन दयाल ने आरोप लगाया था कि उनकी 17 वर्षीय बेटी घर से नकदी और कपड़ों के साथ गायब हो गई। उन्हें संदेह है कि किसी ने उसे बहला-फुसलाकर ले गया। पुलिस को पीड़िता का कोई सुराग नहीं मिला। जून 2017 में पीड़िता के पिता ने उसे पुलिस के सामने पेश किया। इसी आधार पर सुनील कुमार की पहचान हुई और उसकी गिरफ्तारी हुई। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिसमें पीड़िता और शिकायतकर्ता की पहचान को आधार बनाया गया। हालांकि, ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता (एकमात्र सार्वजनिक गवाह) ने अभियोजन पक्ष का साथ नहीं दिया और आरोपी के खिलाफ कोई आपत्तिजनक बयान नहीं दिया। अदालत ने नोट किया कि पीड़िता को बार-बार बुलाने के बावजूद ट्रेस नहीं किया जा सका। जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि पीड़िता के माता-पिता को भी उसकी जानकारी नहीं है। इस कारण अदालत ने पीड़िता को गवाहों की सूची से हटा दिया।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुनीत पहवा की अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जो आरोपी की दोषसिद्धि साबित कर सके।